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Ek Baar Woh Aankhon Mein Yun Bharkar Mujhe Dekhe | Romantic Urdu Ghazal | Tariq Azeem Tanha

एक बार वो आँखों में यूँ भरकर मुझे देखे, जैसे के मैं क़तरा हूँ समंदर मुझे देखे मैं उसके लिए कौन हूँ, पूछे न ज़माना, सब मेरी ख़मोशी को ही पढ़कर मुझे देखे। वो ओस की तरह मेरी पलकों पे ठहरकर फिर फूल की मानिंद वो छूकर मुझे देखे। क्या ख़ूब हो उस रात का आलम कि वो महबूब, तारों की तरह छत पे ठहरकर मुझे देखे। वो ख़्वाब में आए तो कोई ख़्वाब न टूटे, मैं आँख भी खोलूं तो बराबर मुझे देखे। क्या ख़ूब हो वो रात कि महफ़िल में अचानक, वो सब से छुपे और वो छुपकर मुझे देखे। किस दर्जा है शोले मेरी इस ख़ाक़ ए बदन में,   एक बार सही, पास तो आकर मुझे देखे। मैं रिंद-ए-मोहब्बत हूँ, मुझे ज़ाम न दे वो, बस आँख से आँखों में उतरकर मुझे देखे। मैं ख़ाक सही, ख़ाक में ताबीर-ए-चमन हूँ, वो फ़स्ल-ए-बहारा में उतरकर मुझे देखे। जब शाम ढले, चाँद निकल आए फ़लक पर, वो याद करे मुझको ठहरकर मुझे देखे। दरिया की तरह आँख में रखता हूँ तड़प मैं, वो साहिल-ए-बे-मेहर से बढ़कर मुझे देखे। कुछ राज़ हैं सीने में कि अफ़्शा नहीं होते, वो राज़ मेरी आँखों के पढ़कर मुझे देखे। हर ज़ख़्म को सीने में छुपा रखा है मैंने, वो चाक-ए-जिगर देखे तो छूकर मुझे देखे। ‘...
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One Line Famous Sher | Tariq Azem Tanha

    ऐसे बहुत से अशआर हैं, जिनका एक ही मिसरा इतना मशहूर हुआ कि लोग दूसरे मिसरे को तो भूल ही गये। ऐसे ही चन्द मशहूर अशआर यहाँ पेश हैं:   "ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है, *वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।*"   *- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़*   "ऐ 'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को न मुँह लगा, *छूटती नहीं है मुँह से ये काफ़िर लगी हुई।"*   दुख़्तर-ए-रज़ = शराब   *- शेख़ इब्राहीम ज़ौक़*   "भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया, *ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं।"*   *- माधव राम जौहर*   "चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले, *आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले।"*   *- मिर्ज़ा मोहम्मद अली फिदवी*   "दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से, *इस घर को आग लग गई,घर के चराग़ से।"*   *- महताब राय ताबां*   "ईद का दिन है, गले आज तो मिल ले ज़ालिम, *रस्म-ए-दुनिया भी है,मौक़ा भी है, दस्तूर भी है।"*   *- क़मर बदायुनी*   "ख़ंजर चले किसी पे, तड़पते हैं हम 'अमीर', *सारे जहा...

क़िरदार का दिवालियापन और दिखावे की बादशाहत। तारिक़ अज़ीम तनहा

ज़िंदगी का सबसे बड़ा तज़ाद शायद यही है कि कभी-कभी जिस शख़्स के लिए आपके दिल में बेइन्तिहा मुहब्बत, इख़्लास और ख़ैर-ख़्वाही होती है, उसी के दिल में आपके लिए नफ़रत, हसद और कीना पल रहा होता है। इंसान अपने किरदार से कम और अपनी नीयत से ज़्यादा पहचाना जाता है। मगर अफ़्सोस, हर दौर में कुछ ऐसे अफ़राद मौजूद रहे हैं जो मुहब्बत का जवाब अदावत से और ख़ुलूस का जवाब मक्र-ओ-फ़रेब से देते हैं। मैं अपने गाँव और समाज में ऐसे बहुत से चेहरे देखता हूँ। ये लोग ज़िंदगी भर किसी और की छाँव तलाश करते रहते हैं। ख़ुद अपनी मेहनत, अपनी सलाहियत और अपने वजूद पर इन्हें कभी यक़ीन नहीं होता। रोज़ी की तलाश में मुल्क से बाहर जाना कोई ऐब नहीं, मेहनत हर जगह मुक़द्दस है। लेकिन अफ़्सोस तब होता है जब वही लोग परदेस में बरसों तक दूसरों की मुलाज़मत करने के बाद अपने वतन लौटते हैं और ऐसा तास्सुर देते हैं मानो किसी सल्तनत के बादशाह हों। तकब्बुर का लिबास पहन लेना, हक़ीक़त को बदल नहीं देता। इज़्ज़त बैंक बैलेंस से नहीं, किरदार से पैदा होती है। दुनिया में रोज़ी कमाने के हज़ार रास्ते हैं। अपने मुल्क में भी इज़्ज़त के साथ कारोबार किया जा स...

