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Mai Kuch Soch Raha Hu | मैं कुछ सोच रहा हूँ | तारिक़ अज़ीम तनहा

दिल ढूँढता है जाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ ऐ साक़ी-ए-गुलफ़ाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ क्या कीजिए अब काम, मैं कुछ सोच रहा हूँ आ पहुँचा तिरा नाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ इस दौर ने इंसान को बाज़ार बनाया क्या है मेरा अंजाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ गुम है मिरे अहसास का इक शहर-ए-मुसलसल किस पर रखूँ इल्ज़ाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ मरना भी ज़रूरी है मगर जल्द नहीं है बाक़ी हैं कई काम, मैं कुछ सोच रहा हूँ आने की ख़बर है तो उजालों को बुला लो ऐ काकुल-ए-गुलफ़ाम मैं कुछ सोच रहा हूँ किस तरह तेरे नाम से आबाद था आलम अब कैसी हुई शाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ नक़्शों में नहीं मिलता वो गुमगश्ता-सा आलम ढूँढूँ किसे हर गाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ तहज़ीब के चेहरे पे उदासी है मुसल्सल किस ने किया ये काम, मैं कुछ सोच रहा हूँ आँखों में तिरी दीद की ताबिन्दा तजल्ली हाथों में लिए जाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ दिल कहता है फिर आज उसी राह से गुज़रूँ ऐ हसरत-ए-नाकाम मैं कुछ सोच रहा हूँ मस्जिद में भी देखा है उसे, दैर में मैंने क्या उसका है इक नाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ तस्बीह भी, ज़ुन्नार भी, मयख़ाना भी, दरगाह क्या चीज़ है ये जाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ आँखों...
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हिज्र, याद और टूटे आँगन की ग़ज़ल – एक दर्द-आलूद रूहानी सफ़र | तारिक़ अज़ीम ‘तनहा’ | Tariq Azeem Tanha

मेरी यह ग़ज़ल दरअसल किसी एक भाव या स्थिति की कथा नहीं, बल्कि एक पूरे भीतरी संसार का दस्तावेज़ है, जहाँ इश्क़ केवल मोहब्बत नहीं रहता, बल्कि एक दार्शनिक पीड़ा में बदल जाता है। मेरे नज़दीक यह ग़ज़ल उस इंसान की आवाज़ है जो बाहर की दुनिया में मौजूद होकर भी भीतर से लगातार विस्थापित होता रहता है। मैंने इस ग़ज़ल में हिज्र को केवल जुदाई नहीं माना, बल्कि उसे एक अस्तित्वगत स्थिति (existential state) की तरह देखा है, जहाँ इंसान अपने ही भीतर अजनबी हो जाता है। इस ग़ज़ल का केंद्रीय ताना-बाना “तन्हाई”, “याद” और “टूटे हुए संबंधों” के बीच बुना गया है। हर शेर एक ऐसा दरवाज़ा है जो किसी न किसी बंद कमरे की तरफ खुलता है, जहाँ कभी बचपन है, कभी आँगन है, कभी गुलशन है, और कभी केवल राख। यह ग़ज़ल रूमानी होते हुए भी महज़ रूमानी नहीं रहती, इसमें तसव्वुफ़ की एक हल्की सी परछाईं भी है, जहाँ प्रेम बाहरी नहीं, भीतरी यात्रा बन जाता है। हर “उसे कहना” दरअसल संवाद नहीं, बल्कि एक मौन प्रार्थना है, एक अनकही फ़रियाद है जो हवाओं में तैरती रहती है। ग़ज़ल में प्रतीकों (अलामात) का बहुत सूक्ष्म प्रयोग किया हैआँगन, बचपन, गुलशन, सावन, ...

इस शम्अ को धुएँ का लबादा भी चाहिए | एक सूफ़ियाना और फ़लसफ़ियाना उर्दू ग़ज़ल | तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

