1857: मिर्ज़ा ग़ालिब के शब्दों में - मिर्ज़ा असदुल्लाह खान ग़ालिब को अक्सर बिना किसी राजनीतिक राय वाला रोमांटिक शायर माना जाता है। इस तथ्य को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है कि वह 1857 के विद्रोह के दौरान दिल्ली में रहते थे और प्रभावित थे। ग़ालिब और उनकी पत्नी दो दिनों तक बिना भोजन और पानी के बंद रहे और तीसरे दिन उन्हें पटियाला के महाराजा द्वारा भेजे गए सैनिकों द्वारा बचाया गया। ब्रिटिश सैनिकों ने गालिब की पत्नी के सभी कीमती सामान और गहने लूट लिए और उनके कैद किए गए दोस्तों और रिश्तेदारों को मार डाला। अपना दुःख और असंतोष व्यक्त करने के लिए ग़ालिब ने अपने दोस्तों और परिवार को पत्र लिखे। ग़ालिब ने अपने बहनोई अलाउद्दीन अहमद खान को लिखे एक पत्र में अंग्रेजों के हाथों भारतीयों की हार पर शोक व्यक्त करते हुए एक कविता लिखी थी जिसमें बताया गया था कि कैसे दिल्ली का प्रत्येक धूल कण मुस्लिम खून का प्यासा है। एक अन्य पत्र में उन्होंने बताया कि कैसे दिल्ली एक सैन्य छावनी में तब्दील हो गई। अल्लाह अल्लाह दिल्ली ना रही, चवन्नी है, ना किला, ना शहर, ...
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