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हिज्राँ की रात है तो उजाला भी चाहिए | ग़ज़ल — तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

हिज्राँ की रात है तो उजाला भी चाहिए — तारिक़ अज़ीम 'तनहा' की ग़ज़ल और तशरीह शायर: तारिक़ अज़ीम 'तनहा' सिन्फ़: ग़ज़ल ज़बान: उर्दू-फ़ारसी आमेज़ हिंदुस्तानी मौज़ू: इश्क़, हिज्र, इंसानी ख़्वाहिश, किरदार, रूहानियत, रुस्वाई और जुनूँ ग़ज़ल — देवनागरी लिपि हिज्राँ की रात है तो उजाला भी चाहिए, अश्क़ों का नूर आँख से बहना भी चाहिए। यूँ तो तेरी ज़बाँ पे है जन्नत की आरज़ू, चेहरे से तेरे लगता है दुनिया भी चाहिए। मंज़िल का शौक़ दे दिया तो हौसला भी दे, ये मैंने कब कहा मुझे रास्ता भी चाहिए। हुस्न-ओ-जमाल आपका काफ़ी नहीं जनाब, किरदार का ये फूल महकना भी चाहिए। हर शै में तू अयाँ है तो पर्दा है किस लिए, नज़रों को अब मेरी तेरा जल्वा भी चाहिए। रुस्वाइयों का ताज तो सर पर सजा लिया, अब इसके साथ थोड़ा-सा चर्चा भी चाहिए। 'तनहा' किसी मक़ाम पे ठहरा नहीं है इश्क़, इसको जुनूँ के साथ तमाशा भी चाहिए। — तारिक़ अज़ीम 'तनहा' Ghazal in Roman Urdu Hijraan ki raat hai to ujaala bhi chahiye, Ashkon ka noor aankh se behna bhi chahiye. Yoon to teri zabaan pe hai jannat...
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पायल भटनागर की वायरल ग़ज़ल का अरूज़ी जायज़ा | वज़्न, बहर और तक़्तीअ की पड़ताल | Payal Bhatnagar | Tariq Azeem Tanha

वायरल ग़ज़ल बनाम फ़न्न-ए-शायरी: पायल भटनागर की ग़ज़ल का वज़्न और अरकान की कसौटी पर जायज़ा क्या किसी ग़ज़ल का लोकप्रिय हो जाना उसके फ़न्नी ऐबों को भी ख़ूबी में बदल देता है? क्या दिल को छू लेने वाले अशआर के लिए बहर की पाबंदी से आज़ादी ली जा सकती है? और क्या किसी शेर की मक़बूलियत ही उसकी शायरी होने की सबसे बड़ी दलील है? सोशल मीडिया के इस दौर में शायरी की दुनिया पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा वसीअ हो गई है। अब किसी शायर को अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए किसी बड़े मुशायरे, अदबी रिसाले या नामवर शायर की ताईद का मोहताज नहीं रहना पड़ता। एक वीडियो, एक अच्छी आवाज़, दिल को छू लेने वाला मिसरा और मुनासिब संगीत, कभी-कभी इतना ही किसी कलाम को लाखों लोगों तक पहुँचाने के लिए काफ़ी होता है। मगर इस नई दुनिया में एक सवाल अपनी पूरी अहमियत के साथ मौजूद है: क्या किसी कलाम का वायरल होना और उसका फ़न्नी तौर पर मुकम्मल होना एक ही बात है? इसी सवाल के हवाले से पायल भटनागर जी की इन दिनों चर्चा में रहने वाली ग़ज़ल का जायज़ा लेना दिलचस्प होगा। उनकी ग़ज़ल के कुछ अशआर ज़िंदगी, मौत, यादों, मोहब्बत और इंस...

Ek Baar Woh Aankhon Mein Yun Bharkar Mujhe Dekhe | Romantic Urdu Ghazal | Tariq Azeem Tanha

