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सिनो हक़ीक़त बनाम हिंदुस्तानी तखय्युल: तामीर (Development) की दौड़ में हम कहाँ खड़े हैं?

चाइना हमसे कितना आगे है, 50 साल, सौ साल या 500 सौ साल? जो लोग टीवी को ज्ञान और खबरों का श्रोत मान लिए वे न सिर्फ अपना बल्कि अनजाने में इस देश और आने वाली पीढ़ी का भविष्य खराब कर रहे हैं। सच तो यह है कि हमारी सरकार कुछ कर ही नहीं रही है सिवाय टीवी शोज और प्रोपेगंडा के। इस टीवी शो और प्रोपेगंडा के सबसे बड़े ग्राहक अंधभक्त है, ऐसे अंधभक जो आज भी इस भ्रम में जी रहे हैं कि केवल टीवी पर बकलोली करने से, नारा गढ़ने, प्रोपेगंडा और नैरेटिव बनाने से देश आगे बढ़ सकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि आज के समय में वही देश आगे बढ़ रहा है, जो धर्म जाती और नफरत की राजनीति से बाहर निकल कर, अंधविश्वास और पाखंड से बाहर निकल कर विज्ञान, टेक्नोलॉजी, रिसोर्स डेवलपमेंट, स्किल्ड डेवलपमेंट, वर्कफोर्स और मजबूत शिक्षा व्यवस्था पर काम कर रहा है। चीन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज अगर आप बाजार में जाएं, किसी भी इलेक्ट्रॉनिक सामान चाहे वह मोबाइल हो, कंप्यूटर हो या उनके चिप हो, उसको देखें, तो उसमें ज्यादा से ज्यादा चीन के सामान मिलेंगे। चीन ने क्या कुछ नहीं किया है, इंसान की जरूरतों के लिए हर एक सामान का एडवांस लेवल पर रिसर्...
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An Official Record of My Ghazals & Poetic Ownership

📜 Copyright Declaration I, Mohd Tariq Azim (official), in the poetic world known as Tariq Azeem Tanha, hereby declare that all the ghazals and verses presented below are my original creations. I had shared these works with a senior singer/Qawwal (Rizwan Ji) from my village (whom I respectfully address as “Chacha”) solely for singing and recitation purposes on 22 March 2026. This publication is made only to establish and affirm my intellectual ownership (copyright) over these works. Any use, reproduction, publication, or presentation of these verses without my explicit permission shall be considered unethical and unlawful. 📜 इज़्हार-ए-हक़ (कॉपीराइट बयान) मैं, मोहम्मद तारिक़ अज़ीम (ऑफिशियल), शायरी की दुनिया में “तारिक़ अज़ीम तनहा”, ब-इज़्हार अर्ज़ करता हूँ कि यहाँ दर्ज तमाम ग़ज़लियात व अशआर मेरी ज़ाती तख़्लीक़ हैं। इन्हें मैंने अपने गाँव के एक बुज़ुर्ग गायक/क़व्वाल (रिज़वान जी), जिन्हें मैं अदब से “चाचा” कहता हूँ, के पास महज़ तरन्नुम (गायन) व पेशकश के लिए दिनांक 22 मार्च 2026 को साझा क...

हक़ीक़त का इन्किशाफ़: क्या ईरान का न्यूक्लियर ख़तरा महज़ एक बहाना था?

दुनिया की सियासत में कभी-कभी एक बयान ऐसा आता है जो पूरे बयानिये (Narrative) को हिला देता है। हालिया दिनों में कुछ ऐसा ही मंजर तब देखने को मिला जब Tulsi Gabbard की गवाही ने वॉशिंगटन के गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया। यह महज़ एक इत्तिला (Information) नहीं थी, बल्कि उस तर्क की जड़ को छूती हुई बात थी, जिस पर पूरी जंग का जواز (Justification) खड़ा किया गया था। गवाही के मुताबिक़, 2025 में हुए हमलों के बाद ईरान ने अपने न्यूक्लियर एनरिचमेंट (Nuclear Enrichment – परमाणु संवर्धन) प्रोग्राम को दोबारा शुरू करने की कोई कोशिश नहीं की। यहाँ तक कहा गया कि “ऑपरेशन मिडनाइट हैमर” (Operation Midnight Hammer) के बाद यह प्रोग्राम इस कदर तबाह हो चुका था कि उसकी बहाली की कोई ठोस निशानी सामने नहीं आई। अब सवाल यह उठता है कि अगर ख़तरा मौजूद ही नहीं था, तो फिर उस ख़तरे के नाम पर जंग क्यों छेड़ी गई? Donald Trump और उनके इदारे (Administration) लगातार यह कहते रहे कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा (Nuclear Ambition) एक बड़ा ख़तरा है, और इसे रोकने के लिए फौजी कार्रवाई ज़रूरी थी। मगर जब इंटेलिजेंस (Intelligence – ...

