दुनिया की सियासत में कभी-कभी एक बयान ऐसा आता है जो पूरे बयानिये (Narrative) को हिला देता है। हालिया दिनों में कुछ ऐसा ही मंजर तब देखने को मिला जब Tulsi Gabbard की गवाही ने वॉशिंगटन के गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया। यह महज़ एक इत्तिला (Information) नहीं थी, बल्कि उस तर्क की जड़ को छूती हुई बात थी, जिस पर पूरी जंग का जواز (Justification) खड़ा किया गया था। गवाही के मुताबिक़, 2025 में हुए हमलों के बाद ईरान ने अपने न्यूक्लियर एनरिचमेंट (Nuclear Enrichment – परमाणु संवर्धन) प्रोग्राम को दोबारा शुरू करने की कोई कोशिश नहीं की। यहाँ तक कहा गया कि “ऑपरेशन मिडनाइट हैमर” (Operation Midnight Hammer) के बाद यह प्रोग्राम इस कदर तबाह हो चुका था कि उसकी बहाली की कोई ठोस निशानी सामने नहीं आई। अब सवाल यह उठता है कि अगर ख़तरा मौजूद ही नहीं था, तो फिर उस ख़तरे के नाम पर जंग क्यों छेड़ी गई? Donald Trump और उनके इदारे (Administration) लगातार यह कहते रहे कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा (Nuclear Ambition) एक बड़ा ख़तरा है, और इसे रोकने के लिए फौजी कार्रवाई ज़रूरी थी। मगर जब इंटेलिजेंस (Intelligence – ...
अगर तुकबंदी में कहा जाए तो मंजर कुछ यूँ है चिराग़ नहीं, यहाँ सियासत का धुआँ है, हर फैसला इंसानियत नहीं, मुफ़ाद का कुआँ है। दुनिया की सियासत (Politics) में अक्सर एक ख़याल परोसा जाता है कि कुछ ममालिक (Countries) ऐसे हैं जो चाहें तो जंग रोक सकते हैं, बस इशारा करें और बारूद की बू ख़त्म हो जाए। मगर जब हक़ीक़त की ज़मीन पर कदम रखा जाता है, तो यह ख्वाब एक तिलिस्म (Illusion) से ज़्यादा कुछ नहीं लगता। यह कहना आसान है कि फलाँ मुल्क जंग रुकवा सकता है, मगर सवाल यह है कि क्या उसके पास वाक़ई वह इख़्तियार (Authority) है, या सिर्फ़ एक सियासी तसव्वुर (Perception) है जो लोगों के ज़हन में बिठा दिया गया है? जब एक मुल्क अपनी मआशियाती (Economic) ज़रूरतों में भी मुकम्मल ख़ुदमुख़्तारी (Autonomy) हासिल नहीं कर पाता, तो वह आलमी जंग के फैसलों पर किस हद तक असरअंदाज़ हो सकता है यह सवाल अपने आप में बहुत कुछ बयान कर देता है। असल में मसला ताक़त का कम और तरजीहात (Priorities) का ज़्यादा है। जब तक आग दूर जलती है, वह सिर्फ़ एक मंजर होती है लोग उसे देखते हैं, उस पर बहस करते हैं, और कभी-कभी तो उस पर जश्न भी मनाते हैं। मगर ज...