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बनहेरा टांडा का नौजवान: शबाब की सरमस्ती या मुस्तक़बिल की तामीर? | तारिक़ अज़ीम 'तनहा' | Banhera Tanda | Part 1

बनहेरा टांडा का नौजवान: शबाब की सरमस्ती या मुस्तक़बिल की तामीर? | Part 1 एक गाँव की फ़िक्र , नौजवानों की ग़फ़लत और ज़ेहन की वीरानी का सवाल तहरीर: तारिक़ अज़ीम ' तनहा ' किसी बस्ती की अस्ल पहचान उसके बुलंद मकानों , वसीअ सड़कों , चमकती गाड़ियों और लोगों के ज़ाहिरी ठाठ-बाठ से नहीं होती , बल्कि उसके अफ़्कार , इल्म , किरदार और नस्ल-ए-नौ की फ़िक्री सतह से होती है। जिस बस्ती के नौजवानों के सीने में बुलंद ख़्वाब , ज़ेहन में सवाल , निगाहों में बसीरत और दिल में कुछ कर गुज़रने का जज़्बा मौजूद हो , उस बस्ती का मुस्तक़बिल पुरउम्मीद होता है। लेकिन जहाँ शबाब तो हो , सरगर्मी तो हो , जिस्मानी नुमाइश का शौक़ तो हो , मगर इल्म की तलब , फ़िक्र की गहराई और मुस्तक़बिल की तामीर का एहसास कमज़ोर पड़ने लगे , वहाँ ठहरकर अपने सामूहिक मिज़ाज का मुहासबा करना ज़रूरी हो जाता है। मेरा गाँव बनहेरा टांडा है। इस मिट्टी से मेरी वाबस्तगी महज़ पैदाइश या रिहाइश का रिश्ता नहीं , बल्कि एक जज़्बाती और फ़िक्री रिश्ता भी है। इसी बस्ती की गलियों में लोग बड़े होते हैं , इसी की आबोहवा में बच्चों के ख़्वाब परवान चढ़ते है...
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