ईरान की हिकमत-ए-अमली: क़ीमत-ए-नफ़्त (Crude Oil Prices) $200 प्रति बैरल तक — जंग-ए-मुआशियाती (Economic Warfare) का असली मक़सद
मशरिक़-ए-औसत की सियासत और जंगों की तारीख़ बार-बार इस हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करती रही है कि हर मुक़ाबला सिर्फ़ मैदान-ए-जंग में तय नहीं होता। कई बार असल फ़ैसला तोप, मिसाइल और जहाज़ों से नहीं बल्कि मुआशियात (Economy) के ज़रिये होता है। आज ईरान ने बिल्कुल वही रास्ता इख़्तियार किया है जो ज़ाहिर में कमज़ोर मालूम होता है मगर दरअस्ल एक गहरी हिकमत-ए-अमली पर मबनी है। चंद रोज़ पहले तक अक्सर लोग ये समझ रहे थे कि इसराइल ने ईरान की दिफ़ा-ए-फ़िज़ा (Air Defense) का बड़ा हिस्सा तबाह कर दिया है और अब क़िस्सा ख़त्म हो चुका है। तजज़िया करने वाले अफ़राद और आम लोग दोनों इस गुमान में थे कि जंग का नतीजा लगभग वाज़ेह है। मगर यह तसव्वुर शायद जंग की असल फ़ितरत को समझने में एक बड़ी ग़लती थी। ईरान का मक़सद इस मुक़ाबले को रिवायती मायनों में जीतना नहीं है। तेहरान की क़ियादत इस जंग को इतना महँगा बनाना चाहती है कि फ़तह (Victory) ख़ुद बे-मानी हो जाए। यह दो बिल्कुल मुख़्तलिफ़ खेल हैं और बहुत से लोग अब भी इस फ़र्क़ को समझ नहीं पा रहे। ईरान अब सिर्फ़ अस्करी मुक़ाबला नहीं कर रहा। दरअस्ल यह जंग-ए-मुआशियाती (Economic Warfare) ...