Skip to main content

Posts

ज़बान नहीं, जहालत मसला है | ज़बान से नफ़रत नहीं, मोहब्बत कीजिए

"ज़बान इंसान की पहचान हो सकती है, मगर उसकी औक़ात का पैमाना हरगिज़ नहीं। असल पैमाना उसका इल्म, उसका किरदार और उसकी सोच होती है।" हमारे समाज में एक अजीब-सी रवायत ने जन्म ले लिया है। जैसे ही कोई शख़्स अंग्रेज़ी में बात करता है, या किसी दूसरी ज़बान का इस्तेमाल करता है, कुछ लोग फ़ौरन एतराज़ करने लगते हैं "अपनी ज़बान में बात करो", "इतनी अंग्रेज़ी क्यों बोलते हो?", "क्या अंग्रेज़ी बोलने से बड़े आदमी बन जाओगे?" ऐसे सवाल दरअसल ज़बान से नहीं, बल्कि तंग-नज़री से पैदा होते हैं। ज़बान कभी मसला नहीं होती। ज़बान तो इल्म तक पहुँचने का ज़रिया है। जिस तरह एक दरिया समंदर तक पहुँचने का रास्ता बनता है, उसी तरह हर ज़बान इंसान को एक नई दुनिया, नए ख़यालात और नए मौक़ों तक ले जाती है। जो लोग इसे समझते हैं, वही दुनिया में आगे बढ़ते हैं; और जो नहीं समझते, वे दूसरों की तरक़्क़ी पर तंज़ करते रह जाते हैं। अगर कोई नौजवान बेहतरीन अंग्रेज़ी जानता है, कदीम उर्दू में शायरी कर सकता है, हिन्दी में बेहतरीन तहरीर लिख सकता है या किसी और ज़बान में अपने इल्म का इज़हार करता है, तो यह उसका ...
Recent posts

Rauza-e-Anwar Ki Siyanat | 1400 Saal Se Roza-e-Rasool ﷺ Ki Hifazat Ka Tareekhi Safar

بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ) जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है।" الحمدُ للهِ ربِّ العالمين، والصلاةُ والسلامُ على سيدِ المرسلين، خاتمِ النبيين، رحمةٍ للعالمين، سيدِنا ومولانا Muhammad ﷺ، وعلى آله الأطهار، وأصحابه الأخيار، ومن تبعهم بإحسانٍ إلى يوم الدين. तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं, जो सारे जहानों का पालनहार है। और दुरूद व सलाम हों तमाम रसूलों के सरदार, आख़िरी नबी, सारे जहानों के लिए रहमत, हमारे सरदार व मौला मुहम्मद ﷺ पर, और उनकी पाक आल (परिवार), उनके नेक सहाबा, और उन सब पर जो क़यामत तक नेक़ी के साथ उनकी पैरवी करते रहें।" ﴿وَرَفَعْنَا لَكَ ذِكْرَكَ﴾ और हमने आपके लिए आपके ज़िक्र को बुलंद कर दिया।" यह महज़ एक आयत नहीं, बल्कि तारीख़-ए-आलम का वह फ़ैसला है जिसकी तस्दीक़ हर गुज़रता लम्हा करता चला आ रहा है। सदियाँ गुज़र गईं, मगर यह वादा हर दौर में नई शान के साथ जल्वागर होता रहा। आज क़रीब पंद्रह सदियाँ गुज़र चुकी हैं। कितनी ही सल्तनतें बरपा हुईं, कितने तख़्त-ओ-ताज ज़वाल का शिकार हुए, कितने फ़ातिहीन-ए-आलम ख़ाक में मिल गए, कि...

अक्स-ए-रुख़्सार तिरा आब-ए-रवाँ में उतरे,

अक्स-ए-रुख़्सार तिरा आब-ए-रवाँ में उतरे, चाँद पानी में नहाएगा तो छा जाएगा। दिल के वीरान शबिस्ताँ में तिरी याद का चाँद, रौशनी बन के जो आएगा तो छा जाएगा। दश्त-ए-इम्काँ में बहुत ख़ाक उड़ाई सब ने, इश्क़ जब ख़ेमे लगाएगा तो छा जाएगा। सिर्फ़ जीने से कहाँ होती है पहचान कोई, दर्द को फ़न में जो लाएगा तो छा जाएगा। ताज वालों को हमेशा यही धोका है कि बस, ख़ौफ़ से मुल्क चलाएगा तो छा जाएगा। जाम-ए-जम भी तिरी आँखों का मुक़ाबिल न हुआ, कोई साक़ी इन्हें पाएगा तो छा जाएगा। दश्त-ए-ग़ुर्बत में कोई नक़्श-ए-क़दम मिल जाए, कारवाँ राह पे आएगा तो छा जाएगा। नर्गिस-ए-शौक़ को दीदार की बारिश दे दे, फूल हर सिम्त खिलाएगा तो छा जाएगा। बज़्म-ए-अहबाब में तेरी ही सना होगी कभी, कोई तेरा ज़िक्र उठाएगा तो छा जाएगा। तेरी आँखों में जो देखेगा समन्दर का वक़ार, अपनी हस्ती को भुलाएगा तो छा जाएगा। बू-ए-गुल, रंग-ए-सहर, नूर-ए-कमर सब हैं मगर, तू निगाहों में समाएगा तो छा जाएगा। तेरे रुख़्सार की ताबिन्दगी ऐसी है कि माह, अपनी किरनों को झुकाएगा तो छा जाएगा। हुस्न जब पर्दा-ए-रंगीं से निकल कर शब में, जल्वा-ए-ख़ास दिखाएगा तो छा जाएगा। 'तन्ह...

