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From Superpowers to Surrender: The Harsh Reality of Modern Warfare

पूर्व सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर 20 लाख बम गिराए, लेकिन जंग हार गया।  अमेरिका ने वियतनाम पर 75 लाख बम गिराए, पर हारकर भागना पड़ा।  फिर अमेरिका ने अफगानिस्तान पर 2 लाख बम गिराए, तब भी तालिबान डटा रहा।  सिर्फ़ बम गिराने से अगर जंग जीता गया होता तो आज ईरान समझौते की टेबल पर होता।  लेकिन, कल अमेरिका ने तकरीबन पूरे मिडिल ईस्ट से भागना ठीक समझा।  सारे दूतावास बंद। सैनिक होटलों में और अमेरिकी मदद बंद। यही ईरान का वॉर मॉडल है, जिसकी ताकत भारत में नहीं है।  भारत अब सुविधाभोगी है। वह उस 60–70 के दशक में नहीं लौटना चाहता, जब हमने लड़ाइयां जीती थी।  हमें खाने को चाइनीज चाहिए, पिज्जा चाहिए, पीने को कोक। शॉपिंग को आलीशान मॉल, चलने को चमचमाती सड़कें और दौड़ने को कार।  हमारी इकॉनमी बेबस है और इस विकास को कायम रखने की कोई भी कीमत चुकाकर हम कॉम्प्रोमाइज्ड होने के लिए तैयार हैं।  नतीज़ा–सामने एक सरेंडर का चेहरा है। एक भ्रष्ट, आतंकी सत्ता।  कानून–व्यवस्था को एक तरफ रख भी दें तो इस विकास की हम क्या कीमत चुका रहे हैं? अपनी आत्मनिर्भरता और सार्वभौमिकता को गि...
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जंग, जमीर और विजयी भाव का वहम

क्या जंग सिर्फ मैदान मे दुश्मन को हराकर जीती जाती है.. अगर जंग जीतने का यही पैमाना है तो फिर इस दुनिया मे कमज़ोर को ज़िंदा रहने का कोई हक नहीं। मुझे याद है कि सिक्सथ की उर्दू की किताब मे एक सबक "अब्बू ख़ां की बकरी" के उन्वान से था जिसमे अब्बू ख़ां की तमाम बकरियां रेवड़ के उसूलों को फ़ालो करती थीं सिवाये चांदनी के, और कभी पहाड़ी के उस तरफ़ नहीं जाती थीं जिधर एक भेड़िया रहता था मगर चांदनी एक रात रेवड़ से अलग होकर पहाड़ी के उस तरफ़ गयी और सारी रात उस भेड़िये से लड़कर सुब्ह को हलाक हो गयी। भेड़िये के दांत और पंजे चांदनी से ज़्यादा मज़बूत थे तो आख़िर में चांदनी को मारा जाना था लेकिन क्या चांदनी सिर्फ यूंही मारी गयी कि उसके पास नुकीले दांत और पंजे ना होकर सिर्फ दो सींग थे। नहीं वह इसीलिए मारी गयी क्योकि बकरियो के उस रेवड़ मे उसके अलावा किसी मे भेड़िये से लड़ने का हौसला नहीं था। इस कहानी को सुनिये और एक अपना साइक्लोजिकल टैस्ट कीजिये। अगर आप इस कहानी को पढते हुये भेड़िये के तरफदार हैं तो आप इतने बुज़दिल हैं कि हर हाल मे जीतने वाले की तरफ़ होकर एक जीती हुयी साइड मे होने का साइक्लोजिकल...

सौरभ द्विवेदी और पुरुषोत्तम अग्रवाल Saurabh Dwivedi and Purshottam Aggarwal JNU Delhi

