कुछ अश्आर महज़ अल्फ़ाज़ नहीं होते, बल्कि रूह के उन मक़ामात की तर्जुमानी करते हैं जहाँ इंसान अपनी ही ज़ात से बेगाना होने लगता है। यह ग़ज़ल भी उसी कैफ़ियत की पैदाइश है एक ऐसी रात की, जहाँ तन्हाई सिर्फ़ कमरे में नहीं बल्कि नस-नस में उतर आई थी। इस ग़ज़ल का मर्कज़ी एहसास “दुख” है, मगर यह कोई सीधा-सादा ग़म नहीं; बल्कि इद्राक, हिज्र, ख़ामोशी, हैरानी और वक़्त की गर्द से बना हुआ वह रूहानी बोझ है जो इंसान उम्र भर अपने अंदर उठाए फिरता है। “सुब्ह-ए-फ़ुर्क़त” से “शब-ए-गेसू” तक, “दश्त-ए-इद्राक” से “कूचा-ए-अय्याम” तक, हर इस्तिआरा इस बात की गवाही देता है कि मैने दर्द को महज़ महसूस नहीं किया, बल्कि उसे जिया है। यह ग़ज़ल उस दिल की आवाज़ है जिसने दुनिया के सामने सुकूँ का चेहरा रखा, लेकिन अपनी आँखों में भरे हुए जाम का दुख किसी पर आश्कार न होने दिया। इसमें फ़ारसी तखय्युल, उर्दू की नर्मी और सूफ़ियाना इबहाम एक साथ दिखाई देते हैं। कई अश्आर ऐसे हैं जहाँ दर्द किसी महबूब की जुदाई से आगे बढ़कर वजूद की तन्हाई बन जाता है। “जाम”, “सहरा”, “बाम”, “ज़ुल्फ़”, “शबनम” और “वीराना” जैसी अलामतें सिर्फ़ हुस्न-ओ-इश्क़ की तर्जु...
मग़रिबी बंगाल में ईदुज़्ज़ुहा के मौक़े पर एक ऐसा मंज़र सामने आया जिसने हिन्दुस्तानी मुआशरे , मज़हबी सियासत और इंसानी अख़लाक़ तीनों को एक साथ आईना दिखा दिया। बताया गया कि कई मुसलमानों ने उन हिन्दू ताजिरों से गायें ख़रीदने से इनकार कर दिया जो उन्हें ईद की क़ुर्बानी के लिए बाज़ार में लाए थे। पहली नज़र में यह मंज़र कुछ लोगों को आपसी एहतराम और मज़हबी हम-आहंगी का नमूना मालूम हो सकता है , लेकिन अगर इस वाक़िआ की तह में उतरकर देखा जाए तो यह महज़ एक मज़हबी-सियासी तदबीर से ज़्यादा कुछ दिखाई नहीं देता। असल सवाल यह है कि अगर गाय की जगह किसी दूसरे जानवर की क़ुर्बानी दी जाएगी तो क्या इंसानी रहम , अख़लाक़ और ज़मीर का मसला हल हो जाता है ? अगर एक जान बचाकर दूसरी जान ले ली जाए तो क्या उसे रहमत और परहेज़गारी कहा जाएगा ? जान तो हर मख़लूक़ को अज़ीज़ होती है। दर्द का एहसास सिर्फ़ इंसान तक महदूद नहीं। जिस तरह इंसान मौत से डरता है , उसी तरह एक बकरी , भेड़ , भैंस या गाय भी अपनी ज़िन्दगी से मोहब्बत करती है। यही वजह है कि बहुत से अक़्लपरस्त और रहम-दिली में यक़ीन रखने वाले लोग क़ुर्बानी की पूरी रवायत को ही नैतिक एतिबार से सवालि...