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“समुंद्री केबल्स का ख़तरा: क्या ईरान आलमी इंटरनेट निज़ाम (Global Internet System) को मुअत्तल (Disrupt) कर सकता है?”

आज की दुनिया में जंग (War) सिर्फ़ मिसाइल (Missiles) और टैंक (Tanks) तक महदूद नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसे मुकाम (Stage) पर पहुँच चुकी है जहाँ असल जंग नजरों से ओझल (Invisible) ढांचों पर लड़ी जाती है। और उन्हीं में से एक है समुंदर के नीचे बिछा हुआ इंटरनेट का निज़ाम (Internet Infrastructure – डिजिटल ढांचा)। अक्सर लोग यह समझते हैं कि इंटरनेट सैटेलाइट (Satellite) के जरिए चलता है, लेकिन हक़ीक़त इससे बिल्कुल मुख्तलिफ़ (Different) है। दुनिया का तकरीबन 95% से ज़्यादा डेटाबैंकिंग ट्रांजैक्शन (Bank Transactions), क्लाउड सर्विस (Cloud Services), ईमेल (Email) सब कुछ समुंदर के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल्स (Fiber Optic Cables – इंटरनेट के तार) के जरिए गुजरता है। यही वह बुनियादी ढांचा (Backbone) है, जिस पर पूरी डिजिटल दुनिया खड़ी है। हालिया दावों में यह कहा जा रहा है कि Iran इन केबल्स को निशाना बना सकता है। लेकिन यहाँ सबसे अहम बात यह है अब तक ऐसी किसी सीधी, आधिकारिक धमकी या कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है। यह सच है कि पर्शियन गल्फ (Persian Gulf – खाड़ी इलाक़ा) एक बेहद अहम डेटा रूट (Data Route) है, जहाँ स...

सियासत का खेल या इंसानियत का फ़रेब: जंग, नफ़ा और खामोश ज़मीर की दास्तान

अगर तुकबंदी में कहा जाए तो मंजर कुछ यूँ है चिराग़ नहीं, यहाँ सियासत का धुआँ है, हर फैसला इंसानियत नहीं, मुफ़ाद का कुआँ है। दुनिया की सियासत (Politics) में अक्सर एक ख़याल परोसा जाता है कि कुछ ममालिक (Countries) ऐसे हैं जो चाहें तो जंग रोक सकते हैं, बस इशारा करें और बारूद की बू ख़त्म हो जाए। मगर जब हक़ीक़त की ज़मीन पर कदम रखा जाता है, तो यह ख्वाब एक तिलिस्म (Illusion) से ज़्यादा कुछ नहीं लगता। यह कहना आसान है कि फलाँ मुल्क जंग रुकवा सकता है, मगर सवाल यह है कि क्या उसके पास वाक़ई वह इख़्तियार (Authority) है, या सिर्फ़ एक सियासी तसव्वुर (Perception) है जो लोगों के ज़हन में बिठा दिया गया है? जब एक मुल्क अपनी मआशियाती (Economic) ज़रूरतों में भी मुकम्मल ख़ुदमुख़्तारी (Autonomy) हासिल नहीं कर पाता, तो वह आलमी जंग के फैसलों पर किस हद तक असरअंदाज़ हो सकता है यह सवाल अपने आप में बहुत कुछ बयान कर देता है। असल में मसला ताक़त का कम और तरजीहात (Priorities) का ज़्यादा है। जब तक आग दूर जलती है, वह सिर्फ़ एक मंजर होती है लोग उसे देखते हैं, उस पर बहस करते हैं, और कभी-कभी तो उस पर जश्न भी मनाते हैं। मगर ज...

हक़ीक़त बनाम हेडलाइन: क्या वाक़ई ईरान हिल गया या सिर्फ़ एक सियासी बयानिया?

