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वज़ीर-ए-आज़म के नाम एक खुला ख़त: अवाम (Public) की ख़ामोशी, सियासत और मुआशियाती बेचेनी का तजज़िया

कभी-कभी किसी मुल्क की सियासी फ़ज़ा में ऐसी ख़ामोशी पैदा हो जाती है जो शोर से ज़्यादा असर रखती है। अवाम (Public) बोलना बंद कर देती है, मगर उसका तजज़िया, उसका एहसास और उसकी मायूसी समाज के हर कोने में महसूस की जा सकती है। आज हिंदुस्तान की सियासत में भी कुछ ऐसा ही मंज़र दिखाई देता है, जहाँ एक तरफ़ क़ुदरत-ए-सियासत (Political Power) अपनी पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है और दूसरी तरफ़ अवाम का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे अपने एहसासात को खामोशी में तब्दील करता जा रहा है। इस मुल्क के करोड़ों अफ़राद में से एक साधारण शहरि (Citizen) की नज़र से अगर मौजूदा हालात को देखा जाए तो यह कहानी किसी एक दिन की नहीं बल्कि कई बरसों के तजुर्बात का नतीजा है। कभी उम्मीदें थीं, तवक़्क़ोआत थीं और एक नई सियासी क़ियादत से बहुत कुछ बदल जाने का तसव्वुर था। मगर वक़्त के साथ जब नोटबंदी, महामारी और मुआशियाती दबाव जैसे मराहिल (Phases) सामने आए तो अवाम ने अपनी आँखों के सामने बहुत कुछ टूटते हुए भी देखा ख़ास तौर पर महामारी के दौर में जब कई घरों में दर्दनाक हालात पैदा हुए, तब सरकारी बयानात और ज़मीनी तजुर्बात के दरमियान पैदा ...

कटहल सर्दियों का शेर

कटहल एक ऐसी सब्जी है जिसके बारे में तमाम किस्म की अफवाहें फैलाई गई, इसे भला बुरा कहा गया, इसके नाम पर गालियां बना दी गई। यहां तक कि मोदी जी से जब जनता-जनार्दन ने 15 लाख मांगे तो सरकार बोली 'कटहल देंगे'। याद रखिये कटहल में इंग्रेडिएंट्स नहीं पड़ते माल पड़ता है। किसी होटल के मीनू में मैने कभी कटहल नही दिखा। कटहल को अपवर्जित मान लिया गया। सनातनी ब्राह्मणों ने बेशर्मी के साथ कटहल को मटन का समतुल्य बता दिया। यह दुखद था पर था। मैं जब भी ठंड को अपने अगल बगल देखता हूँ या खुद को अकेला पाता हूँ तो कटहल खाता हूं। जनवरी के महीने में अगर कटहल न बने तो सब व्यर्थ है। हांलाकि अभी केवल छ्त्तीसगढ़ महाराष्ट्र में यह अमृत फल दिख रहा। इसकी सब्जी में  प्याज ,लहसुन और गरम मसाले हैं जिसमे तेजपत्ता,दालचीनी और बड़ी इलायची अनिवार्य है। इसे तब तक पकाना चाहिए जब तक कलेजा खुद न कहने लगे अब बर्दाश्त के बाहर है।  कटहल की सब्जी स्टील या शीशे के बर्तन में नही मिट्टी के बर्तन में ही जिसे हम कसोरा कहते हैं उसमें परोसे,पूड़ी हरगिज नही चलेगी,कचौड़ी या फिर पराठे के साथ ले, साथ मे भैंस के दूध की काजू,चिरौंजी, ...

RIP Rahul Bajaj

किसी मंच पर अगर गृह मंत्री अमित शाह , वित्त मंत्री निर्मला रमण , और रेल मंत्री पीयूष गोयल बैठे हों,  लाइव टेलीकास्ट हो रहा हो और अचानक से एक शख्स अपनी कुरसी से उठ कर ये कह दे कि .... 'आप लोगों से डर लगता है कि कब क्या हो जाये? जब यूपीए सरकार थी तो चाहे सरकार को  कुछ भी कह लो डर नही लगता था। आज सभी डरे हुए हैं, हम जिस दौर से  गुजर रहे हैं,  वो ठीक नही है ! आपको अच्छा तो नही लगेगा लेकिन मैं बता रहा हूं कि मैं जब पैदा हुआ था तो मेरा नाम 'राहुल ' पंडित नेहरू ने  ही रखा था। कैसे मर सकते हैं बापू या नेहरु? ये बात  सभी के सामने कहने की हिम्मत बस राहुल  बजाज ने की थी। जो आज हम सबको छोड़ कर चले गये.... हमारा बजाज प्यारा बजाज  !!   तारिक़ अज़ीम 'तनहा'