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क़िरदार का दिवालियापन और दिखावे की बादशाहत। तारिक़ अज़ीम तनहा

ज़िंदगी का सबसे बड़ा तज़ाद शायद यही है कि कभी-कभी जिस शख़्स के लिए आपके दिल में बेइन्तिहा मुहब्बत, इख़्लास और ख़ैर-ख़्वाही होती है, उसी के दिल में आपके लिए नफ़रत, हसद और कीना पल रहा होता है। इंसान अपने किरदार से कम और अपनी नीयत से ज़्यादा पहचाना जाता है। मगर अफ़्सोस, हर दौर में कुछ ऐसे अफ़राद मौजूद रहे हैं जो मुहब्बत का जवाब अदावत से और ख़ुलूस का जवाब मक्र-ओ-फ़रेब से देते हैं।

मैं अपने गाँव और समाज में ऐसे बहुत से चेहरे देखता हूँ। ये लोग ज़िंदगी भर किसी और की छाँव तलाश करते रहते हैं। ख़ुद अपनी मेहनत, अपनी सलाहियत और अपने वजूद पर इन्हें कभी यक़ीन नहीं होता। रोज़ी की तलाश में मुल्क से बाहर जाना कोई ऐब नहीं, मेहनत हर जगह मुक़द्दस है। लेकिन अफ़्सोस तब होता है जब वही लोग परदेस में बरसों तक दूसरों की मुलाज़मत करने के बाद अपने वतन लौटते हैं और ऐसा तास्सुर देते हैं मानो किसी सल्तनत के बादशाह हों। तकब्बुर का लिबास पहन लेना, हक़ीक़त को बदल नहीं देता। इज़्ज़त बैंक बैलेंस से नहीं, किरदार से पैदा होती है।

दुनिया में रोज़ी कमाने के हज़ार रास्ते हैं। अपने मुल्क में भी इज़्ज़त के साथ कारोबार किया जा सकता है, हुनर के ज़रिये मुक़ाम हासिल किया जा सकता है। मगर जिन लोगों ने अपनी पूरी ज़िंदगी दूसरों के सहारे गुज़ारी हो, उन्हें ख़ुदमुख़्तारी की क़ीमत कहाँ मालूम होती है?

इन अफ़राद का एक और अजीब मिज़ाज होता है। बरसों तक किसी सियासी शख़्सियत के पीछे-पीछे फिरेंगे। उसकी हर बात पर "जी हुज़ूरी" करेंगे, हर महफ़िल में उसकी तस्बीह पढ़ेंगे। लेकिन अगर किसी दिन वही रहनुमा किसी दूसरे मेहमान के साथ तस्वीर खिंचवा ले और इनका नाम भूल जाए, तो यही लोग सबसे पहले उसी के ख़िलाफ़ ज़हर उगलना शुरू कर देते हैं। जिन लबों पर कल तक मद्ह थी, आज वहीं मलामत होती है। यह वफ़ादारी नहीं, मुफ़ाद-परस्ती है।

ताज्जुब तब और बढ़ जाता है जब ऐसे लोग अपने आपको "आवाम की आवाज़" कहने लगते हैं, जबकि हक़ीक़त यह होती है कि उन्हें ख़ुद उनके घर वाले संजीदगी से नहीं लेते। जिनके अपने घरों में मआशी हालात इतने कमज़ोर हों कि किसी बीमारी की सूरत में घर का चूल्हा जलाने के लिए दूसरों की मदद दरकार हो, जिनकी ज़िंदगी हमेशा दूसरों के सहारे गुज़री हो, वह दूसरों को क़ियादत और ख़ुद्दारी का सबक़ देने लगें, तो यह मंज़र फ़िक्र से ज़्यादा अफ़्सोस पैदा करता है।

बाज़ औक़ात ऐसे लोग ग़ैर-क़ानूनी कामों में भी मुलव्वस पाए जाते हैं। क़ानून की गिरफ़्त तक पहुँच चुके होते हैं, मगर समाज में अपने लिए मस्नूई हैसियत बनाने की कोशिश करते रहते हैं। उनका मक़सद इस्लाह नहीं, शोहरत होती है; ख़िदमत नहीं, मुफ़ाद होता है।

