"ज़बान इंसान की पहचान हो सकती है, मगर उसकी औक़ात का पैमाना हरगिज़ नहीं। असल पैमाना उसका इल्म, उसका किरदार और उसकी सोच होती है।"
हमारे समाज में एक अजीब-सी रवायत ने जन्म ले लिया है। जैसे ही कोई शख़्स अंग्रेज़ी में बात करता है, या किसी दूसरी ज़बान का इस्तेमाल करता है, कुछ लोग फ़ौरन एतराज़ करने लगते हैं "अपनी ज़बान में बात करो", "इतनी अंग्रेज़ी क्यों बोलते हो?", "क्या अंग्रेज़ी बोलने से बड़े आदमी बन जाओगे?"
ऐसे सवाल दरअसल ज़बान से नहीं, बल्कि तंग-नज़री से पैदा होते हैं।
ज़बान कभी मसला नहीं होती। ज़बान तो इल्म तक पहुँचने का ज़रिया है। जिस तरह एक दरिया समंदर तक पहुँचने का रास्ता बनता है, उसी तरह हर ज़बान इंसान को एक नई दुनिया, नए ख़यालात और नए मौक़ों तक ले जाती है। जो लोग इसे समझते हैं, वही दुनिया में आगे बढ़ते हैं; और जो नहीं समझते, वे दूसरों की तरक़्क़ी पर तंज़ करते रह जाते हैं।
अगर कोई नौजवान बेहतरीन अंग्रेज़ी जानता है, कदीम उर्दू में शायरी कर सकता है, हिन्दी में बेहतरीन तहरीर लिख सकता है या किसी और ज़बान में अपने इल्म का इज़हार करता है, तो यह उसका जुर्म नहीं, बल्कि उसकी मेहनत, उसकी तालीम और उसकी लगन का नतीजा है। उससे जलने या उसका मज़ाक़ उड़ाने के बजाय उससे सीखना चाहिए।
हैरत की बात यह है कि जो लोग सबसे ज़्यादा दूसरों की अंग्रेज़ी पर एतराज़ करते हैं, अक्सर न उन्हें हिन्दी पर मुकम्मल उबूर होता है, न उर्दू की नफ़ासत और लताफ़त का इल्म, और अंग्रेज़ी की बात तो फ़िलहाल छोड़ ही दीजिए। ऐसे लोगों को किसी दूसरे की ज़बान पर फ़ैसला सुनाने से पहले अपने इल्मी मयार, अपने मुतालिआ और अपने अंदाज़-ए-गुफ़्तगू का बे-लाग जायज़ा लेना चाहिए। इल्म का दावा अल्फ़ाज़ से नहीं, बल्कि दानिश, तहज़ीब और दलील से साबित होता है।
अगर आपको किसी की अंग्रेज़ी से तकलीफ़ होती है, तो इसका इलाज यह नहीं कि उसे अंग्रेज़ी बोलने से रोक दिया जाए; इलाज यह है कि आप ख़ुद भी सीखें। किताब उठाइए, पढ़िए, मेहनत कीजिए। इल्म किसी की जागीर नहीं है। जो चाहे, जितनी मेहनत करे, उसे हासिल कर सकता है।
और अगर तालीम अधूरी रह गई है, तो इसका अफ़सोस करने के बजाय आज से शुरुआत कीजिए। मगर अपनी आने वाली नस्ल के साथ वह नाइंसाफ़ी मत कीजिए जो शायद आपके साथ हुई हो। अपने बच्चों को मज़दूरी पर भेजने के बजाय स्कूल भेजिए। उनके हाथों में औज़ारों से पहले किताबें दीजिए। क्योंकि मज़दूरी पेट भर सकती है, लेकिन तालीम मुक़द्दर बदल देती है।
