अक्स-ए-रुख़्सार तिरा आब-ए-रवाँ में उतरे, चाँद पानी में नहाएगा तो छा जाएगा। दिल के वीरान शबिस्ताँ में तिरी याद का चाँद, रौशनी बन के जो आएगा तो छा जाएगा। दश्त-ए-इम्काँ में बहुत ख़ाक उड़ाई सब ने, इश्क़ जब ख़ेमे लगाएगा तो छा जाएगा। सिर्फ़ जीने से कहाँ होती है पहचान कोई, दर्द को फ़न में जो लाएगा तो छा जाएगा। ताज वालों को हमेशा यही धोका है कि बस, ख़ौफ़ से मुल्क चलाएगा तो छा जाएगा। जाम-ए-जम भी तिरी आँखों का मुक़ाबिल न हुआ, कोई साक़ी इन्हें पाएगा तो छा जाएगा। दश्त-ए-ग़ुर्बत में कोई नक़्श-ए-क़दम मिल जाए, कारवाँ राह पे आएगा तो छा जाएगा। नर्गिस-ए-शौक़ को दीदार की बारिश दे दे, फूल हर सिम्त खिलाएगा तो छा जाएगा। बज़्म-ए-अहबाब में तेरी ही सना होगी कभी, कोई तेरा ज़िक्र उठाएगा तो छा जाएगा। तेरी आँखों में जो देखेगा समन्दर का वक़ार, अपनी हस्ती को भुलाएगा तो छा जाएगा। बू-ए-गुल, रंग-ए-सहर, नूर-ए-कमर सब हैं मगर, तू निगाहों में समाएगा तो छा जाएगा। तेरे रुख़्सार की ताबिन्दगी ऐसी है कि माह, अपनी किरनों को झुकाएगा तो छा जाएगा। हुस्न जब पर्दा-ए-रंगीं से निकल कर शब में, जल्वा-ए-ख़ास दिखाएगा तो छा जाएगा। 'तन्ह...
दो बार बिकने वाला वो ‘ग़ुलाम’ जो दिल्ली के तख़्त पर बैठा और सल्तनत-ए-मुस्लिम की बुनियाद रख गया क़ुतबुद्दीन ऐबक तुर्कों के मशहूर ‘ऐबक’ क़बीले से ताल्लुक़ रखते थे। "ऐबक" तुर्की ज़बान का लफ़्ज़ है, जिसका मानी है "माह का मालिक" यानी "चाँद का स्वामी"। मुवर्रिख़ीन बयान करते हैं कि इस क़बीले के मर्द व ख़वातीन अपने हुस्न-ओ-जमाल के लिए मशहूर थे, लेकिन क़ुतबुद्दीन ऐबक इस एतिबार से अपने क़बीले के दूसरे अफ़राद जैसे ख़ूबसूरत नहीं थे। आज से तक़रीबन आठ सौ बरस पहले अफ़ग़ानिस्तान में सुल्तान मुईज़ुद्दीन मोहम्मद ग़ौरी की हुकूमत थी। सुल्तान अपनी ऐश-ओ-इश्रत भरी ज़िंदगी के साथ-साथ अहल-ए-दरबार, मशीरों, उमरा और ग़ुलामों की क़द्रदानी के लिए भी जाना जाता था। उसके दरबार में एक ऐसा ग़ुलाम भी मौजूद था जिसने सुल्तान की तरफ़ से इनायत किए गए ख़ज़ाने को अपने पास रखने के बजाय महल के बाहर खड़े पहरेदारों, मुफ़लिसों और ज़रूरतमंदों में तक़सीम कर दिया। उसकी इस दरियादिली ने अहल-ए-सल्तनत को हैरतज़दा कर दिया। यह वाक़िआ चर्चा का मौज़ू बना और आख़िरकार उसकी ख़बर ख़ुद सुल्तान तक जा पहु...