सुबह की पहली रोशनी के साथ जब आँख खुली तो फ़िज़ा में वही शोर गूंज रहा था—हमले, कमांडरों की मौत, और यह दावा कि ईरान की कमर टूट गई। एक लम्हे के लिए लगा कि जैसे पूरी कहानी यहीं खत्म हो गई हो, लेकिन जब ज़रा तअम्मुल (गौर) से देखा, तो एहसास हुआ कि यह हक़ीक़त से ज़्यादा एक बयानिया (narrative) है, जो हेडलाइनों की गर्मी में ढल रहा है। बेशक हमला हुआ, और ऐसा हुआ जो अपनी बारीकी (precision) और असरअंदाज़ी में कम नहीं था। बड़े ओहदेदार मारे गए, और किसी भी निज़ाम के लिए यह एक सदमा होता है कि उसके अहम चेहरे अचानक गायब हो जाएँ। लेकिन सवाल यह है कि क्या चेहरों के चले जाने से पूरा जिस्म भी गिर जाता है? क्या एक सर के कटने से बदन सांस लेना छोड़ देता है? हक़ीक़त यह है कि हर मजबूत निज़ाम अपने आपको सिर्फ अफ़राद (individuals) पर नहीं, बल्कि एक मुकम्मल ढांचे (structure) पर खड़ा करता है। इसी लिए Islamic Revolutionary Guard Corps जैसा इदारा अपनी तश्कील में इस कदर मुस्तहकम है कि अगर एक कड़ी टूटे, तो दूसरी फौरन उसकी जगह ले लेती है। यहाँ फैसले सिर्फ शख्सियतों से नहीं, बल्कि पहले से तयशुदा उसूलों, ज़ंजीर-ए-क...

हॉर्मुज़ का “फ़िल्टर”: 400 जहाज़, महदूद रास्ते और मआशियाती तूफ़ान की दस्तक

दुनिया की नज़रें इस वक़्त सिर्फ़ मिसाइलों और हमलों की सुर्ख़ियों पर टिकी हैं, मगर समंदर के सीने में एक और कहानी पल रही है ख़ामोश, मगर कहीं ज़्यादा ख़तरनाक। मामला शुरू होता है हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) से वो अहम गुज़रगाह (Sea Route) जिससे दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल और तिजारत (Trade) हासिल करता है। जब यह रास्ता महदूद (Restricted) हुआ, तो जहाज़ों की रफ़्तार थम गई। पहले कुछ, फिर दर्जनों, और अब सैकड़ों जहाज़ खाड़ी में ठहर गए। यह ठहराव सिर्फ़ माल का नहीं था यह इंसानी ज़िंदगियों का ठहराव भी बन गया। इन जहाज़ों के अंदर मौजूद क्रू (Crew – जहाज़ी अमला) अब राशन बाँटकर खा रहा है। पानी महदूद है, ईंधन (Fuel) कम होता जा रहा है, और 45 डिग्री की शदीद गर्मी में ये जहाज़ समंदर में जैसे कैद हो गए हैं। मगर असली ख़तरा यहीं खत्म नहीं होता। हालिया दिनों में कई जहाज़ों पर हमले हुए हैं। कहीं आग लगी, कहीं तेल का रिसाव (Oil Spill) हुआ, और कहीं जहाज़ सीधे निशाना बने। यह कोई स्थिर सूरत-ए-हाल (Stable Situation) नहीं—यह एक वक़्ती बम (Ticking Time Bomb) है जो किसी भी लम्हे फट सकता है। अब तस्वीर का ...

मशरिक़-ए-वुसता की सुलगती जंग: ताक़त, सियासत और इंसानियत का इम्तिहान

इज़राइल ने जंग में हुए नुक़सान की मीडिया कवरेज पर सख़्त पाबंदी आइद कर दी है। कहा जा रहा है कि तेल अवीव, यरूशलेम और पूरे इज़राइल में ईरानी मिसाइलों से होने वाली तबाही की वीडियोग्राफ़ी और तस्वीरें लेने पर सख़्त रोक लगा दी गई है। यहाँ तक कि इन वीडियोज़ और तस्वीरों को इज़राइल से बाहर भेजने पर भी सख़्त क़िस्म की मनाही कर दी गई है। हुकूमत का कहना है कि इससे मुल्क की सिक्योरिटी और फ़ौजी मुक़ामात से जुड़ी मालूमात दुश्मनों तक पहुँच सकती है, इसलिए ऐसी रिपोर्टिंग पर पाबंदी ज़रूरी समझी गई। दूसरी तरफ़ अमरीका और इज़राइल लगातार यह दावा कर रहे हैं कि उनके हमलों से ईरान को बहुत बड़ा नुक़सान पहुँचा है। मगर अगर वाक़ई ईरान इतनी बुरी तरह तबाह हो चुका है तो फिर वह हथियार क्यों नहीं डाल रहा? जो अमरीका जंग के आग़ाज़ में यह कह रहा था कि सिर्फ़ 48 घंटों में ईरान में हुकूमत तब्दील हो सकती है, अब उस जंग को बारह दिन से ज़्यादा गुज़र चुके हैं और हालात अब भी नाज़ुक बने हुए हैं। ईरानी क़ियादत किसी क़िस्म के मुआहिदे या समझौते के लिए तैयार नज़र नहीं आती। कई तजज़ियाकार यह सवाल भी उठा रहे हैं कि कहीं इज़राइल के साथ खड़...