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सोशल मीडिया का दौर और अदब की गिरती पहचान

दोस्तो - आप सब से एक दिल की बात कहने का मन है सो कर  रहा हूं । पिछले कुछ अरसे से महसूस कर रहा हूं के सोशल मीडिया अगर अदब और शायरी और संगीत के हक़ में ज़ियादा फायदेमंद साबित हुआ है तो उससे कहीं ज़ियादा नुक़सान दायक भी हुआ है । उन शायरों और सिंगर्स के लिए जो बहुत बेहतरीन शायर हैं, गायक है लेकिन उन्हें वो मक़ाम  वो प्लेटफॉर्म नहीं मिला जो मिलना चाहिए था । ये सब पहले भी होता आया होगा।  मगर आज कल बहुत ज़ियादा देखने को मिल रहा है । हैरानी इस बात की है अधिकतर नॉर्मल और  फूहड़ शायरों और कवियों ने मुशायरों पर कब्ज़ा किया हुआ है। नादान कन्वीनर भी इस बात के ज़िम्मेदार हैं जिन्हें शायरी की गहरी समझ नहीं बस किसी भी शायर की रील के व्यूअर्स देख कर उसको बेहतरीन शायर या कवि समझ लेते है । या किसी मारुफ़ शायर के कहने पर उस शायर,शायरात, कवि को लगातार मुशायरों में कलाम पेश करने का मौक़ा देते रहते हैं । ये उनके लिए तो बहुत अच्छी बात हो सकती है लेकिन इसका नुक़सान ये होता है के आम इंसान जो शायरी को पसंद तो करते है मगर बेहतरीन शायरी से जुदा और महदूद रह जाते हैं उनको लगता है वो जो शायरी मुशायरों...
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क्या भारत को जंग में घसीटा जा रहा है? हिन्द महासागर की बड़ी घटना

सदियों में जो ना हुआ वो हो गया ,  कल अमेरिका ने ईरान के युद्धपोत IRIS DENA को श्रीलंका के पास   डुबो दिया , जिसमें 100-150 ईरान के सैनिक मारे गए ,  वहीं भारत में बहस छिड़ गई कि ये ईरान का युद्धपोत भारत द्वारा आयोजित इंटरनेशनल फ़्लीट रिव्यू और  MILAN -2026 के नौसैना अभ्यास के लिए आया था और विशाखापट्टनम से निकलने के बाद श्रीलंका के पास अमेरिका ने पनडुब्बी से उड़ा दिया जो कि भारत का मेहमान था , भारत की जिम्मेदारी बनती है ,  शायद ये बहस भारत की नैतिक जिम्मेदारी की हो रही है वहीं लोग कह रहे हैं भारत की जल सीमा 12 NM पर खत्म हो जाती है क्योंकि 12 NM से आगे अंतराष्ट्रीय जल सीमा चालू हो जाती है ,  अब मुद्दे पर आते हैं , क्या भारत की जल सीमा 12 नॉटिकल मील है ??  क्या भारत की जिम्मेदारी 12 नॉटिकल मील दूर खत्म हो जाती है ??  आपको जानकारी दुरुस्त करना चाहता हूँ किसी देश की जमीन से 12 समुद्री मील की दूरी तक उसका टेरिटोरियल क्षेत्र होता है जो कि सही है ,  अब बात जिम्मेदारी की आती है तो भारत हिन्द महासागर में 12 समुद्री मील तक सीमित नहीं है ,  भार...

From Superpowers to Surrender: The Harsh Reality of Modern Warfare

पूर्व सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर 20 लाख बम गिराए, लेकिन जंग हार गया।  अमेरिका ने वियतनाम पर 75 लाख बम गिराए, पर हारकर भागना पड़ा।  फिर अमेरिका ने अफगानिस्तान पर 2 लाख बम गिराए, तब भी तालिबान डटा रहा।  सिर्फ़ बम गिराने से अगर जंग जीता गया होता तो आज ईरान समझौते की टेबल पर होता।  लेकिन, कल अमेरिका ने तकरीबन पूरे मिडिल ईस्ट से भागना ठीक समझा।  सारे दूतावास बंद। सैनिक होटलों में और अमेरिकी मदद बंद। यही ईरान का वॉर मॉडल है, जिसकी ताकत भारत में नहीं है।  भारत अब सुविधाभोगी है। वह उस 60–70 के दशक में नहीं लौटना चाहता, जब हमने लड़ाइयां जीती थी।  हमें खाने को चाइनीज चाहिए, पिज्जा चाहिए, पीने को कोक। शॉपिंग को आलीशान मॉल, चलने को चमचमाती सड़कें और दौड़ने को कार।  हमारी इकॉनमी बेबस है और इस विकास को कायम रखने की कोई भी कीमत चुकाकर हम कॉम्प्रोमाइज्ड होने के लिए तैयार हैं।  नतीज़ा–सामने एक सरेंडर का चेहरा है। एक भ्रष्ट, आतंकी सत्ता।  कानून–व्यवस्था को एक तरफ रख भी दें तो इस विकास की हम क्या कीमत चुका रहे हैं? अपनी आत्मनिर्भरता और सार्वभौमिकता को गि...