सियासत का खेल या इंसानियत का फ़रेब: जंग, नफ़ा और खामोश ज़मीर की दास्तान

अगर तुकबंदी में कहा जाए तो मंजर कुछ यूँ है चिराग़ नहीं, यहाँ सियासत का धुआँ है, हर फैसला इंसानियत नहीं, मुफ़ाद का कुआँ है। दुनिया की सियासत (Politics) में अक्सर एक ख़याल परोसा जाता है कि कुछ ममालिक (Countries) ऐसे हैं जो चाहें तो जंग रोक सकते हैं, बस इशारा करें और बारूद की बू ख़त्म हो जाए। मगर जब हक़ीक़त की ज़मीन पर कदम रखा जाता है, तो यह ख्वाब एक तिलिस्म (Illusion) से ज़्यादा कुछ नहीं लगता। यह कहना आसान है कि फलाँ मुल्क जंग रुकवा सकता है, मगर सवाल यह है कि क्या उसके पास वाक़ई वह इख़्तियार (Authority) है, या सिर्फ़ एक सियासी तसव्वुर (Perception) है जो लोगों के ज़हन में बिठा दिया गया है? जब एक मुल्क अपनी मआशियाती (Economic) ज़रूरतों में भी मुकम्मल ख़ुदमुख़्तारी (Autonomy) हासिल नहीं कर पाता, तो वह आलमी जंग के फैसलों पर किस हद तक असरअंदाज़ हो सकता है यह सवाल अपने आप में बहुत कुछ बयान कर देता है। असल में मसला ताक़त का कम और तरजीहात (Priorities) का ज़्यादा है। जब तक आग दूर जलती है, वह सिर्फ़ एक मंजर होती है लोग उसे देखते हैं, उस पर बहस करते हैं, और कभी-कभी तो उस पर जश्न भी मनाते हैं। मगर ज...

जंग की नई सूरत: लंबी जंग, सख़्त निज़ाम और बढ़ती आग का बयानिया

कुर्सी की पेटी बाँध लीजिए, क्योंकि जो मंजर अब उभर रहा है, वह किसी जल्द ख़त्म होने वाली जंग का नहीं, बल्कि एक तवील (Long) और पेचीदा मरहले (Phase) की इब्तिदा (Beginning) है। फ़िज़ा में जो तनाव है, वह ठहरने के बजाय हर गुज़रते लम्हे के साथ और शदीद होता जा रहा है, और हालात यह इशारा दे रहे हैं कि अब यह टकराव एक मुकम्मल जंग (Full-scale Conflict) की शक्ल इख़्तियार कर सकता है। ईरान ने अपने अम्नी निज़ाम (Security Structure) के अहम चेहरों की हलाकत (Elimination) को तस्लीम (Accept) कर लिया है, और इसके साथ ही यह पैग़ाम भी दे दिया है कि जवाब ज़रूर आएगा—और वह पहले से कहीं ज़्यादा सख़्त और असरअंदाज़ होगा। मगर इस पूरे वाक़िये का असल पहलू यह है कि इन नुक़्सानात (Losses) के बावजूद ईरान की फौजी मशीनरी (Military Machine) में कोई इन्किसार (Collapse) नज़र नहीं आता। इसकी वजह साफ़ है यह निज़ाम अफ़राद (Individuals) पर नहीं, बल्कि एक मुकम्मल ढांचे (System) पर क़ायम है, जिसकी मिसाल Islamic Revolutionary Guard Corps जैसे इदारों से मिलती है, जहाँ हर ओहदे के लिए मुनासिब जानशीन (Successor) पहले से तय होता है। यानी यहा...