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सियासत का मज़ाक या हक़ीक़त? 2×2 का जवाब और हुकूमती बयानीया का फ़लसफ़ा

कभी-कभी एक मामूली सा मज़ाहिया वाक़िआ (Incident) इतनी गहरी हक़ीक़त को बेनक़ाब कर देता है कि बड़े-बड़े सियासी तजज़िये (Political Analyses) भी उसके सामने फीके पड़ जाते हैं। “2×2 का जवाब” वाला यह किस्सा भी महज़ एक लतीफ़ा (Joke) नहीं, बल्कि हमारे दौर की सियासी फ़िक्र (Political Thinking) और बयानीये (Narrative) का आइना है। जब एक बच्चा ये कहता है कि उसने “5” बताया और बाकी “11” तक पहुँच गए, तो ये सिर्फ़ जहालत (Ignorance) की निशानी नहीं, बल्कि एक ऐसे निज़ाम (System) की झलक है जहाँ सही जवाब की अहमियत कम और खुश करने की सियासत ज़्यादा अहम हो जाती है। यही वो नुक्ता (Point) है जहाँ मज़ाह, हक़ीक़त में तब्दील होता है। सियासत में अक्सर देखा गया है कि बयानीया (Narrative) हक़ीक़त (Reality) पर भारी पड़ जाता है। सही जवाब “4” होता है ये बात भी सभी जानते है, मगर अगर महफ़िल (Power Circle) में “5” या “11” पसंद किया जा रहा हो, तो लोग उसी को दोहराने लगते हैं। ये अमल सिर्फ़ फ़र्दी (Individual) नहीं, बल्कि इज्तिमाई (Collective) सूरत इख़्तियार कर लेता है। इस तरह की सियासी रवायत (Tradition) में असल मसला ये नहीं होता ...