सौरभ द्विवेदी के आगे फैलने का नहीं; यहां तक कि पुरुषोत्तम अग्रवाल को भी नहींः कुछ लोग सवाल करने के बजाय भाषण देने लग जाते हैं, उससे आज बचना है. अधिकतम तीन वाक्यों में अपना सवाल करना है… मॉडरेटर सौरभ द्विवेदी की इस स्पष्ट घोषणा के बावज़ूद प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल सवाल करने के नाम पर फैलने लग जाते हैं और तब द्विवेदी इस बात का ख़याल नहीं करते कि अग्रवाल उनके गुरु हैं जिन्हें वो इस बातचीत के दौरान मेरे उस्ताद- मेरे उस्ताद से लेकर उनके कॉलम मुखामुखम तक शामिल करते हुए “ज्ञान परिवेश” की निर्मिति करते हैं. द्विवेदी के पास ऐसे अनगिनत भभूत होते हैं और वो जानते हैं कि किस भभूत से कब, कैसे माहौल ऑब्लिक भौकाल बनाया जाता है. प्रोफेसर अग्रवाल जैसे ही फैलने की कोशिश करते हैं, द्विवेदी अपने इस उस्ताद और जेएनयू से अग्गा-पिच्छा संबंध किनारे रखकर एकदम पेशेवर अंदाज़ पर उतर आते हैं- प्रोफेसर, एक मिनट-एक मिनट..करने के साथ दो-तीन निर्गुणिया वाक्य के टुकड़े का इस्तेमाल करके साफ़ जतला देते हैं कि उस्ताद ! आज की इस महफ़िल में सिर्फ मैं फैल सकता हूं बल्कि हम कोई भी महफ़िल तब तक नहीं सजाते या उसका हिस्सा बनते हैं ...
मेरी नज़र में हाल में हुई नास्तिक–आस्तिक बहस, जिसमें Javed Akhtar और एक मौलवी आमने–सामने थे, उसे “जीत–हार” की तरह देखना ही मूल समस्या है। असली प्रश्न यह है कि कौन-सी सोच इंसान को इंसान बनाती है और कौन-सी सोच उसे भीड़ में बदल देती है। आज जिस आस्तिकता का सबसे ज़्यादा प्रचार है, वह ज़्यादातर religion-based आस्तिकता है—जो कठोर है, डर पर टिकी है और आदेश–पालन को ही धर्म मानती है। यही वह सोच है जिसने इतिहास में सबसे ज़्यादा हिंसा को जन्म दिया। धर्म के नाम पर क़त्लेआम, अलगाव और नफ़रत इसी मानसिकता की उपज हैं। इसके ठीक उलट, spirituality (आध्यात्मिकता) प्रेम, दया और करुणा के माध्यम से ईश्वर तक पहुँचने की बात करती है। आध्यात्मिक दृष्टि कहती है कि ईश्वर बाहर नहीं, हर जीव के भीतर है। जब ईश्वर हर प्राणी में है, तो किसी को कष्ट देना, किसी की हत्या करना—ईश्वर से दूरी नहीं तो और क्या है? यही कारण है कि दुनिया के सच्चे आध्यात्मिक संत हमेशा सत्ता और धर्मसत्ता की आँखों में खटकते रहे। Kabir ने कहा—“कंकर-पाथर जोड़ि के मस्जिद लई बनाय”—तो पंडित भी नाराज़ हुए और मुल्ला भी। Gautama Buddha ने कर्मकांड, यज्ञ और जा...