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इस शम्अ को धुएँ का लबादा भी चाहिए | एक सूफ़ियाना और फ़लसफ़ियाना उर्दू ग़ज़ल | तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

ज़िंदगी की तकमील, इश्क़ की तिश्नगी और वजूद के तज़ादात पर एक फ़िक्र-अंगेज़ ग़ज़ल मेरी यह ग़ज़ल दरअसल किसी एक जज़्बे, एक तजुर्बे या एक ख़्वाहिश का बयान नहीं है। मैंने इसमें ज़िंदगी को उसकी मुकम्मल सूरत में देखने की कोशिश की है। अक्सर हम चीज़ों को उनके एक ही रुख़ से पहचानते हैं, रौशनी को रौशनी समझते हैं, दर्द को दर्द, इश्क़ को इश्क़ और तन्हाई को तन्हाई। लेकिन मेरे नज़दीक हक़ीक़त इससे कहीं ज़्यादा पेचीदा और दिलचस्प है। हर रौशनी के पीछे एक साया होता है, हर मुस्कुराहट के पीछे कोई ग़म, हर विसाल के पीछे कोई हिज्र, और हर मंज़िल के पीछे एक लंबा सफ़र। यही एहसास इस ग़ज़ल की बुनियाद बना। मतले में मैंने हिज्र और उजाले को आमने-सामने रखा है। पहली नज़र में यह एक तज़ाद मालूम होता है, मगर ग़ौर कीजिए तो यही तज़ाद ज़िंदगी की अस्ल तकमील भी है। जुदाई की रात अगर बिल्कुल तारीक हो जाए तो इंसान उम्मीद खो बैठता है। इसलिए हिज्र को भी उजाले की ज़रूरत है। अश्क अगर आँख में क़ैद रह जाए तो उसका दर्द अधूरा रह जाता है, उसे दरिया बनकर बहना पड़ता है। इस तरह ग़ज़ल का पहला शेर ही पूरी ग़ज़ल की फ़िक्र का इशारा दे देता है हर...