याद रखिए, इल्म की पहचान कपड़ों से नहीं होती, गुफ़्तगू से होती है। पढ़ा-लिखा इंसान जब बात करता है, तो उसके अल्फ़ाज़ में शाइस्तगी, उसकी फ़िक्र में वुसअत और उसकी दलीलों में वज़न होता है। वह किसी की ज़बान का मज़ाक़ नहीं उड़ाता, बल्कि हर ज़बान का एहतराम करता है।
अगर किसी को यह गुमान है कि अंग्रेज़ी बोलना दिखावा है, तो उसे चाहिए कि कभी किसी यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर, किसी साइंस-दान , किसी IAS अफ़सर, किसी जज, किसी राजनयिक या किसी आलमी मंच पर काम करने वाले पेशेवर से बैठकर गुफ़्तगू करे। तब उसे मालूम होगा कि दुनिया रिश्ते, कारोबार, रिसर्च और हुकूमत किस तरह चलाती है। वहाँ किसी की क़द्र उसकी ज़बान से नहीं, बल्कि उसके इल्म, उसकी सलाहियत और उसके अख़्लाक़ से होती है।
अपनी ज़बान से मुहब्बत कीजिए। हिन्दी का एहतराम कीजिए। उर्दू की नफ़ासत को अपनाइए। अपनी स्थानीय बोली को भी ज़िंदा रखिए। मगर किसी दूसरी ज़बान से नफ़रत मत कीजिए। जो जितनी ज़्यादा ज़बानें जानता है, उसके लिए दुनिया उतनी ही बड़ी हो जाती है।
तारीख़ गवाह है कि जिन क़ौमों ने किताबों को अपना हथियार बनाया, उन्होंने दुनिया की क़ियादत की। और जिन क़ौमों ने इल्म का मज़ाक़ उड़ाया, वे दूसरों की मोहताज बनकर रह गईं।
इसलिए, अगर किसी की अंग्रेज़ी आपको चुभती है, तो उससे नफ़रत मत कीजिए; उससे बेहतर अंग्रेज़ी सीख लीजिए। अगर किसी की उर्दू आपसे अच्छी है, तो उससे बेहतर उर्दू सीखिए। अगर कोई हिन्दी आपसे बेहतर लिखता है, तो उससे प्रेरणा लीजिए। मुक़ाबला इल्म में कीजिए, जहालत में नहीं।
और अगर फिर भी कोई शख़्स सीखने के बजाय दूसरों का मज़ाक़ उड़ाने में ही अपनी सारी ताक़त ख़र्च करता है, तो वह दरअसल अपनी ही तरक़्क़ी के दरवाज़े बंद कर रहा है। ऐसे लोग दूसरों का रास्ता नहीं रोकते, बल्कि अपनी मंज़िल से ख़ुद दूर रह जाते हैं। दुनिया आगे बढ़ जाती है, मगर वे वहीं खड़े रह जाते हैं जहाँ कभी थे। और जिसका वो मज़ाक़ बना रहे है वो तो अलहम्दुलिल्लाह उनसे आगे बहुत पहले निकल चुका है और ये दुनिया की हसद है जो कभी ख़त्म नहीं होगी।
तो आइए, हम यह अहद करें कि हम अपनी आने वाली नस्ल को तंग-नज़री नहीं, इल्म की दौलत देंगे। हम उन्हें नफ़रत नहीं, तालीम देंगे। हम उन्हें यह सिखाएँगे कि हर ज़बान एक नई दुनिया का दरवाज़ा है, और जो जितनी ज़्यादा ज़बानें सीखता है, वह उतनी ही ज़्यादा दुनिया जीत लेता है।
याद रखिए, ज़बान कभी मसला नहीं होती। मसला जहालत, तंग-नज़री और इल्म से दूरी होती है। जिस दिन हम इस फ़र्क़ को समझ जाएँगे, उसी दिन हमारी सोच बदलेगी, हमारा समाज बदलेगा और हमारा मुस्तक़बिल भी।
तारिक़ अज़ीम तनहा
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