ज़िंदगी का सबसे बड़ा तज़ाद शायद यही है कि कभी-कभी जिस शख़्स के लिए आपके दिल में बेइन्तिहा मुहब्बत, इख़्लास और ख़ैर-ख़्वाही होती है, उसी के दिल में आपके लिए नफ़रत, हसद और कीना पल रहा होता है। इंसान अपने किरदार से कम और अपनी नीयत से ज़्यादा पहचाना जाता है। मगर अफ़्सोस, हर दौर में कुछ ऐसे अफ़राद मौजूद रहे हैं जो मुहब्बत का जवाब अदावत से और ख़ुलूस का जवाब मक्र-ओ-फ़रेब से देते हैं। मैं अपने गाँव और समाज में ऐसे बहुत से चेहरे देखता हूँ। ये लोग ज़िंदगी भर किसी और की छाँव तलाश करते रहते हैं। ख़ुद अपनी मेहनत, अपनी सलाहियत और अपने वजूद पर इन्हें कभी यक़ीन नहीं होता। रोज़ी की तलाश में मुल्क से बाहर जाना कोई ऐब नहीं, मेहनत हर जगह मुक़द्दस है। लेकिन अफ़्सोस तब होता है जब वही लोग परदेस में बरसों तक दूसरों की मुलाज़मत करने के बाद अपने वतन लौटते हैं और ऐसा तास्सुर देते हैं मानो किसी सल्तनत के बादशाह हों। तकब्बुर का लिबास पहन लेना, हक़ीक़त को बदल नहीं देता। इज़्ज़त बैंक बैलेंस से नहीं, किरदार से पैदा होती है। दुनिया में रोज़ी कमाने के हज़ार रास्ते हैं। अपने मुल्क में भी इज़्ज़त के साथ कारोबार किया जा स...
"ज़बान इंसान की पहचान हो सकती है, मगर उसकी औक़ात का पैमाना हरगिज़ नहीं। असल पैमाना उसका इल्म, उसका किरदार और उसकी सोच होती है।" हमारे समाज में एक अजीब-सी रवायत ने जन्म ले लिया है। जैसे ही कोई शख़्स अंग्रेज़ी में बात करता है, या किसी दूसरी ज़बान का इस्तेमाल करता है, कुछ लोग फ़ौरन एतराज़ करने लगते हैं "अपनी ज़बान में बात करो", "इतनी अंग्रेज़ी क्यों बोलते हो?", "क्या अंग्रेज़ी बोलने से बड़े आदमी बन जाओगे?" ऐसे सवाल दरअसल ज़बान से नहीं, बल्कि तंग-नज़री से पैदा होते हैं। ज़बान कभी मसला नहीं होती। ज़बान तो इल्म तक पहुँचने का ज़रिया है। जिस तरह एक दरिया समंदर तक पहुँचने का रास्ता बनता है, उसी तरह हर ज़बान इंसान को एक नई दुनिया, नए ख़यालात और नए मौक़ों तक ले जाती है। जो लोग इसे समझते हैं, वही दुनिया में आगे बढ़ते हैं; और जो नहीं समझते, वे दूसरों की तरक़्क़ी पर तंज़ करते रह जाते हैं। अगर कोई नौजवान बेहतरीन अंग्रेज़ी जानता है, कदीम उर्दू में शायरी कर सकता है, हिन्दी में बेहतरीन तहरीर लिख सकता है या किसी और ज़बान में अपने इल्म का इज़हार करता है, तो यह उसका ...