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बंगाल में गायों का बायकॉट: मज़हबी रियाकारी, क़ुर्बानी और इंसानी अख़लाक़ पर एक तल्ख़ तज्ज़िया

  मग़रिबी बंगाल में ईदुज़्ज़ुहा के मौक़े पर एक ऐसा मंज़र सामने आया जिसने हिन्दुस्तानी मुआशरे , मज़हबी सियासत और इंसानी अख़लाक़ तीनों को एक साथ आईना दिखा दिया। बताया गया कि कई मुसलमानों ने उन हिन्दू ताजिरों से गायें ख़रीदने से इनकार कर दिया जो उन्हें ईद की क़ुर्बानी के लिए बाज़ार में लाए थे। पहली नज़र में यह मंज़र कुछ लोगों को आपसी एहतराम और मज़हबी हम-आहंगी का नमूना मालूम हो सकता है , लेकिन अगर इस वाक़िआ की तह में उतरकर देखा जाए तो यह महज़ एक मज़हबी-सियासी तदबीर से ज़्यादा कुछ दिखाई नहीं देता। असल सवाल यह है कि अगर गाय की जगह किसी दूसरे जानवर की क़ुर्बानी दी जाएगी तो क्या इंसानी रहम , अख़लाक़ और ज़मीर का मसला हल हो जाता है ? अगर एक जान बचाकर दूसरी जान ले ली जाए तो क्या उसे रहमत और परहेज़गारी कहा जाएगा ? जान तो हर मख़लूक़ को अज़ीज़ होती है। दर्द का एहसास सिर्फ़ इंसान तक महदूद नहीं। जिस तरह इंसान मौत से डरता है , उसी तरह एक बकरी , भेड़ , भैंस या गाय भी अपनी ज़िन्दगी से मोहब्बत करती है। यही वजह है कि बहुत से अक़्लपरस्त और रहम-दिली में यक़ीन रखने वाले लोग क़ुर्बानी की पूरी रवायत को ही नैतिक एतिबार से सवालि...
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सियासी मंज़रनामा: मोदी का असर, राहुल की उम्मीदें और 2029 की सियासत

कल बहुत अर्से बाद ऐसा हुआ कि वज़ीर-ए-आज़म का ख़िताब था और उनके अपने सफ़्हे पर देखने वालों की तादाद अक्सर औक़ात लाख से भी नीचे रही। ट्विटर पर एक मरतबा ज़रूर तादाद 1.37 लाख के क़रीब पहुँची जब तक़रीर ख़त्म होने में १०–१२ मिनट बाक़ी थे। भाजपा के सफ़्हे पर तो ये तादाद ढाई हज़ार तक पहुँचना भी मुश्किल लग रही थी। मोदी एक कल्ट की शक्ल में उभरे, लेकिन २०१९ के बाद उस जादू में कमी आने लगी। मिडिल क्लास जो उनके साथ मुंसलिक था, उसी तबक़े को सबसे ज़्यादा तकलीफ़ हुई। राम मंदिर बनने के बाद जब हर तरफ़ ४०० का आंकड़ा बताया जा रहा था, मैंने अपने पंचायती चैनल पर शुब्हा ज़ाहिर किया था और पहले मरहले के इंतिख़ाबात के बाद मेरी हिसाब-किताब २४५ सीट के क़रीब की थी। (वीडियो वहीं मौजूद है।) उस वक़्त भी बहुत से हामी और मुख़ालिफ़ दोनों ही इस तादाद के ख़िलाफ़ थे। मोदी के परस्तार क्यों मुख़ालिफ़ थे, ये आप समझ सकते हैं, और राहुल गांधी के नए हामी वोटिंग पैटर्न और अवामी रवैये के मंतिक को उतना ही समझते हैं जितना तमिलनाडु के लोग हिंदी। बहरहाल, एक बात तय है कि मोदी अब अगले लोकसभा इंतिख़ाबात में कोई जादू पैदा नहीं कर सकते। उनकी...

