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अमरीकी क़ुदरत-ए-सियासत: डोनाल्ड ट्रम्प, आलमी फ़ौजी अड्डे और जियोपॉलिटिक्स (Geopolitics) का ख़तरनाक खेल

दुनिया की तारीख़ में कई ऐसे मराहिल (Phases) आए हैं जब किसी अज़ीम ताक़त की क़ियादत एक ऐसे शख़्स के हाथ में चली गई जिसकी सियासी हिकमत-ए-अमली ने पूरी दुनिया को बेचैनी और तश्वीश में मुब्तला कर दिया। आज की आलमी सियासत में अगर किसी शख़्सियत को लेकर इस किस्म की बहस सबसे ज़्यादा मौजूद है तो वह डोनाल्ड ट्रम्प हैं। ट्रम्प की सियासी तर्ज़-ए-फ़िक्र (Political Thinking) और उनकी आलमी पॉलिसी को देखकर कई तजज़िया निगार यह सवाल उठाते नज़र आते हैं कि क्या अमरीका अपनी क़ुदरत (Power) को महज़ तहफ़्फ़ुज़ के लिये इस्तेमाल कर रहा है या फिर यह पूरी दुनिया पर मुआशियाती और सियासी ग़लबा कायम रखने की कोशिश है। ट्रम्प की सियासत का एक अहम पहलू टैरिफ जंग (Tariff War – व्यापारिक शुल्क युद्ध) रहा है। उन्होंने यह तसव्वुर पेश किया कि दुनिया के कई मुल्क सदियों से अमरीका की मुआशियात से फ़ायदा उठा रहे हैं और अब वक़्त आ गया है कि अमरीका अपने तिजारती मफ़ादात को सख़्ती से दिफ़ा करे। मगर जब यह टैरिफ जंग चीन जैसे अज़ीम मुआशियाती ताक़त के साथ टकराई तो यह सिर्फ़ एक तिजारती मसला नहीं रहा बल्कि जियोपॉलिटिक्स (Geopolitics – आलमी सियास...
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ओमान साहिल के क़रीब चीनी जासूसी जहाज़ लियाओ वांग-1 : जासूसी, जियोपॉलिटिक्स (Geopolitics) और समुंद्री राज़

समंदर की वुसअत (Vastness) में अक्सर कुछ ऐसे मंज़र पैदा होते हैं जो पहली नज़र में आम मालूम होते हैं, मगर जब उन पर तवज्जो दी जाए तो उनके पीछे सियासत, जासूसी और जियोपॉलिटिक्स (Geopolitics – आलमी सियासी ताक़तों का खेल) की पूरी दास्तान छुपी होती है। इन दिनों ओमान के साहिल के आसपास ऐसा ही एक मंज़र दुनिया की निगाहों को अपनी तरफ़ मुतवज्जे कर रहा है, जहाँ चीन का मशहूर जासूसी जहाज़ लियाओ वांग-1 (Liaowang-1 Surveillance Ship) कई रोज़ से मौजूद है। यह जहाज़ किसी मामूली समुंद्री सफ़र पर नहीं निकला। इसकी हैसियत दरअसल एक निगरानी कश्ती है जो इलेक्ट्रॉनिक इस्तिख़बारात (Electronic Intelligence – इलेक्ट्रॉनिक जासूसी जानकारी) और मिसाइल ट्रैकिंग सिस्टम की मदद से दूर-दराज़ इलाक़ों की हरकतों का जायज़ा लेने की सलाहियत रखती है। यही वजह है कि जब यह जहाज़ ओमान के क़रीब देखा गया तो मुख़्तलिफ़ मुल्कों के नज़रबीन (Observers) हैरत में पड़ गए। समंदर की सतह पर ठहरा हुआ यह जहाज़ सिर्फ़ एक लोहे का ढाँचा नहीं बल्कि एक चलता-फिरता इस्तिख़बाराती मरकज़ (Intelligence Hub) है। इसके ऊपर नज़र आने वाले बड़े-बड़े गोल गु...

ईरान: सिर्फ़ एक मुल्क नहीं, बल्कि ‘आज़्म-ओ-इरादा’ की दास्तान — पाबंदियों, जंग और सियासत के दरमियान एक क़ौम का सब्र

