Skip to main content

Posts

तारिक़ अज़ीम तनहा : एक पुर-असरार मिज़ाज, फ़िक्र और रूहानियत का शायर

आज के दौर में, जब शायरी का एक बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया की त्वरित वाह-वाही, जज़्बाती नारों और सतही तास्सुरात का शिकार होता जा रहा है, वहाँ तारिक़ अज़ीम तनहा का कलाम एक अलग ही कैफ़ियत पैदा करता है। उनकी शायरी को पढ़ते हुए यूँ महसूस होता है जैसे शोर-ओ-गुल से भरी दुनिया में अचानक किसी पुरानी किताब का एक वर्क खुल जाए, जिसकी ख़ुशबू भी अनजानी हो और असर भी देर तक बाक़ी रहे। तनहा भाई उन नौजवान शायरों में से नहीं हैं जो महज़ इश्क़, जुदाई या तन्हाई को अपनी शायरी का मरकज़ बनाते हैं। उनके यहाँ इश्क़ है, मगर इश्क़ के पीछे मौजूद मआरिफ़त भी है; हिज्र है, मगर उसके पीछे की रूहानी कैफ़ियत भी; और ज़िंदगी है, मगर उसके साथ-साथ ज़िंदगी को समझने की बेचैनी भी। उनकी शायरी को पढ़ते हुए अक्सर यह एहसास होता है कि यह अशआर किसी ऐसे शख़्स के हैं जिसने किताबें सिर्फ़ पढ़ी नहीं, उनसे गुफ़्तगू भी की है; जिसने ज़िंदगी को सिर्फ़ जिया नहीं, उस पर ग़ौर भी किया है। उनके कलाम में फ़िक्र की वह तहदारी दिखाई देती है जो आज के दौर में कम ही नज़र आती है। उनकी की शायरी में उर्दू की नफ़ासत, फ़ारसी की लताफ़त और हिंदुस्तानी ...
Recent posts

दुख की तहों में उतरती एक रूहानी ग़ज़ल

कुछ अश्आर महज़ अल्फ़ाज़ नहीं होते, बल्कि रूह के उन मक़ामात की तर्जुमानी करते हैं जहाँ इंसान अपनी ही ज़ात से बेगाना होने लगता है। यह ग़ज़ल भी उसी कैफ़ियत की पैदाइश है एक ऐसी रात की, जहाँ तन्हाई सिर्फ़ कमरे में नहीं बल्कि नस-नस में उतर आई थी। इस ग़ज़ल का मर्कज़ी एहसास “दुख” है, मगर यह कोई सीधा-सादा ग़म नहीं; बल्कि इद्राक, हिज्र, ख़ामोशी, हैरानी और वक़्त की गर्द से बना हुआ वह रूहानी बोझ है जो इंसान उम्र भर अपने अंदर उठाए फिरता है। “सुब्ह-ए-फ़ुर्क़त” से “शब-ए-गेसू” तक, “दश्त-ए-इद्राक” से “कूचा-ए-अय्याम” तक, हर इस्तिआरा इस बात की गवाही देता है कि मैने दर्द को महज़ महसूस नहीं किया, बल्कि उसे जिया है। यह ग़ज़ल उस दिल की आवाज़ है जिसने दुनिया के सामने सुकूँ का चेहरा रखा, लेकिन अपनी आँखों में भरे हुए जाम का दुख किसी पर आश्कार न होने दिया। इसमें फ़ारसी तखय्युल, उर्दू की नर्मी और सूफ़ियाना इबहाम एक साथ दिखाई देते हैं। कई अश्आर ऐसे हैं जहाँ दर्द किसी महबूब की जुदाई से आगे बढ़कर वजूद की तन्हाई बन जाता है। “जाम”, “सहरा”, “बाम”, “ज़ुल्फ़”, “शबनम” और “वीराना” जैसी अलामतें सिर्फ़ हुस्न-ओ-इश्क़ की तर्जु...

बंगाल में गायों का बायकॉट: मज़हबी रियाकारी, क़ुर्बानी और इंसानी अख़लाक़ पर एक तल्ख़ तज्ज़िया

