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Showing posts with the label #PoliticalAnalysis

सियासी मंज़रनामा: मोदी का असर, राहुल की उम्मीदें और 2029 की सियासत

कल बहुत अर्से बाद ऐसा हुआ कि वज़ीर-ए-आज़म का ख़िताब था और उनके अपने सफ़्हे पर देखने वालों की तादाद अक्सर औक़ात लाख से भी नीचे रही। ट्विटर पर एक मरतबा ज़रूर तादाद 1.37 लाख के क़रीब पहुँची जब तक़रीर ख़त्म होने में १०–१२ मिनट बाक़ी थे। भाजपा के सफ़्हे पर तो ये तादाद ढाई हज़ार तक पहुँचना भी मुश्किल लग रही थी। मोदी एक कल्ट की शक्ल में उभरे, लेकिन २०१९ के बाद उस जादू में कमी आने लगी। मिडिल क्लास जो उनके साथ मुंसलिक था, उसी तबक़े को सबसे ज़्यादा तकलीफ़ हुई। राम मंदिर बनने के बाद जब हर तरफ़ ४०० का आंकड़ा बताया जा रहा था, मैंने अपने पंचायती चैनल पर शुब्हा ज़ाहिर किया था और पहले मरहले के इंतिख़ाबात के बाद मेरी हिसाब-किताब २४५ सीट के क़रीब की थी। (वीडियो वहीं मौजूद है।) उस वक़्त भी बहुत से हामी और मुख़ालिफ़ दोनों ही इस तादाद के ख़िलाफ़ थे। मोदी के परस्तार क्यों मुख़ालिफ़ थे, ये आप समझ सकते हैं, और राहुल गांधी के नए हामी वोटिंग पैटर्न और अवामी रवैये के मंतिक को उतना ही समझते हैं जितना तमिलनाडु के लोग हिंदी। बहरहाल, एक बात तय है कि मोदी अब अगले लोकसभा इंतिख़ाबात में कोई जादू पैदा नहीं कर सकते। उनकी...

सियासत का मज़ाक या हक़ीक़त? 2×2 का जवाब और हुकूमती बयानीया का फ़लसफ़ा

कभी-कभी एक मामूली सा मज़ाहिया वाक़िआ (Incident) इतनी गहरी हक़ीक़त को बेनक़ाब कर देता है कि बड़े-बड़े सियासी तजज़िये (Political Analyses) भी उसके सामने फीके पड़ जाते हैं। “2×2 का जवाब” वाला यह किस्सा भी महज़ एक लतीफ़ा (Joke) नहीं, बल्कि हमारे दौर की सियासी फ़िक्र (Political Thinking) और बयानीये (Narrative) का आइना है। जब एक बच्चा ये कहता है कि उसने “5” बताया और बाकी “11” तक पहुँच गए, तो ये सिर्फ़ जहालत (Ignorance) की निशानी नहीं, बल्कि एक ऐसे निज़ाम (System) की झलक है जहाँ सही जवाब की अहमियत कम और खुश करने की सियासत ज़्यादा अहम हो जाती है। यही वो नुक्ता (Point) है जहाँ मज़ाह, हक़ीक़त में तब्दील होता है। सियासत में अक्सर देखा गया है कि बयानीया (Narrative) हक़ीक़त (Reality) पर भारी पड़ जाता है। सही जवाब “4” होता है ये बात भी सभी जानते है, मगर अगर महफ़िल (Power Circle) में “5” या “11” पसंद किया जा रहा हो, तो लोग उसी को दोहराने लगते हैं। ये अमल सिर्फ़ फ़र्दी (Individual) नहीं, बल्कि इज्तिमाई (Collective) सूरत इख़्तियार कर लेता है। इस तरह की सियासी रवायत (Tradition) में असल मसला ये नहीं होता ...

हिंदुस्तानी सियासत में हलचल: मधु किश्वर के इत्तिहामात (Allegations) ने खड़ा किया बड़ा सवाल

हिंदुस्तानी सियासत (Politics) में अक्सर ऐसे लम्हात आते हैं जब कोई एक बयान पूरा मंजरनामा (Scenario) बदल देता है। हालिया दिनों में एक ऐसा ही बयान सामने आया है, जिसने न सिर्फ़ सियासी हलकों में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि अवाम (Public) के दरमियान भी गहरी बहस छेड़ दी है। मधु किश्वर, जो कभी हुकूमत के करीब मानी जाती थीं और एक खास सियासी तफक्कुर (Ideology) की हामी रही हैं, उनके ताज़ा इज़हारात (Statements) ने कई सवालात को जन्म दिया है। उन्होंने अपने बयान में कुछ संगीन इत्तिहामात (Serious Allegations) पेश किए हैं, जिनमें शख्सियाती और सियासी दोनों पहलुओं का ज़िक्र मिलता है। अहम बात ये है कि ये इत्तिहामात किसी अदालती फैसले या मुस्तनद (Verified) तहक़ीक़ (Investigation) से साबित नहीं हुए हैं, बल्कि एक शख्सी तजुर्बे और राय (Opinion) के तौर पर सामने आए हैं। लेकिन सियासत की दुनिया में अक्सर राय भी एक ताक़तवर अस्लाह (Weapon) बन जाती है, जो अवामी ज़ेहन (Public Mind) को मुतास्सिर करती है। ये मामला सिर्फ़ एक शख्स या एक बयान तक महदूद नहीं है, बल्कि ये उस बड़े मसले की तरफ इशारा करता है जहाँ सियासी शख्सियात (Po...

