بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ) जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है।" الحمدُ للهِ ربِّ العالمين، والصلاةُ والسلامُ على سيدِ المرسلين، خاتمِ النبيين، رحمةٍ للعالمين، سيدِنا ومولانا Muhammad ﷺ، وعلى آله الأطهار، وأصحابه الأخيار، ومن تبعهم بإحسانٍ إلى يوم الدين. तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं, जो सारे जहानों का पालनहार है। और दुरूद व सलाम हों तमाम रसूलों के सरदार, आख़िरी नबी, सारे जहानों के लिए रहमत, हमारे सरदार व मौला मुहम्मद ﷺ पर, और उनकी पाक आल (परिवार), उनके नेक सहाबा, और उन सब पर जो क़यामत तक नेक़ी के साथ उनकी पैरवी करते रहें।" ﴿وَرَفَعْنَا لَكَ ذِكْرَكَ﴾ और हमने आपके लिए आपके ज़िक्र को बुलंद कर दिया।" यह महज़ एक आयत नहीं, बल्कि तारीख़-ए-आलम का वह फ़ैसला है जिसकी तस्दीक़ हर गुज़रता लम्हा करता चला आ रहा है। सदियाँ गुज़र गईं, मगर यह वादा हर दौर में नई शान के साथ जल्वागर होता रहा। आज क़रीब पंद्रह सदियाँ गुज़र चुकी हैं। कितनी ही सल्तनतें बरपा हुईं, कितने तख़्त-ओ-ताज ज़वाल का शिकार हुए, कितने फ़ातिहीन-ए-आलम ख़ाक में मिल गए, कि...
अक्स-ए-रुख़्सार तिरा आब-ए-रवाँ में उतरे, चाँद पानी में नहाएगा तो छा जाएगा। दिल के वीरान शबिस्ताँ में तिरी याद का चाँद, रौशनी बन के जो आएगा तो छा जाएगा। दश्त-ए-इम्काँ में बहुत ख़ाक उड़ाई सब ने, इश्क़ जब ख़ेमे लगाएगा तो छा जाएगा। सिर्फ़ जीने से कहाँ होती है पहचान कोई, दर्द को फ़न में जो लाएगा तो छा जाएगा। ताज वालों को हमेशा यही धोका है कि बस, ख़ौफ़ से मुल्क चलाएगा तो छा जाएगा। जाम-ए-जम भी तिरी आँखों का मुक़ाबिल न हुआ, कोई साक़ी इन्हें पाएगा तो छा जाएगा। दश्त-ए-ग़ुर्बत में कोई नक़्श-ए-क़दम मिल जाए, कारवाँ राह पे आएगा तो छा जाएगा। नर्गिस-ए-शौक़ को दीदार की बारिश दे दे, फूल हर सिम्त खिलाएगा तो छा जाएगा। बज़्म-ए-अहबाब में तेरी ही सना होगी कभी, कोई तेरा ज़िक्र उठाएगा तो छा जाएगा। तेरी आँखों में जो देखेगा समन्दर का वक़ार, अपनी हस्ती को भुलाएगा तो छा जाएगा। बू-ए-गुल, रंग-ए-सहर, नूर-ए-कमर सब हैं मगर, तू निगाहों में समाएगा तो छा जाएगा। तेरे रुख़्सार की ताबिन्दगी ऐसी है कि माह, अपनी किरनों को झुकाएगा तो छा जाएगा। हुस्न जब पर्दा-ए-रंगीं से निकल कर शब में, जल्वा-ए-ख़ास दिखाएगा तो छा जाएगा। 'तन्ह...