ईरान जंग की सूरत-ए-हाल में है, तो तारीख़ की कई पुरानी दास्तानें फिर सतह पर उभरने लगी हैं। सोचा कि आज शाम मैं भी एक वाक़िआ बयान करूं। सन 1979 में ईरान में इंक़िलाब-ए-इस्लामी बरपा हुआ। Ayatollah Ruhollah Khomeini की क़ियादत में Mohammad Reza Pahlavi की हुकूमत का ख़ात्मा हुआ। शाह अपने अहल-ए-ख़ाना के साथ यह कहकर मुल्क छोड़ गए कि वह महज़ “तफ़रीह” पर जा रहे हैं। पहले Egypt, फिर Morocco, Bahamas और Mexico गए। बाद में मालूम हुआ कि उन्हें सरतान (कैंसर) है, और इलाज के लिए वह New York City पहुंच गए। यही बात ईरान में शदीद ग़ज़ब का सबब बनी। 4 नवंबर 1979 को U.S. Embassy Tehran पर हमला हो गया। ग़ुस्साए तलबा ने सफ़ारतख़ाने का मुहासिरा कर लिया और आखिरकार 66 अमरीकी अहलकारों को यरग़माल बना लिया (बाद में 14 रिहा हुए, मगर 52 अफ़राद 444 दिन तक कैद रहे)। दुनिया भर में ये वाक़िआ सुर्ख़ियों में रहा। उस वक़्त के अमरीकी सद्र Jimmy Carter के लिए ये सियासी आज़माइश बन गया। उन्होंने मुतअद्दिद कूटनीतिक कोशिशें कीं, इक़्तिसादी पाबंदियां लगाईं, मगर खुमैनी हुकूमत झुकने को तैयार न हुई। ईरान अमरीका को “शैतान-ए-अकबर” क़रार...
▪️इस्राइली सहाफ़ी अलोन मिज़राही ने अपने एक तजज़िये में लिखा है: “हम तारीख़ को अपनी आँखों के सामने वक़ूअ पज़ीर होते देख रहे हैं। तमाम तवक़्क़ोआत के बरअक्स, ईरान इस वक़्त अमरीकी फ़ौजी अड्डों को इस क़दर गहराई और इस क़दर फ़ैसला-कुन अंदाज़ में निशाना बना रहा है कि दुनिया अभी तक इस मंजर को समझने के लिए तैयार ही नहीं। सिर्फ़ चार रोज़ के अंदर ईरान ने पूरे इलाक़े में अपने फ़ौजी असर-ओ-रसूख़ का दायरा काफ़ी वसीअ कर लिया है। ईरान ने दुनिया के सबसे क़ीमती और महंगे फ़ौजी अड्डों, अस्लाहे और निज़ामात को अपना निशाना बनाया है। बहरीन, कुवैत, क़तर और सऊदी अरब में मौजूद अमरीकी अड्डे दुनिया के सबसे बड़े और अहम अस्करी ठिकानों में शुमार किए जाते हैं। इन्हें तामीर करने में कई दशकों की मेहनत और खरबों डॉलर की सरमायाकारी शामिल रही है। यूँ समझिए कि तीस बरस से ज़्यादा के अस्करी इख़राज़ात का बड़ा हिस्सा अब धुएँ में तब्दील होता नज़र आ रहा है। हम देख रहे हैं कि करोड़ों डॉलर क़ीमत के रडार चंद लम्हों में नेस्त-ओ-नाबूद हो रहे हैं। मुकम्मल फ़ौजी छावनियाँ ख़ाली कर दी गयी हैं, कुछ को आग के हवाले कर दिया गया है और ...