वज़ीर-ए-आज़म के नाम एक खुला ख़त: अवाम (Public) की ख़ामोशी, सियासत और मुआशियाती बेचेनी का तजज़िया

कभी-कभी किसी मुल्क की सियासी फ़ज़ा में ऐसी ख़ामोशी पैदा हो जाती है जो शोर से ज़्यादा असर रखती है। अवाम (Public) बोलना बंद कर देती है, मगर उसका तजज़िया, उसका एहसास और उसकी मायूसी समाज के हर कोने में महसूस की जा सकती है। आज हिंदुस्तान की सियासत में भी कुछ ऐसा ही मंज़र दिखाई देता है, जहाँ एक तरफ़ क़ुदरत-ए-सियासत (Political Power) अपनी पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है और दूसरी तरफ़ अवाम का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे अपने एहसासात को खामोशी में तब्दील करता जा रहा है। इस मुल्क के करोड़ों अफ़राद में से एक साधारण शहरि (Citizen) की नज़र से अगर मौजूदा हालात को देखा जाए तो यह कहानी किसी एक दिन की नहीं बल्कि कई बरसों के तजुर्बात का नतीजा है। कभी उम्मीदें थीं, तवक़्क़ोआत थीं और एक नई सियासी क़ियादत से बहुत कुछ बदल जाने का तसव्वुर था। मगर वक़्त के साथ जब नोटबंदी, महामारी और मुआशियाती दबाव जैसे मराहिल (Phases) सामने आए तो अवाम ने अपनी आँखों के सामने बहुत कुछ टूटते हुए भी देखा ख़ास तौर पर महामारी के दौर में जब कई घरों में दर्दनाक हालात पैदा हुए, तब सरकारी बयानात और ज़मीनी तजुर्बात के दरमियान पैदा ...

ईरान: सिर्फ़ एक मुल्क नहीं, बल्कि ‘आज़्म-ओ-इरादा’ की दास्तान — पाबंदियों, जंग और सियासत के दरमियान एक क़ौम का सब्र

इज़राइल ने जंग में हुए नुक़सान की मीडिया कवरेज पर सख़्त पाबंदी आइद कर दी है। कहा जा रहा है कि तेल अवीव, यरूशलेम और पूरे इज़राइल में ईरानी मिसाइलों से होने वाली तबाही की वीडियोग्राफ़ी और तस्वीरें लेने पर सख़्त रोक लगा दी गई है। यहाँ तक कि इन वीडियोज़ और तस्वीरों को इज़राइल से बाहर भेजने पर भी सख़्त क़िस्म की मनाही कर दी गई है। हुकूमत का कहना है कि इससे मुल्क की सिक्योरिटी और फ़ौजी मुक़ामात से जुड़ी मालूमात दुश्मनों तक पहुँच सकती है, इसलिए ऐसी रिपोर्टिंग पर पाबंदी ज़रूरी समझी गई। दूसरी तरफ़ अमरीका और इज़राइल लगातार यह दावा कर रहे हैं कि उनके हमलों से ईरान को बहुत बड़ा नुक़सान पहुँचा है। मगर अगर वाक़ई ईरान इतनी बुरी तरह तबाह हो चुका है तो फिर वह हथियार क्यों नहीं डाल रहा? जो अमरीका जंग के आग़ाज़ में यह कह रहा था कि सिर्फ़ 48 घंटों में ईरान में हुकूमत तब्दील हो सकती है, अब उस जंग को बारह दिन से ज़्यादा गुज़र चुके हैं और हालात अब भी नाज़ुक बने हुए हैं। ईरानी क़ियादत किसी क़िस्म के मुआहिदे या समझौते के लिए तैयार नज़र नहीं आती। कई तजज़ियाकार यह सवाल भी उठा रहे हैं कि कहीं इज़राइ...

तवील तहरीरों का फ़रेब: सोशल मीडिया में सियासी एक्टिविज़्म या फ़िक्र की तिजारत?