जंग, जमीर और विजयी भाव का वहम

क्या जंग सिर्फ मैदान मे दुश्मन को हराकर जीती जाती है.. अगर जंग जीतने का यही पैमाना है तो फिर इस दुनिया मे कमज़ोर को ज़िंदा रहने का कोई हक नहीं। मुझे याद है कि सिक्सथ की उर्दू की किताब मे एक सबक "अब्बू ख़ां की बकरी" के उन्वान से था जिसमे अब्बू ख़ां की तमाम बकरियां रेवड़ के उसूलों को फ़ालो करती थीं सिवाये चांदनी के, और कभी पहाड़ी के उस तरफ़ नहीं जाती थीं जिधर एक भेड़िया रहता था मगर चांदनी एक रात रेवड़ से अलग होकर पहाड़ी के उस तरफ़ गयी और सारी रात उस भेड़िये से लड़कर सुब्ह को हलाक हो गयी। भेड़िये के दांत और पंजे चांदनी से ज़्यादा मज़बूत थे तो आख़िर में चांदनी को मारा जाना था लेकिन क्या चांदनी सिर्फ यूंही मारी गयी कि उसके पास नुकीले दांत और पंजे ना होकर सिर्फ दो सींग थे। नहीं वह इसीलिए मारी गयी क्योकि बकरियो के उस रेवड़ मे उसके अलावा किसी मे भेड़िये से लड़ने का हौसला नहीं था। इस कहानी को सुनिये और एक अपना साइक्लोजिकल टैस्ट कीजिये। अगर आप इस कहानी को पढते हुये भेड़िये के तरफदार हैं तो आप इतने बुज़दिल हैं कि हर हाल मे जीतने वाले की तरफ़ होकर एक जीती हुयी साइड मे होने का साइक्लोजिकल...

सौरभ द्विवेदी और पुरुषोत्तम अग्रवाल Saurabh Dwivedi and Purshottam Aggarwal JNU Delhi

सौरभ द्विवेदी के आगे फैलने का नहीं; यहां तक कि पुरुषोत्तम अग्रवाल को भी नहींः कुछ लोग सवाल करने के बजाय भाषण देने लग जाते हैं, उससे आज बचना है. अधिकतम तीन वाक्यों में अपना सवाल करना है… मॉडरेटर सौरभ द्विवेदी की इस स्पष्ट घोषणा के बावज़ूद प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल सवाल करने के नाम पर फैलने लग जाते हैं और तब द्विवेदी इस बात का ख़याल नहीं करते कि अग्रवाल उनके गुरु हैं जिन्हें वो इस बातचीत के दौरान मेरे उस्ताद- मेरे उस्ताद से लेकर उनके कॉलम मुखामुखम तक शामिल करते हुए “ज्ञान परिवेश” की निर्मिति करते हैं. द्विवेदी के पास ऐसे अनगिनत भभूत होते हैं और वो जानते हैं कि किस भभूत से कब, कैसे माहौल ऑब्लिक भौकाल बनाया जाता है. प्रोफेसर अग्रवाल जैसे ही फैलने की कोशिश करते हैं, द्विवेदी अपने इस उस्ताद और जेएनयू से अग्गा-पिच्छा संबंध किनारे रखकर एकदम पेशेवर अंदाज़ पर उतर आते हैं- प्रोफेसर, एक मिनट-एक मिनट..करने के साथ दो-तीन निर्गुणिया वाक्य के टुकड़े का इस्तेमाल करके साफ़ जतला देते हैं कि उस्ताद ! आज की इस महफ़िल में सिर्फ मैं फैल सकता हूं बल्कि हम कोई भी महफ़िल तब तक नहीं सजाते या उसका हिस्सा बनते हैं ...