ऐसे अफ़राद की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उनका अपना कोई मयार नहीं होता। न अपना कारोबार, न कोई इल्मी पहचान, न समाजी ख़िदमत का कोई क़ाबिल-ए-ज़िक्र कारनामा। उनका वजूद हमेशा किसी न किसी ताक़तवर शख़्स के साये में पलता है। जब तक फ़ायदा मिलता है, क़सीदे पढ़ते हैं; फ़ायदा रुकते ही गालियों पर उतर आते हैं। जिन लोगों की वफ़ादारी का मेयार एक तस्वीर, एक मुलाक़ात या चंद रुपयों से बदल जाए, उनकी सियासत भी बिकाऊ होती है और उनका ज़मीर भी।

सबसे ज़्यादा तशवीशनाक पहलू यह है कि जो इंसान अपने ही घर में रहमत और मोहब्बत का माहौल पैदा न कर सके, जो अपनी माँ, बहन, बीवी या अहल-ए-ख़ाना के साथ हुस्न-ए-सुलूक न कर सके, वह समाज में इंसाफ़ और इज़्ज़त की बातें करे तो यह सिर्फ़ एक तमाशा बनकर रह जाता है। इंसान की अस्ल पहचान उसके घर के दरवाज़े के अंदर से शुरू होती है, बाहर की तक़रीरों से नहीं।

एक और बात इन अफ़राद में मुसलसल देखी जाती है कि तालीम और इल्म से इनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। किताबें, मुताला, तफ़क्कुर और दलील इनके मिज़ाज का हिस्सा नहीं होते। यही वजह है कि जब भी कोई पढ़ा-लिखा, बाशऊर और अपनी सलाहियत के बल पर मुक़ाम हासिल करने वाला शख़्स सामने आता है, तो इनके अंदर का एहसास-ए-कमतरी जाग उठता है। ये इल्म का मुक़ाबला इल्म से नहीं कर सकते, इसलिए तंज़, अफ़वाह, तौहीन और बेबुनियाद इल्ज़ामात का सहारा लेते हैं। इनके लिए हर पढ़ा-लिखा इंसान एक ख़तरा होता है, क्योंकि तालीम इंसान को सवाल करना सिखाती है, जबकि ये सवाल नहीं, अंधी पैरवी के आदी होते हैं। जिस समाज में दलील की जगह शोर और इल्म की जगह जाहिलाना घमंड ले ले, वहाँ ऐसे किरदार पैदा होना कोई ताज्जुब की बात नहीं।

मैंने यह भी महसूस किया है कि पढ़े-लिखे लोग आम तौर पर ऐसे किरदारों से मुतास्सिर नहीं होते। इसलिए नहीं कि वह ख़ुद को दूसरों से बेहतर समझते हैं, बल्कि इसलिए कि तालीम इंसान को चेहरों के पीछे छुपे किरदार पढ़ना सिखा देती है। इल्म आदमी को यह फ़र्क़ समझा देता है कि शोर मचाने वाला हर शख़्स रहनुमा नहीं होता और हर भीड़ इज़्ज़त की दलील नहीं होती।

आख़िर में सिर्फ़ इतना कहना है कि दुनिया में मुहब्बत करना कभी बंद मत कीजिए। अगर कुछ लोग आपकी मुहब्बत का जवाब नफ़रत से देते हैं, तो यह आपकी कमी नहीं, उनके ज़मीर की तंगी है। किरदार की बुलंदी यह नहीं कि लोग आपकी तारीफ़ करें; किरदार की बुलंदी यह है कि आप दूसरों की नफ़रत के बावजूद अपने अख़्लाक़, अपनी शराफ़त और अपनी इंसानियत को ज़िंदा रखें।

वक़्त हर नक़ाब उतार देता है। जो लोग झूठी शान, मुफ़ाद-परस्ती और रियाकारी के सहारे जीते हैं, उन्हें तारीख़ कभी याद नहीं रखती। मगर जो लोग ख़ुलूस, इल्म और ख़ुद्दारी के साथ जीते हैं, उनकी ख़ामोश ज़िंदगी भी आने वाली नस्लों के लिए एक सबक़ बन जाती है।

तारिक़ अज़ीम तनहा


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