आज के दौर-ए-सोशल मीडिया में एक अजीब सा रुझान पैदा हो गया है। बहुत से लोग तवील तहरीरें लिखते हैं, या कहीं से कोई लंबा मज़मून नक़ल करके पेश कर देते हैं, और फिर खुद को “सियासी एक्टिविस्ट”, “मुफक्किर”, “तजज़िया-निगार” या “इंटेलेक्चुअल” के लिबास में पेश करते हैं। आम क़ारी जब ऐसी तहरीर पढ़ता है तो अक्सर एक वहम का शिकार हो जाता है। उसे महसूस होता है कि मज़मून बहुत लंबा है, अल्फ़ाज़ में कुछ साक़िलपन है, दरमियान-दरमियान कुछ तारीखी हवाले और गैर-मुल्की नाम भी मौजूद हैं, लिहाज़ा ज़रूर इसमें कोई गहरी हक़ीक़त छुपी होगी। लेकिन हक़ीक़त यह है कि तवील तहरीर का हक़ीक़त से कोई लाज़िमी ताल्लुक़ नहीं होता। कई मरतबा सबसे बड़े गुमान और ग़लतफ़हमियाँ उन्हीं तहरीरों के अंदर छुपी होती हैं जो ज़ाहिर में बहुत मुतास्सिर-कुन लगती हैं। सोशल मीडिया दरअसल एक नफ़्सियाती मैदान भी है। जब कोई बात दो-चार जुमलों में कही जाती है तो क़ारी उसे जल्द समझ लेता है और उस पर सवाल भी उठा देता है। मगर जब वही बात दो-तीन हज़ार अल्फ़ाज़ में बयान कर दी जाए, उसमें कुछ फ़लसफ़ियाना इस्तिलाहात, तारीखी वाक़ियात और जज़्बाती तर्ज़-ए-बयान शामिल कर ...

रहबर-ए-मोअज़्ज़म: हिम्मत, सियासत और वफ़ादारी की मिसाल

रहबर ए मोज़्ज़म,खामेनई साहब आपकी बहादुरों वाली ज़िंदगी को भी सलाम और आपकी फ़ख्र वाली शहादत को भी सलाम। हमें फ़ख्र है आप “Nation Of Father” से डरे नहीं,आप Nation Of Father के Father के आगे भी झुके नहीं, हमे फ़ख्र है आपने Nation Of Father के लिये लौंडा नाच नहीं किया,हमें फ़ख्र है आप एक ट्वीट तो छोड़िये बल्कि उसकी खुली धमकी और ऑफर पर भी “सरेंडर” नहीं किये ,हमें फ़ख्र है आपने किसी विष गुरु की तरह नाटक और ड्रामा नहीं किया,हमें फ़ख्र है आपने अपने मुल्क को Nation Of Father के Father के कदमों मे गिरवी नहीं रखा, हमें फ़ख्र है आपने हमारे गुरुर का सौदा नहीं किया,हमें फ़ख्र है आप बंकरों मे छुपे नहीं,हमें फ़ख्र है आप भागे नहीं, हमें आपकी ज़िंदगी पर फ़ख्र है हमें आपकी शहादत पर फ़ख्र है। बतौर हिंदुस्तानी हम हमेशा शुक्रगुज़ार रहेंगे आपके, कश्मीर जैसे मामले पर आपने संयुक्त राष्ट्र मे भारत का खुला समर्थन किया, अमेरिका के तमाम दबाव के बाद भी आपने एक नहीं बल्कि कई बार भारत को अपना समर्थन दिया।आपने पाकिस्तान के खिलाफ़ हमेशा हमारा साथ दिया,ऊर्जा के क्षेत्र में आपने भारत को सुरक्षा मुहैया करवाई,आपने भारत को सस्ता ...

From Superpowers to Surrender: The Harsh Reality of Modern Warfare

पूर्व सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर 20 लाख बम गिराए, लेकिन जंग हार गया।  अमेरिका ने वियतनाम पर 75 लाख बम गिराए, पर हारकर भागना पड़ा।  फिर अमेरिका ने अफगानिस्तान पर 2 लाख बम गिराए, तब भी तालिबान डटा रहा।  सिर्फ़ बम गिराने से अगर जंग जीता गया होता तो आज ईरान समझौते की टेबल पर होता।  लेकिन, कल अमेरिका ने तकरीबन पूरे मिडिल ईस्ट से भागना ठीक समझा।  सारे दूतावास बंद। सैनिक होटलों में और अमेरिकी मदद बंद। यही ईरान का वॉर मॉडल है, जिसकी ताकत भारत में नहीं है।  भारत अब सुविधाभोगी है। वह उस 60–70 के दशक में नहीं लौटना चाहता, जब हमने लड़ाइयां जीती थी।  हमें खाने को चाइनीज चाहिए, पिज्जा चाहिए, पीने को कोक। शॉपिंग को आलीशान मॉल, चलने को चमचमाती सड़कें और दौड़ने को कार।  हमारी इकॉनमी बेबस है और इस विकास को कायम रखने की कोई भी कीमत चुकाकर हम कॉम्प्रोमाइज्ड होने के लिए तैयार हैं।  नतीज़ा–सामने एक सरेंडर का चेहरा है। एक भ्रष्ट, आतंकी सत्ता।  कानून–व्यवस्था को एक तरफ रख भी दें तो इस विकास की हम क्या कीमत चुका रहे हैं? अपनी आत्मनिर्भरता और सार्वभौमिकता को गि...