एक बार वो आँखों में यूँ भरकर मुझे देखे, जैसे के मैं क़तरा हूँ समंदर मुझे देखे मैं उसके लिए कौन हूँ, पूछे न ज़माना, सब मेरी ख़मोशी को ही पढ़कर मुझे देखे। वो ओस की तरह मेरी पलकों पे ठहरकर फिर फूल की मानिंद वो छूकर मुझे देखे। क्या ख़ूब हो उस रात का आलम कि वो महबूब, तारों की तरह छत पे ठहरकर मुझे देखे। वो ख़्वाब में आए तो कोई ख़्वाब न टूटे, मैं आँख भी खोलूं तो बराबर मुझे देखे। क्या ख़ूब हो वो रात कि महफ़िल में अचानक, वो सब से छुपे और वो छुपकर मुझे देखे। किस दर्जा है शोले मेरी इस ख़ाक़ ए बदन में,   एक बार सही, पास तो आकर मुझे देखे। मैं रिंद-ए-मोहब्बत हूँ, मुझे ज़ाम न दे वो, बस आँख से आँखों में उतरकर मुझे देखे। मैं ख़ाक सही, ख़ाक में ताबीर-ए-चमन हूँ, वो फ़स्ल-ए-बहारा में उतरकर मुझे देखे। जब शाम ढले, चाँद निकल आए फ़लक पर, वो याद करे मुझको ठहरकर मुझे देखे। दरिया की तरह आँख में रखता हूँ तड़प मैं, वो साहिल-ए-बे-मेहर से बढ़कर मुझे देखे। कुछ राज़ हैं सीने में कि अफ़्शा नहीं होते, वो राज़ मेरी आँखों के पढ़कर मुझे देखे। हर ज़ख़्म को सीने में छुपा रखा है मैंने, वो चाक-ए-जिगर देखे तो छूकर मुझे देखे। ‘...

One Line Famous Sher | Tariq Azem Tanha

    ऐसे बहुत से अशआर हैं, जिनका एक ही मिसरा इतना मशहूर हुआ कि लोग दूसरे मिसरे को तो भूल ही गये। ऐसे ही चन्द मशहूर अशआर यहाँ पेश हैं:   "ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है, *वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।*"   *- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़*   "ऐ 'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को न मुँह लगा, *छूटती नहीं है मुँह से ये काफ़िर लगी हुई।"*   दुख़्तर-ए-रज़ = शराब   *- शेख़ इब्राहीम ज़ौक़*   "भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया, *ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं।"*   *- माधव राम जौहर*   "चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले, *आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले।"*   *- मिर्ज़ा मोहम्मद अली फिदवी*   "दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से, *इस घर को आग लग गई,घर के चराग़ से।"*   *- महताब राय ताबां*   "ईद का दिन है, गले आज तो मिल ले ज़ालिम, *रस्म-ए-दुनिया भी है,मौक़ा भी है, दस्तूर भी है।"*   *- क़मर बदायुनी*   "ख़ंजर चले किसी पे, तड़पते हैं हम 'अमीर', *सारे जहा...

क़िरदार का दिवालियापन और दिखावे की बादशाहत। तारिक़ अज़ीम तनहा

ज़िंदगी का सबसे बड़ा तज़ाद शायद यही है कि कभी-कभी जिस शख़्स के लिए आपके दिल में बेइन्तिहा मुहब्बत, इख़्लास और ख़ैर-ख़्वाही होती है, उसी के दिल में आपके लिए नफ़रत, हसद और कीना पल रहा होता है। इंसान अपने किरदार से कम और अपनी नीयत से ज़्यादा पहचाना जाता है। मगर अफ़्सोस, हर दौर में कुछ ऐसे अफ़राद मौजूद रहे हैं जो मुहब्बत का जवाब अदावत से और ख़ुलूस का जवाब मक्र-ओ-फ़रेब से देते हैं। मैं अपने गाँव और समाज में ऐसे बहुत से चेहरे देखता हूँ। ये लोग ज़िंदगी भर किसी और की छाँव तलाश करते रहते हैं। ख़ुद अपनी मेहनत, अपनी सलाहियत और अपने वजूद पर इन्हें कभी यक़ीन नहीं होता। रोज़ी की तलाश में मुल्क से बाहर जाना कोई ऐब नहीं, मेहनत हर जगह मुक़द्दस है। लेकिन अफ़्सोस तब होता है जब वही लोग परदेस में बरसों तक दूसरों की मुलाज़मत करने के बाद अपने वतन लौटते हैं और ऐसा तास्सुर देते हैं मानो किसी सल्तनत के बादशाह हों। तकब्बुर का लिबास पहन लेना, हक़ीक़त को बदल नहीं देता। इज़्ज़त बैंक बैलेंस से नहीं, किरदार से पैदा होती है। दुनिया में रोज़ी कमाने के हज़ार रास्ते हैं। अपने मुल्क में भी इज़्ज़त के साथ कारोबार किया जा स...