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दुनिया जंग के मुहाने पर नहीं… बयानियों के जाल में क़ैद है

यह जो फिज़ा में एक बेचैनी सी तैर रही है, यह महज़ ख़बरों का शोर नहीं… बल्कि बयानियों की वो धुंध है, जिसमें हक़ीक़त की शक्ल धुंधली पड़ जाती है। कहा जा रहा है कि क्यूबा अंधेरों में डूब चुका है, अमेरिका ने उसकी सांसें रोक दी हैं, और रूस एक तेल से भरे जहाज़ के साथ मैदान में उतर आया है मानो बस एक चिंगारी बाकी है और दुनिया जंग-ए-अज़ीम की आग में झुलस जाएगी। मगर सवाल यह है कि क्या मंज़रनामा वाक़ई इतना सीधा और सादा है? क्यूबा की हालत बेशक नाज़ुक है। बरसों की पाबंदियां, कमज़ोर मआशियत और ईंधन की किल्लत ने वहां के निज़ाम-ए-ज़िंदगी को हिला कर रख दिया है। अस्पतालों की रौशनी मंद है, सड़कों पर सन्नाटा है, और अवाम एक गैर-यक़ीनी कल के साए में जी रही है। लेकिन यह तस्वीर एक-रुख़ी नहीं… यह मुकम्मल तबाही नहीं, बल्कि लंबे दबाव का नतीजा है, जिसे सनसनीख़ेज़ अल्फ़ाज़ में “अंधेरे में डूबा मुल्क” बना दिया गया है। फिर आता है रूसी जहाज़ का क़िस्सा, एक ऐसा बयानिया जिसे इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे अमेरिका के पास दो ही रास्ते बचे हों: या तो जहाज़ रोके और जंग मोल ले, या उसे जाने दे और अपनी साख गंवा दे। हालांकि हक़ीक़...
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सियासत का मज़ाक या हक़ीक़त? 2×2 का जवाब और हुकूमती बयानीया का फ़लसफ़ा

कभी-कभी एक मामूली सा मज़ाहिया वाक़िआ (Incident) इतनी गहरी हक़ीक़त को बेनक़ाब कर देता है कि बड़े-बड़े सियासी तजज़िये (Political Analyses) भी उसके सामने फीके पड़ जाते हैं। “2×2 का जवाब” वाला यह किस्सा भी महज़ एक लतीफ़ा (Joke) नहीं, बल्कि हमारे दौर की सियासी फ़िक्र (Political Thinking) और बयानीये (Narrative) का आइना है। जब एक बच्चा ये कहता है कि उसने “5” बताया और बाकी “11” तक पहुँच गए, तो ये सिर्फ़ जहालत (Ignorance) की निशानी नहीं, बल्कि एक ऐसे निज़ाम (System) की झलक है जहाँ सही जवाब की अहमियत कम और खुश करने की सियासत ज़्यादा अहम हो जाती है। यही वो नुक्ता (Point) है जहाँ मज़ाह, हक़ीक़त में तब्दील होता है। सियासत में अक्सर देखा गया है कि बयानीया (Narrative) हक़ीक़त (Reality) पर भारी पड़ जाता है। सही जवाब “4” होता है ये बात भी सभी जानते है, मगर अगर महफ़िल (Power Circle) में “5” या “11” पसंद किया जा रहा हो, तो लोग उसी को दोहराने लगते हैं। ये अमल सिर्फ़ फ़र्दी (Individual) नहीं, बल्कि इज्तिमाई (Collective) सूरत इख़्तियार कर लेता है। इस तरह की सियासी रवायत (Tradition) में असल मसला ये नहीं होता ...

हिंदुस्तानी सियासत में हलचल: मधु किश्वर के इत्तिहामात (Allegations) ने खड़ा किया बड़ा सवाल