इज़राइल ने जंग में हुए नुक़सान की मीडिया कवरेज पर सख़्त पाबंदी आइद कर दी है। कहा जा रहा है कि तेल अवीव, यरूशलेम और पूरे इज़राइल में ईरानी मिसाइलों से होने वाली तबाही की वीडियोग्राफ़ी और तस्वीरें लेने पर सख़्त रोक लगा दी गई है। यहाँ तक कि इन वीडियोज़ और तस्वीरों को इज़राइल से बाहर भेजने पर भी सख़्त क़िस्म की मनाही कर दी गई है। हुकूमत का कहना है कि इससे मुल्क की सिक्योरिटी और फ़ौजी मुक़ामात से जुड़ी मालूमात दुश्मनों तक पहुँच सकती है, इसलिए ऐसी रिपोर्टिंग पर पाबंदी ज़रूरी समझी गई। दूसरी तरफ़ अमरीका और इज़राइल लगातार यह दावा कर रहे हैं कि उनके हमलों से ईरान को बहुत बड़ा नुक़सान पहुँचा है। मगर अगर वाक़ई ईरान इतनी बुरी तरह तबाह हो चुका है तो फिर वह हथियार क्यों नहीं डाल रहा? जो अमरीका जंग के आग़ाज़ में यह कह रहा था कि सिर्फ़ 48 घंटों में ईरान में हुकूमत तब्दील हो सकती है, अब उस जंग को बारह दिन से ज़्यादा गुज़र चुके हैं और हालात अब भी नाज़ुक बने हुए हैं। ईरानी क़ियादत किसी क़िस्म के मुआहिदे या समझौते के लिए तैयार नज़र नहीं आती। कई तजज़ियाकार यह सवाल भी उठा रहे हैं कि कहीं इज़राइ...

ईरान की हिकमत-ए-अमली: क़ीमत-ए-नफ़्त (Crude Oil Prices) $200 प्रति बैरल तक — जंग-ए-मुआशियाती (Economic Warfare) का असली मक़सद

मशरिक़-ए-औसत की सियासत और जंगों की तारीख़ बार-बार इस हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करती रही है कि हर मुक़ाबला सिर्फ़ मैदान-ए-जंग में तय नहीं होता। कई बार असल फ़ैसला तोप, मिसाइल और जहाज़ों से नहीं बल्कि मुआशियात (Economy) के ज़रिये होता है। आज ईरान ने बिल्कुल वही रास्ता इख़्तियार किया है जो ज़ाहिर में कमज़ोर मालूम होता है मगर दरअस्ल एक गहरी हिकमत-ए-अमली पर मबनी है। चंद रोज़ पहले तक अक्सर लोग ये समझ रहे थे कि इसराइल ने ईरान की दिफ़ा-ए-फ़िज़ा (Air Defense) का बड़ा हिस्सा तबाह कर दिया है और अब क़िस्सा ख़त्म हो चुका है। तजज़िया करने वाले अफ़राद और आम लोग दोनों इस गुमान में थे कि जंग का नतीजा लगभग वाज़ेह है। मगर यह तसव्वुर शायद जंग की असल फ़ितरत को समझने में एक बड़ी ग़लती थी। ईरान का मक़सद इस मुक़ाबले को रिवायती मायनों में जीतना नहीं है। तेहरान की क़ियादत इस जंग को इतना महँगा बनाना चाहती है कि फ़तह (Victory) ख़ुद बे-मानी हो जाए। यह दो बिल्कुल मुख़्तलिफ़ खेल हैं और बहुत से लोग अब भी इस फ़र्क़ को समझ नहीं पा रहे। ईरान अब सिर्फ़ अस्करी मुक़ाबला नहीं कर रहा। दरअस्ल यह जंग-ए-मुआशियाती (Economic Warfare) ...

मशरिक़-ए-वुसता की सुलगती जंग: ताक़त, सियासत और इंसानियत का इम्तिहान

इज़राइल ने जंग में हुए नुक़सान की मीडिया कवरेज पर सख़्त पाबंदी आइद कर दी है। कहा जा रहा है कि तेल अवीव, यरूशलेम और पूरे इज़राइल में ईरानी मिसाइलों से होने वाली तबाही की वीडियोग्राफ़ी और तस्वीरें लेने पर सख़्त रोक लगा दी गई है। यहाँ तक कि इन वीडियोज़ और तस्वीरों को इज़राइल से बाहर भेजने पर भी सख़्त क़िस्म की मनाही कर दी गई है। हुकूमत का कहना है कि इससे मुल्क की सिक्योरिटी और फ़ौजी मुक़ामात से जुड़ी मालूमात दुश्मनों तक पहुँच सकती है, इसलिए ऐसी रिपोर्टिंग पर पाबंदी ज़रूरी समझी गई। दूसरी तरफ़ अमरीका और इज़राइल लगातार यह दावा कर रहे हैं कि उनके हमलों से ईरान को बहुत बड़ा नुक़सान पहुँचा है। मगर अगर वाक़ई ईरान इतनी बुरी तरह तबाह हो चुका है तो फिर वह हथियार क्यों नहीं डाल रहा? जो अमरीका जंग के आग़ाज़ में यह कह रहा था कि सिर्फ़ 48 घंटों में ईरान में हुकूमत तब्दील हो सकती है, अब उस जंग को बारह दिन से ज़्यादा गुज़र चुके हैं और हालात अब भी नाज़ुक बने हुए हैं। ईरानी क़ियादत किसी क़िस्म के मुआहिदे या समझौते के लिए तैयार नज़र नहीं आती। कई तजज़ियाकार यह सवाल भी उठा रहे हैं कि कहीं इज़राइल के साथ खड़...