ज़िंदगी की तकमील, इश्क़ की तिश्नगी और वजूद के तज़ादात पर एक फ़िक्र-अंगेज़ ग़ज़ल मेरी यह ग़ज़ल दरअसल किसी एक जज़्बे, एक तजुर्बे या एक ख़्वाहिश का बयान नहीं है। मैंने इसमें ज़िंदगी को उसकी मुकम्मल सूरत में देखने की कोशिश की है। अक्सर हम चीज़ों को उनके एक ही रुख़ से पहचानते हैं, रौशनी को रौशनी समझते हैं, दर्द को दर्द, इश्क़ को इश्क़ और तन्हाई को तन्हाई। लेकिन मेरे नज़दीक हक़ीक़त इससे कहीं ज़्यादा पेचीदा और दिलचस्प है। हर रौशनी के पीछे एक साया होता है, हर मुस्कुराहट के पीछे कोई ग़म, हर विसाल के पीछे कोई हिज्र, और हर मंज़िल के पीछे एक लंबा सफ़र। यही एहसास इस ग़ज़ल की बुनियाद बना। मतले में मैंने हिज्र और उजाले को आमने-सामने रखा है। पहली नज़र में यह एक तज़ाद मालूम होता है, मगर ग़ौर कीजिए तो यही तज़ाद ज़िंदगी की अस्ल तकमील भी है। जुदाई की रात अगर बिल्कुल तारीक हो जाए तो इंसान उम्मीद खो बैठता है। इसलिए हिज्र को भी उजाले की ज़रूरत है। अश्क अगर आँख में क़ैद रह जाए तो उसका दर्द अधूरा रह जाता है, उसे दरिया बनकर बहना पड़ता है। इस तरह ग़ज़ल का पहला शेर ही पूरी ग़ज़ल की फ़िक्र का इशारा दे देता है हर...

लम्हा लम्हा तन्हाई I | Tariq Azeem Tanha Ghazal | Urdu Ghazal

  इश्क़ , तसव्वुफ़ और ख़ुद-शनासी की एक फ़िक्र-अफ़रोज़ ग़ज़ल उर्दू शायरी की अस्ल रूह महज़ जज़्बात के इज़हार तक महदूद नहीं , बल्कि इंसानी वजूद के बातिनी जहान , उसके तजुर्बात , उसकी तन्हाइयों और उसकी रूहानी जस्तजू की तर्जुमानी भी है। पेश-ए-नज़र ग़ज़ल इसी अदबी और फ़िक्री रिवायत की एक दिलकश मिसाल है , जिसमें इश्क़ की लताफ़त , हिज्र की कैफ़ियत , दर्द की दानाई , तन्हाई की चुभन और इश्क़-ए-हक़ीक़ी की रौशनी एक साथ जलवागर होती है। मेरी यह ग़ज़ल अपने मतले से ही क़ारी को एक ऐसे आलम में ले जाती है जहाँ आवाज़ें गूँज बनकर लौटती हैं , आरज़ुएँ ख़ाक में मिलकर नई शनासाई को जन्म देती हैं , और तन्हाई महज़ एक एहसास नहीं बल्कि इंसानी वजूद का एक गहरा तजुर्बा बन जाती है। ग़ज़ल का हर शेर अपने अंदर एक मुकम्मल जहान समेटे हुए है। कहीं दश्त-ए-बे-कसी की वीरानी है , कहीं कूचा-ए-मुहब्बत की तअज़ीम , कहीं हिज्र की लंबी रातों के बाद शकेबाई की सुबह , तो कहीं दर्द की आग से हासिल होने वाली वह दानाई है जो किसी किताब में नहीं मिलती। शायर इश्क़ को महज़ जज़्बाती तअल्लुक़ के तौर पर नहीं देखता , बल्कि उसे इंसान की बातिनी...

दिल को हर लम्हा जलाने की ज़रूरत क्या है

मोहब्बत जब अपने अस्ल मफ़हूम में दिल में उतर जाए तो बहुत-सी रस्में, बहुत-से तकल्लुफ़ और बहुत-सी शिकायतें अपनी अहमियत खो देती हैं। इंसान को एहसास होने लगता है कि जो चीज़ दिल में मौजूद है, उसे बार-बार साबित करने की ज़रूरत नहीं होती। यही एहसास इस ग़ज़ल की बुनियाद है। इस ग़ज़ल के अशआर में मोहब्बत, याद, तअल्लुक़, तग़ाफ़ुल और इंसानी रवैयों को सवालिया अंदाज़ में बयान किया गया है। ये सवाल किसी एक शख़्स से नहीं, बल्कि कभी महबूब से, कभी ख़ुद अपनी ज़ात से और कभी पूरे समाज से मुख़ातिब दिखाई देते हैं। हर शेर अपने अंदर एक फ़िक्र और एक पैग़ाम समेटे हुए है। दिल को हर लम्हा जलाने की ज़रूरत क्या है, फूल को आग लगाने की ज़रूरत क्या है। दिल में मौजूद हो जब नूर-ए-मोहब्बत का चराग़, घर में सौ दीप जलाने की ज़रूरत क्या है। हम ने माना कि तिरा हुस्न क़यामत है मगर, हर घड़ी नाज़ दिखाने की ज़रूरत क्या है। दिल में मौजूद अगर यार का काशाना रहे, फिर कहीं और ठिकाने की ज़रूरत क्या है। जिस को आना ही नहीं लौट के वापस इक दिन, उस को रिश्ते भी निभाने की ज़रूरत क्या है। अहल-ए-दिल ख़ुद ही समझ लेते हैं आँखों की ज़बाँ, उन को तफ़्सी...