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दिल को हर लम्हा जलाने की ज़रूरत क्या है

मोहब्बत जब अपने अस्ल मफ़हूम में दिल में उतर जाए तो बहुत-सी रस्में, बहुत-से तकल्लुफ़ और बहुत-सी शिकायतें अपनी अहमियत खो देती हैं। इंसान को एहसास होने लगता है कि जो चीज़ दिल में मौजूद है, उसे बार-बार साबित करने की ज़रूरत नहीं होती। यही एहसास इस ग़ज़ल की बुनियाद है। इस ग़ज़ल के अशआर में मोहब्बत, याद, तअल्लुक़, तग़ाफ़ुल और इंसानी रवैयों को सवालिया अंदाज़ में बयान किया गया है। ये सवाल किसी एक शख़्स से नहीं, बल्कि कभी महबूब से, कभी ख़ुद अपनी ज़ात से और कभी पूरे समाज से मुख़ातिब दिखाई देते हैं। हर शेर अपने अंदर एक फ़िक्र और एक पैग़ाम समेटे हुए है। दिल को हर लम्हा जलाने की ज़रूरत क्या है, फूल को आग लगाने की ज़रूरत क्या है। दिल में मौजूद हो जब नूर-ए-मोहब्बत का चराग़, घर में सौ दीप जलाने की ज़रूरत क्या है। हम ने माना कि तिरा हुस्न क़यामत है मगर, हर घड़ी नाज़ दिखाने की ज़रूरत क्या है। दिल में मौजूद अगर यार का काशाना रहे, फिर कहीं और ठिकाने की ज़रूरत क्या है। जिस को आना ही नहीं लौट के वापस इक दिन, उस को रिश्ते भी निभाने की ज़रूरत क्या है। अहल-ए-दिल ख़ुद ही समझ लेते हैं आँखों की ज़बाँ, उन को तफ़्सी...