दो बार बिकने वाला वो ग़ुलाम, जो दिल्ली के तख़्त पर बैठा और सल्तनत-ए-दिल्ली की बुनियाद रख गया

दो बार बिकने वाला वो ‘ग़ुलाम’ जो दिल्ली के तख़्त पर बैठा और सल्तनत-ए-मुस्लिम की बुनियाद रख गया क़ुतबुद्दीन ऐबक तुर्कों के मशहूर ‘ऐबक’ क़बीले से ताल्लुक़ रखते थे। "ऐबक" तुर्की ज़बान का लफ़्ज़ है, जिसका मानी है "माह का मालिक" यानी "चाँद का स्वामी"। मुवर्रिख़ीन बयान करते हैं कि इस क़बीले के मर्द व ख़वातीन अपने हुस्न-ओ-जमाल के लिए मशहूर थे, लेकिन क़ुतबुद्दीन ऐबक इस एतिबार से अपने क़बीले के दूसरे अफ़राद जैसे ख़ूबसूरत नहीं थे। आज से तक़रीबन आठ सौ बरस पहले अफ़ग़ानिस्तान में सुल्तान मुईज़ुद्दीन मोहम्मद ग़ौरी की हुकूमत थी। सुल्तान अपनी ऐश-ओ-इश्रत भरी ज़िंदगी के साथ-साथ अहल-ए-दरबार, मशीरों, उमरा और ग़ुलामों की क़द्रदानी के लिए भी जाना जाता था। उसके दरबार में एक ऐसा ग़ुलाम भी मौजूद था जिसने सुल्तान की तरफ़ से इनायत किए गए ख़ज़ाने को अपने पास रखने के बजाय महल के बाहर खड़े पहरेदारों, मुफ़लिसों और ज़रूरतमंदों में तक़सीम कर दिया। उसकी इस दरियादिली ने अहल-ए-सल्तनत को हैरतज़दा कर दिया। यह वाक़िआ चर्चा का मौज़ू बना और आख़िरकार उसकी ख़बर ख़ुद सुल्तान तक जा पहु...

Mai Kuch Soch Raha Hu | मैं कुछ सोच रहा हूँ | तारिक़ अज़ीम तनहा

दिल ढूँढता है जाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ ऐ साक़ी-ए-गुलफ़ाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ क्या कीजिए अब काम, मैं कुछ सोच रहा हूँ आ पहुँचा तिरा नाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ इस दौर ने इंसान को बाज़ार बनाया क्या है मेरा अंजाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ गुम है मिरे अहसास का इक शहर-ए-मुसलसल किस पर रखूँ इल्ज़ाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ मरना भी ज़रूरी है मगर जल्द नहीं है बाक़ी हैं कई काम, मैं कुछ सोच रहा हूँ आने की ख़बर है तो उजालों को बुला लो ऐ काकुल-ए-गुलफ़ाम मैं कुछ सोच रहा हूँ किस तरह तेरे नाम से आबाद था आलम अब कैसी हुई शाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ नक़्शों में नहीं मिलता वो गुमगश्ता-सा आलम ढूँढूँ किसे हर गाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ तहज़ीब के चेहरे पे उदासी है मुसल्सल किस ने किया ये काम, मैं कुछ सोच रहा हूँ आँखों में तिरी दीद की ताबिन्दा तजल्ली हाथों में लिए जाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ दिल कहता है फिर आज उसी राह से गुज़रूँ ऐ हसरत-ए-नाकाम मैं कुछ सोच रहा हूँ मस्जिद में भी देखा है उसे, दैर में मैंने क्या उसका है इक नाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ तस्बीह भी, ज़ुन्नार भी, मयख़ाना भी, दरगाह क्या चीज़ है ये जाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ आँखों...