ज़बान नहीं, जहालत मसला है | ज़बान से नफ़रत नहीं, मोहब्बत कीजिए

"ज़बान इंसान की पहचान हो सकती है, मगर उसकी औक़ात का पैमाना हरगिज़ नहीं। असल पैमाना उसका इल्म, उसका किरदार और उसकी सोच होती है।" हमारे समाज में एक अजीब-सी रवायत ने जन्म ले लिया है। जैसे ही कोई शख़्स अंग्रेज़ी में बात करता है, या किसी दूसरी ज़बान का इस्तेमाल करता है, कुछ लोग फ़ौरन एतराज़ करने लगते हैं "अपनी ज़बान में बात करो", "इतनी अंग्रेज़ी क्यों बोलते हो?", "क्या अंग्रेज़ी बोलने से बड़े आदमी बन जाओगे?" ऐसे सवाल दरअसल ज़बान से नहीं, बल्कि तंग-नज़री से पैदा होते हैं। ज़बान कभी मसला नहीं होती। ज़बान तो इल्म तक पहुँचने का ज़रिया है। जिस तरह एक दरिया समंदर तक पहुँचने का रास्ता बनता है, उसी तरह हर ज़बान इंसान को एक नई दुनिया, नए ख़यालात और नए मौक़ों तक ले जाती है। जो लोग इसे समझते हैं, वही दुनिया में आगे बढ़ते हैं; और जो नहीं समझते, वे दूसरों की तरक़्क़ी पर तंज़ करते रह जाते हैं। अगर कोई नौजवान बेहतरीन अंग्रेज़ी जानता है, कदीम उर्दू में शायरी कर सकता है, हिन्दी में बेहतरीन तहरीर लिख सकता है या किसी और ज़बान में अपने इल्म का इज़हार करता है, तो यह उसका ...

Rauza-e-Anwar Ki Siyanat | 1400 Saal Se Roza-e-Rasool ﷺ Ki Hifazat Ka Tareekhi Safar

بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ) जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है।" الحمدُ للهِ ربِّ العالمين، والصلاةُ والسلامُ على سيدِ المرسلين، خاتمِ النبيين، رحمةٍ للعالمين، سيدِنا ومولانا Muhammad ﷺ، وعلى آله الأطهار، وأصحابه الأخيار، ومن تبعهم بإحسانٍ إلى يوم الدين. तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं, जो सारे जहानों का पालनहार है। और दुरूद व सलाम हों तमाम रसूलों के सरदार, आख़िरी नबी, सारे जहानों के लिए रहमत, हमारे सरदार व मौला मुहम्मद ﷺ पर, और उनकी पाक आल (परिवार), उनके नेक सहाबा, और उन सब पर जो क़यामत तक नेक़ी के साथ उनकी पैरवी करते रहें।" ﴿وَرَفَعْنَا لَكَ ذِكْرَكَ﴾ और हमने आपके लिए आपके ज़िक्र को बुलंद कर दिया।" यह महज़ एक आयत नहीं, बल्कि तारीख़-ए-आलम का वह फ़ैसला है जिसकी तस्दीक़ हर गुज़रता लम्हा करता चला आ रहा है। सदियाँ गुज़र गईं, मगर यह वादा हर दौर में नई शान के साथ जल्वागर होता रहा। आज क़रीब पंद्रह सदियाँ गुज़र चुकी हैं। कितनी ही सल्तनतें बरपा हुईं, कितने तख़्त-ओ-ताज ज़वाल का शिकार हुए, कितने फ़ातिहीन-ए-आलम ख़ाक में मिल गए, कि...