हिंदुस्तानी सियासत (Politics) में अक्सर ऐसे लम्हात आते हैं जब कोई एक बयान पूरा मंजरनामा (Scenario) बदल देता है। हालिया दिनों में एक ऐसा ही बयान सामने आया है, जिसने न सिर्फ़ सियासी हलकों में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि अवाम (Public) के दरमियान भी गहरी बहस छेड़ दी है। मधु किश्वर, जो कभी हुकूमत के करीब मानी जाती थीं और एक खास सियासी तफक्कुर (Ideology) की हामी रही हैं, उनके ताज़ा इज़हारात (Statements) ने कई सवालात को जन्म दिया है। उन्होंने अपने बयान में कुछ संगीन इत्तिहामात (Serious Allegations) पेश किए हैं, जिनमें शख्सियाती और सियासी दोनों पहलुओं का ज़िक्र मिलता है। अहम बात ये है कि ये इत्तिहामात किसी अदालती फैसले या मुस्तनद (Verified) तहक़ीक़ (Investigation) से साबित नहीं हुए हैं, बल्कि एक शख्सी तजुर्बे और राय (Opinion) के तौर पर सामने आए हैं। लेकिन सियासत की दुनिया में अक्सर राय भी एक ताक़तवर अस्लाह (Weapon) बन जाती है, जो अवामी ज़ेहन (Public Mind) को मुतास्सिर करती है। ये मामला सिर्फ़ एक शख्स या एक बयान तक महदूद नहीं है, बल्कि ये उस बड़े मसले की तरफ इशारा करता है जहाँ सियासी शख्सियात (Po...

ज़बान, तहज़ीब और जुग़राफ़िया: अल्फ़ाज़ का सफ़र और इंसानी शऊर की हक़ीक़त

दुनिया की तारीख़ को अगर किसी एक आइने में देखा जाए तो वो ज़बान है वही ज़बान जो इंसान की तहज़ीब (Culture) की रूह है, वही ज़बान जो जुग़राफ़िया (Geography) की परछाईं है। इंसान जहाँ बसता है, वहीं उसके अल्फ़ाज़ जन्म लेते हैं; जहाँ दरिया बहते हैं, वहाँ लफ़्ज़ भी रवाँ होते हैं; जहाँ रेगिस्तान है, वहाँ ताबिश (Heat) के सैंकड़ों इज़हार मिलते हैं, और जहाँ बर्फ़ की दुनिया है, वहाँ सरदी के रंग बेशुमार होते हैं। तारीख़ गवाह है कि इंसान ने जब पहली मर्तबा अपनी ज़िंदगी को तशकील दी, तो दरिया-ए-दजला और फरात के किनारों पर दी। यही वो मक़ाम था जहाँ बशर (Human) ने ख़ाना-बदोशी (Nomadism) छोड़कर स्थायित्व (Settlement) अपनाया। इसी सरज़मीन ने तहज़ीब को जन्म दिया और ज़बान को शक्ल दी। यही वजह है कि दरियाओं के नाम, पहाड़ों के नाम, समंदरों के नाम हर एक में उस इलाक़े की पहचान, उसकी रूह और उसकी तारीख़ समाई होती है। अगर हम दुनिया के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों पर नज़र डालें, तो हर ज़बान अपने माहौल का अक्स (Reflection) नज़र आती है। अरब के सहरा (Desert) में गर्मी के लिए दर्जनों अल्फ़ाज़ मिलते हैं, लेकिन बर्फ़ के लिए बहुत कम; वहीं ...

“समुंद्री केबल्स का ख़तरा: क्या ईरान आलमी इंटरनेट निज़ाम (Global Internet System) को मुअत्तल (Disrupt) कर सकता है?”

आज की दुनिया में जंग (War) सिर्फ़ मिसाइल (Missiles) और टैंक (Tanks) तक महदूद नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसे मुकाम (Stage) पर पहुँच चुकी है जहाँ असल जंग नजरों से ओझल (Invisible) ढांचों पर लड़ी जाती है। और उन्हीं में से एक है समुंदर के नीचे बिछा हुआ इंटरनेट का निज़ाम (Internet Infrastructure – डिजिटल ढांचा)। अक्सर लोग यह समझते हैं कि इंटरनेट सैटेलाइट (Satellite) के जरिए चलता है, लेकिन हक़ीक़त इससे बिल्कुल मुख्तलिफ़ (Different) है। दुनिया का तकरीबन 95% से ज़्यादा डेटाबैंकिंग ट्रांजैक्शन (Bank Transactions), क्लाउड सर्विस (Cloud Services), ईमेल (Email) सब कुछ समुंदर के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल्स (Fiber Optic Cables – इंटरनेट के तार) के जरिए गुजरता है। यही वह बुनियादी ढांचा (Backbone) है, जिस पर पूरी डिजिटल दुनिया खड़ी है। हालिया दावों में यह कहा जा रहा है कि Iran इन केबल्स को निशाना बना सकता है। लेकिन यहाँ सबसे अहम बात यह है अब तक ऐसी किसी सीधी, आधिकारिक धमकी या कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है। यह सच है कि पर्शियन गल्फ (Persian Gulf – खाड़ी इलाक़ा) एक बेहद अहम डेटा रूट (Data Route) है, जहाँ स...