दुनिया जंग के मुहाने पर नहीं… बयानियों के जाल में क़ैद है

यह जो फिज़ा में एक बेचैनी सी तैर रही है, यह महज़ ख़बरों का शोर नहीं… बल्कि बयानियों की वो धुंध है, जिसमें हक़ीक़त की शक्ल धुंधली पड़ जाती है। कहा जा रहा है कि क्यूबा अंधेरों में डूब चुका है, अमेरिका ने उसकी सांसें रोक दी हैं, और रूस एक तेल से भरे जहाज़ के साथ मैदान में उतर आया है मानो बस एक चिंगारी बाकी है और दुनिया जंग-ए-अज़ीम की आग में झुलस जाएगी। मगर सवाल यह है कि क्या मंज़रनामा वाक़ई इतना सीधा और सादा है? क्यूबा की हालत बेशक नाज़ुक है। बरसों की पाबंदियां, कमज़ोर मआशियत और ईंधन की किल्लत ने वहां के निज़ाम-ए-ज़िंदगी को हिला कर रख दिया है। अस्पतालों की रौशनी मंद है, सड़कों पर सन्नाटा है, और अवाम एक गैर-यक़ीनी कल के साए में जी रही है। लेकिन यह तस्वीर एक-रुख़ी नहीं… यह मुकम्मल तबाही नहीं, बल्कि लंबे दबाव का नतीजा है, जिसे सनसनीख़ेज़ अल्फ़ाज़ में “अंधेरे में डूबा मुल्क” बना दिया गया है। फिर आता है रूसी जहाज़ का क़िस्सा, एक ऐसा बयानिया जिसे इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे अमेरिका के पास दो ही रास्ते बचे हों: या तो जहाज़ रोके और जंग मोल ले, या उसे जाने दे और अपनी साख गंवा दे। हालांकि हक़ीक़...

सियासत का मज़ाक या हक़ीक़त? 2×2 का जवाब और हुकूमती बयानीया का फ़लसफ़ा

कभी-कभी एक मामूली सा मज़ाहिया वाक़िआ (Incident) इतनी गहरी हक़ीक़त को बेनक़ाब कर देता है कि बड़े-बड़े सियासी तजज़िये (Political Analyses) भी उसके सामने फीके पड़ जाते हैं। “2×2 का जवाब” वाला यह किस्सा भी महज़ एक लतीफ़ा (Joke) नहीं, बल्कि हमारे दौर की सियासी फ़िक्र (Political Thinking) और बयानीये (Narrative) का आइना है। जब एक बच्चा ये कहता है कि उसने “5” बताया और बाकी “11” तक पहुँच गए, तो ये सिर्फ़ जहालत (Ignorance) की निशानी नहीं, बल्कि एक ऐसे निज़ाम (System) की झलक है जहाँ सही जवाब की अहमियत कम और खुश करने की सियासत ज़्यादा अहम हो जाती है। यही वो नुक्ता (Point) है जहाँ मज़ाह, हक़ीक़त में तब्दील होता है। सियासत में अक्सर देखा गया है कि बयानीया (Narrative) हक़ीक़त (Reality) पर भारी पड़ जाता है। सही जवाब “4” होता है ये बात भी सभी जानते है, मगर अगर महफ़िल (Power Circle) में “5” या “11” पसंद किया जा रहा हो, तो लोग उसी को दोहराने लगते हैं। ये अमल सिर्फ़ फ़र्दी (Individual) नहीं, बल्कि इज्तिमाई (Collective) सूरत इख़्तियार कर लेता है। इस तरह की सियासी रवायत (Tradition) में असल मसला ये नहीं होता ...

हिंदुस्तानी सियासत में हलचल: मधु किश्वर के इत्तिहामात (Allegations) ने खड़ा किया बड़ा सवाल

हिंदुस्तानी सियासत (Politics) में अक्सर ऐसे लम्हात आते हैं जब कोई एक बयान पूरा मंजरनामा (Scenario) बदल देता है। हालिया दिनों में एक ऐसा ही बयान सामने आया है, जिसने न सिर्फ़ सियासी हलकों में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि अवाम (Public) के दरमियान भी गहरी बहस छेड़ दी है। मधु किश्वर, जो कभी हुकूमत के करीब मानी जाती थीं और एक खास सियासी तफक्कुर (Ideology) की हामी रही हैं, उनके ताज़ा इज़हारात (Statements) ने कई सवालात को जन्म दिया है। उन्होंने अपने बयान में कुछ संगीन इत्तिहामात (Serious Allegations) पेश किए हैं, जिनमें शख्सियाती और सियासी दोनों पहलुओं का ज़िक्र मिलता है। अहम बात ये है कि ये इत्तिहामात किसी अदालती फैसले या मुस्तनद (Verified) तहक़ीक़ (Investigation) से साबित नहीं हुए हैं, बल्कि एक शख्सी तजुर्बे और राय (Opinion) के तौर पर सामने आए हैं। लेकिन सियासत की दुनिया में अक्सर राय भी एक ताक़तवर अस्लाह (Weapon) बन जाती है, जो अवामी ज़ेहन (Public Mind) को मुतास्सिर करती है। ये मामला सिर्फ़ एक शख्स या एक बयान तक महदूद नहीं है, बल्कि ये उस बड़े मसले की तरफ इशारा करता है जहाँ सियासी शख्सियात (Po...