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Showing posts with the label तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

रंगो का पर्व-होली...

सबको रंग लगाओ के होली आ गयी, कैलाश को सजाओ के होली आ गयी! भीगा दो आज सबका तन-मन रंग से, गुलाल लेकर आओ के होली आ गयी! जो आज भी रो रहा कोने में   बैठकर, उसे भी गले लगाओ के होली आ गयी! गिले-...

बादे-नौ-बहार चली, आ गयी हैं अब होली

बाद-ए-नौ-बहार चली आ गयी हैं अब होली, खिली हैं हर एक कली आ गयी हैं अब होली सभी लोग मस्त हैं, अब नाचते हैं गाते हैं तुम भी झूमो अपनी गली आ गयी हैं अब होली रंग भी बिखरते हैं, बिखरते हैं ...

तनहा

इश्क़ में हैं गुज़रे हम तेरे शहर से तनहा, महब्बत के उजड़े हुए घर से तनहा! हम वो हैं जो जीये जिंदगी भर से तनहा, और महशर में भी जायेंगे दहर से तनहा! तख़्लीक़े-शेर क्या बताऊ कितना गराँ है...

बहुत दिनों बाद कई...

बहुत दिनों बाद कई बाते अमल में आयी, जब तुझको सोचा और तू ग़ज़ल में आयीं! उस इमारत के दरो-दीवार में ही हैं मुहब्बत, वरना क्या ख़ास बात ताजमहल में आयी! लालसा ताज़पोशी की थी जो दिए जुमले, ...

Kitna haseen hain

कितना हसी हैं मौसमें-बहार आज की शाम, आ रही हैं आसमाँ से फुआर आज की शाम! ये बुँदे बारिश की गुमाँ करती होगी खुदपर, भीग रहा हैं इनमे मेरा यार आज की शाम! ये ठंडी हवाये, ये फ़िज़ा कहाँ से ...

आसु बहाओ....

आँसू बहाओ या चुकाओ कीमतें-बर्बादी, हम इतने आम भी नहीं के जो मुफ़्त में मिले! तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

ऐ मुंसिफ

ऐ मुंसिफ तुझे मुंसिफि ए निजाम बदलना होगा, वरना शाह से कहकर हमे तेरा काम बदलना होगा!! शायद उन्होंने छोड़ दिया होगा वो आशियाना, हमे भी अपना ये  दर-ओ-बाम बदलना होगा!! दिलो में इक दूस...

चंद अश्आर

(1) मैदाने-हश्र को भूल गए हम मसरूफ होकर, इस जिंदगी को ऐसे मसरूफ़ होकर ना गुज़ारो! (2) अब अपने कदमो पे भी यकीन ना रहा मुझे, उतरा हूँ आज सीढ़ियों से तो दीवार का सहारा लेकर! (3) मिरी दास्ताने-म...

ग़ज़ल लहू मांगती हैं।

ग़ज़ल- मेरा नज़रिया फ़ारसी के ये भारी भरकम शब्द जैसे फ़ाइलातुन, मसतफ़ाइलुन या तमाम बहरों के नाम आप को याद करने की ज़रूरत नही है.ये सब उबाऊ है इसे दिलचस्प बनाने की कोशिश करनी है. आप स...

कोई नहीं अब हमदम अपना।

कोई नहीं अब हमदम अपना, किसे कहु अब सनम  अपना! अपनी अदाये जो याद नहीं, बिना मतलब हैं जनम अपना! साये से भी डर जाते हैं अब, इतना बढ़ चुका वहम अपना! दुश्मन हमे देख राह छोड़ देते, ऐसा हैं अ...

उर्दू में छंद मुक्त कविता।

मैं तो हूँ ही तिफ्ले-नादाँ, इल्मे-कलम कहाँ, लेकिन हक़ीक़त ये भी है की जिन लम्हात की ये चश्म तस्वीर बना ले उन्हें दिल से ज़ुबाँ, और ज़ुबाँ से लफ्ज़ देने से मैंने कभी तक़ल्लुफ़ नही किया...

मरहले और भी हैं.....

खत्म हुए या जिंदगी के रास्ते और भी है, हम ने देखे है जीस्त के मरहले और भी है! वो दौरे-इश्क़ और था जो मांगता था लहू, अबतो खून से भी जिस्म सस्ते और भी है! जुलेका लाएगी युसूफ को बाजारे-मिस्र से,               खरीद  ही लेगी नूर  को सिक्के और भी हैं! मुब्तिला-ए-तन्हाई का ही फक्र नही मुझे,                गमें-दर्दो-अलम से मेरे रिश्ते और भी हैं! ज़माना भी शायरी-ए-तनहा पढ़ने लगा,                 वरना सुख़नवर यहाँ लिखते और भी हैं! कलम हमारा कागज़ तक ही महदूद नहीं,                   इसे लगाके शेरवानी पे हम सजते और भी हैं! तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

जाम.....

!!.."जाम का शीशा हाथो में देख शराबी ना समझ"..!! !!.."हर वो शख्स जो मस्जिद से निकले नमाजी नही होता"..!!

खवाब पर आती नहीं अब...

नींद गिरिया ए बाब पर आती नही अब, आ  जाए तो खवाब पर  आती नहीं अब! गिरिया; आँख,  बाब; दरवाज़ा सीरत को तरजीह देता हूँ सूरत को नहीं, नज़र हुस्नो-शबाब पर आती नहीं अब! आँखे मोबाइल की तलबगार ...