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हिंदुस्तानी सियासत में हलचल: मधु किश्वर के इत्तिहामात (Allegations) ने खड़ा किया बड़ा सवाल

हिंदुस्तानी सियासत (Politics) में अक्सर ऐसे लम्हात आते हैं जब कोई एक बयान पूरा मंजरनामा (Scenario) बदल देता है। हालिया दिनों में एक ऐसा ही बयान सामने आया है, जिसने न सिर्फ़ सियासी हलकों में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि अवाम (Public) के दरमियान भी गहरी बहस छेड़ दी है। मधु किश्वर, जो कभी हुकूमत के करीब मानी जाती थीं और एक खास सियासी तफक्कुर (Ideology) की हामी रही हैं, उनके ताज़ा इज़हारात (Statements) ने कई सवालात को जन्म दिया है। उन्होंने अपने बयान में कुछ संगीन इत्तिहामात (Serious Allegations) पेश किए हैं, जिनमें शख्सियाती और सियासी दोनों पहलुओं का ज़िक्र मिलता है। अहम बात ये है कि ये इत्तिहामात किसी अदालती फैसले या मुस्तनद (Verified) तहक़ीक़ (Investigation) से साबित नहीं हुए हैं, बल्कि एक शख्सी तजुर्बे और राय (Opinion) के तौर पर सामने आए हैं। लेकिन सियासत की दुनिया में अक्सर राय भी एक ताक़तवर अस्लाह (Weapon) बन जाती है, जो अवामी ज़ेहन (Public Mind) को मुतास्सिर करती है। ये मामला सिर्फ़ एक शख्स या एक बयान तक महदूद नहीं है, बल्कि ये उस बड़े मसले की तरफ इशारा करता है जहाँ सियासी शख्सियात (Po...

तवील तहरीरों का फ़रेब: सोशल मीडिया में सियासी एक्टिविज़्म या फ़िक्र की तिजारत?

आज के दौर-ए-सोशल मीडिया में एक अजीब सा रुझान पैदा हो गया है। बहुत से लोग तवील तहरीरें लिखते हैं, या कहीं से कोई लंबा मज़मून नक़ल करके पेश कर देते हैं, और फिर खुद को “सियासी एक्टिविस्ट”, “मुफक्किर”, “तजज़िया-निगार” या “इंटेलेक्चुअल” के लिबास में पेश करते हैं। आम क़ारी जब ऐसी तहरीर पढ़ता है तो अक्सर एक वहम का शिकार हो जाता है। उसे महसूस होता है कि मज़मून बहुत लंबा है, अल्फ़ाज़ में कुछ साक़िलपन है, दरमियान-दरमियान कुछ तारीखी हवाले और गैर-मुल्की नाम भी मौजूद हैं, लिहाज़ा ज़रूर इसमें कोई गहरी हक़ीक़त छुपी होगी। लेकिन हक़ीक़त यह है कि तवील तहरीर का हक़ीक़त से कोई लाज़िमी ताल्लुक़ नहीं होता। कई मरतबा सबसे बड़े गुमान और ग़लतफ़हमियाँ उन्हीं तहरीरों के अंदर छुपी होती हैं जो ज़ाहिर में बहुत मुतास्सिर-कुन लगती हैं। सोशल मीडिया दरअसल एक नफ़्सियाती मैदान भी है। जब कोई बात दो-चार जुमलों में कही जाती है तो क़ारी उसे जल्द समझ लेता है और उस पर सवाल भी उठा देता है। मगर जब वही बात दो-तीन हज़ार अल्फ़ाज़ में बयान कर दी जाए, उसमें कुछ फ़लसफ़ियाना इस्तिलाहात, तारीखी वाक़ियात और जज़्बाती तर्ज़-ए-बयान शामिल कर ...