  मग़रिबी बंगाल में ईदुज़्ज़ुहा के मौक़े पर एक ऐसा मंज़र सामने आया जिसने हिन्दुस्तानी मुआशरे , मज़हबी सियासत और इंसानी अख़लाक़ तीनों को एक साथ आईना दिखा दिया। बताया गया कि कई मुसलमानों ने उन हिन्दू ताजिरों से गायें ख़रीदने से इनकार कर दिया जो उन्हें ईद की क़ुर्बानी के लिए बाज़ार में लाए थे। पहली नज़र में यह मंज़र कुछ लोगों को आपसी एहतराम और मज़हबी हम-आहंगी का नमूना मालूम हो सकता है , लेकिन अगर इस वाक़िआ की तह में उतरकर देखा जाए तो यह महज़ एक मज़हबी-सियासी तदबीर से ज़्यादा कुछ दिखाई नहीं देता। असल सवाल यह है कि अगर गाय की जगह किसी दूसरे जानवर की क़ुर्बानी दी जाएगी तो क्या इंसानी रहम , अख़लाक़ और ज़मीर का मसला हल हो जाता है ? अगर एक जान बचाकर दूसरी जान ले ली जाए तो क्या उसे रहमत और परहेज़गारी कहा जाएगा ? जान तो हर मख़लूक़ को अज़ीज़ होती है। दर्द का एहसास सिर्फ़ इंसान तक महदूद नहीं। जिस तरह इंसान मौत से डरता है , उसी तरह एक बकरी , भेड़ , भैंस या गाय भी अपनी ज़िन्दगी से मोहब्बत करती है। यही वजह है कि बहुत से अक़्लपरस्त और रहम-दिली में यक़ीन रखने वाले लोग क़ुर्बानी की पूरी रवायत को ही नैतिक एतिबार से सवालि...

सियासी मंज़रनामा: मोदी का असर, राहुल की उम्मीदें और 2029 की सियासत

कल बहुत अर्से बाद ऐसा हुआ कि वज़ीर-ए-आज़म का ख़िताब था और उनके अपने सफ़्हे पर देखने वालों की तादाद अक्सर औक़ात लाख से भी नीचे रही। ट्विटर पर एक मरतबा ज़रूर तादाद 1.37 लाख के क़रीब पहुँची जब तक़रीर ख़त्म होने में १०–१२ मिनट बाक़ी थे। भाजपा के सफ़्हे पर तो ये तादाद ढाई हज़ार तक पहुँचना भी मुश्किल लग रही थी। मोदी एक कल्ट की शक्ल में उभरे, लेकिन २०१९ के बाद उस जादू में कमी आने लगी। मिडिल क्लास जो उनके साथ मुंसलिक था, उसी तबक़े को सबसे ज़्यादा तकलीफ़ हुई। राम मंदिर बनने के बाद जब हर तरफ़ ४०० का आंकड़ा बताया जा रहा था, मैंने अपने पंचायती चैनल पर शुब्हा ज़ाहिर किया था और पहले मरहले के इंतिख़ाबात के बाद मेरी हिसाब-किताब २४५ सीट के क़रीब की थी। (वीडियो वहीं मौजूद है।) उस वक़्त भी बहुत से हामी और मुख़ालिफ़ दोनों ही इस तादाद के ख़िलाफ़ थे। मोदी के परस्तार क्यों मुख़ालिफ़ थे, ये आप समझ सकते हैं, और राहुल गांधी के नए हामी वोटिंग पैटर्न और अवामी रवैये के मंतिक को उतना ही समझते हैं जितना तमिलनाडु के लोग हिंदी। बहरहाल, एक बात तय है कि मोदी अब अगले लोकसभा इंतिख़ाबात में कोई जादू पैदा नहीं कर सकते। उनकी...

दुनिया जंग के मुहाने पर नहीं… बयानियों के जाल में क़ैद है

यह जो फिज़ा में एक बेचैनी सी तैर रही है, यह महज़ ख़बरों का शोर नहीं… बल्कि बयानियों की वो धुंध है, जिसमें हक़ीक़त की शक्ल धुंधली पड़ जाती है। कहा जा रहा है कि क्यूबा अंधेरों में डूब चुका है, अमेरिका ने उसकी सांसें रोक दी हैं, और रूस एक तेल से भरे जहाज़ के साथ मैदान में उतर आया है मानो बस एक चिंगारी बाकी है और दुनिया जंग-ए-अज़ीम की आग में झुलस जाएगी। मगर सवाल यह है कि क्या मंज़रनामा वाक़ई इतना सीधा और सादा है? क्यूबा की हालत बेशक नाज़ुक है। बरसों की पाबंदियां, कमज़ोर मआशियत और ईंधन की किल्लत ने वहां के निज़ाम-ए-ज़िंदगी को हिला कर रख दिया है। अस्पतालों की रौशनी मंद है, सड़कों पर सन्नाटा है, और अवाम एक गैर-यक़ीनी कल के साए में जी रही है। लेकिन यह तस्वीर एक-रुख़ी नहीं… यह मुकम्मल तबाही नहीं, बल्कि लंबे दबाव का नतीजा है, जिसे सनसनीख़ेज़ अल्फ़ाज़ में “अंधेरे में डूबा मुल्क” बना दिया गया है। फिर आता है रूसी जहाज़ का क़िस्सा, एक ऐसा बयानिया जिसे इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे अमेरिका के पास दो ही रास्ते बचे हों: या तो जहाज़ रोके और जंग मोल ले, या उसे जाने दे और अपनी साख गंवा दे। हालांकि हक़ीक़...