सौरभ द्विवेदी के आगे फैलने का नहीं; यहां तक कि पुरुषोत्तम अग्रवाल को भी नहींः कुछ लोग सवाल करने के बजाय भाषण देने लग जाते हैं, उससे आज बचना है. अधिकतम तीन वाक्यों में अपना सवाल करना है… मॉडरेटर सौरभ द्विवेदी की इस स्पष्ट घोषणा के बावज़ूद प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल सवाल करने के नाम पर फैलने लग जाते हैं और तब द्विवेदी इस बात का ख़याल नहीं करते कि अग्रवाल उनके गुरु हैं जिन्हें वो इस बातचीत के दौरान मेरे उस्ताद- मेरे उस्ताद से लेकर उनके कॉलम मुखामुखम तक शामिल करते हुए “ज्ञान परिवेश” की निर्मिति करते हैं. द्विवेदी के पास ऐसे अनगिनत भभूत होते हैं और वो जानते हैं कि किस भभूत से कब, कैसे माहौल ऑब्लिक भौकाल बनाया जाता है. प्रोफेसर अग्रवाल जैसे ही फैलने की कोशिश करते हैं, द्विवेदी अपने इस उस्ताद और जेएनयू से अग्गा-पिच्छा संबंध किनारे रखकर एकदम पेशेवर अंदाज़ पर उतर आते हैं- प्रोफेसर, एक मिनट-एक मिनट..करने के साथ दो-तीन निर्गुणिया वाक्य के टुकड़े का इस्तेमाल करके साफ़ जतला देते हैं कि उस्ताद ! आज की इस महफ़िल में सिर्फ मैं फैल सकता हूं बल्कि हम कोई भी महफ़िल तब तक नहीं सजाते या उसका हिस्सा बनते हैं ...

Does God Exist 4

मेरी नज़र में हाल में हुई नास्तिक–आस्तिक बहस, जिसमें Javed Akhtar और एक मौलवी आमने–सामने थे, उसे “जीत–हार” की तरह देखना ही मूल समस्या है। असली प्रश्न यह है कि कौन-सी सोच इंसान को इंसान बनाती है और कौन-सी सोच उसे भीड़ में बदल देती है। आज जिस आस्तिकता का सबसे ज़्यादा प्रचार है, वह ज़्यादातर religion-based आस्तिकता है—जो कठोर है, डर पर टिकी है और आदेश–पालन को ही धर्म मानती है। यही वह सोच है जिसने इतिहास में सबसे ज़्यादा हिंसा को जन्म दिया। धर्म के नाम पर क़त्लेआम, अलगाव और नफ़रत इसी मानसिकता की उपज हैं। इसके ठीक उलट, spirituality (आध्यात्मिकता) प्रेम, दया और करुणा के माध्यम से ईश्वर तक पहुँचने की बात करती है। आध्यात्मिक दृष्टि कहती है कि ईश्वर बाहर नहीं, हर जीव के भीतर है। जब ईश्वर हर प्राणी में है, तो किसी को कष्ट देना, किसी की हत्या करना—ईश्वर से दूरी नहीं तो और क्या है? यही कारण है कि दुनिया के सच्चे आध्यात्मिक संत हमेशा सत्ता और धर्मसत्ता की आँखों में खटकते रहे। Kabir ने कहा—“कंकर-पाथर जोड़ि के मस्जिद लई बनाय”—तो पंडित भी नाराज़ हुए और मुल्ला भी। Gautama Buddha ने कर्मकांड, यज्ञ और जा...

Does God Exist ३

क्या किसी सवाल का इमोशनल होना किसी सवाल के इररैशनल होने की दलील है?? किसी इंसान का किसी दूसरे इंसान को दुख मे देखकर दुखी होना इमोशन ही है जो इंसान मे ज़ाहिर होता है।  कयी दफ़ा किसी सवाल का जवाब इतना सिंपल और ब्रूटल होता है कि उससे बचने के लिये बड़ी बड़ी थ्योरीज़ बनायी जाती हैं और इन थ्योरीज़ मे शामिल भारी भारी अल्फ़ाज़ के जाले मे वह निहायत सिंपल सवाल किसी छोटे से कीड़े की तरह फंस कर दम तोड़ देता है। लेकिन दम तोड़ता है ख़त्म नही होता जैसे कोई भी जानदार मर जाने के बाद भी लाश की सूरत मे मौजूद रहता है। दुनिया को एक बात समझनी होगी। जब तक कहीं कोई मज़लूम बेकसी से मरेगा, जब तक ऐसे क़हत  पड़ेंगे जिनमे लोग लाशो को खाने पर मजबूर होते रहेंगे तब तक कुछ सवाल इमोशन्स से ही होगे  क्योकि किसी को दुख मे देखकर दुखी होना इमोशन है ना कि फ़िज़िक्स।  इसी बात का दूसरा पहलू यह है कि जब तक इस दुनिया इंसान इतना मजबूर रहेगा कि उसके पास किसी ग़ैबी मदद की उमीद के सिवा कोई चारा नही होगा तब तक कोई कितना ही शोर मचाले इंसान का किसी अनदेखी ताकत मे यकीन ख़त्म नही होगा।  बाकी इस बहस से किसी को क्य...