Skip to main content

Posts

Showing posts with the label #Geopolitics

“समुंद्री केबल्स का ख़तरा: क्या ईरान आलमी इंटरनेट निज़ाम (Global Internet System) को मुअत्तल (Disrupt) कर सकता है?”

आज की दुनिया में जंग (War) सिर्फ़ मिसाइल (Missiles) और टैंक (Tanks) तक महदूद नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसे मुकाम (Stage) पर पहुँच चुकी है जहाँ असल जंग नजरों से ओझल (Invisible) ढांचों पर लड़ी जाती है। और उन्हीं में से एक है समुंदर के नीचे बिछा हुआ इंटरनेट का निज़ाम (Internet Infrastructure – डिजिटल ढांचा)। अक्सर लोग यह समझते हैं कि इंटरनेट सैटेलाइट (Satellite) के जरिए चलता है, लेकिन हक़ीक़त इससे बिल्कुल मुख्तलिफ़ (Different) है। दुनिया का तकरीबन 95% से ज़्यादा डेटाबैंकिंग ट्रांजैक्शन (Bank Transactions), क्लाउड सर्विस (Cloud Services), ईमेल (Email) सब कुछ समुंदर के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल्स (Fiber Optic Cables – इंटरनेट के तार) के जरिए गुजरता है। यही वह बुनियादी ढांचा (Backbone) है, जिस पर पूरी डिजिटल दुनिया खड़ी है। हालिया दावों में यह कहा जा रहा है कि Iran इन केबल्स को निशाना बना सकता है। लेकिन यहाँ सबसे अहम बात यह है अब तक ऐसी किसी सीधी, आधिकारिक धमकी या कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है। यह सच है कि पर्शियन गल्फ (Persian Gulf – खाड़ी इलाक़ा) एक बेहद अहम डेटा रूट (Data Route) है, जहाँ स...

ईरान के लिए आर्थिक इआनत की खबर: हक़, इंसाफ़ और आलमी यकजहती के नजरिये से एक गहरा तजज़िया।

आज के इस अशोबज़दा (Turbulent – अशांत) दौर में, जब आलमी सियासत (Global Politics) हर रोज़ एक नया मोड़ ले रही है, एक खबर ने कई ज़ेहनों (Minds) में हलचल पैदा कर दी क्या वाक़ई Embassy of Iran, New Delhi ने एक क्यूआर कोड (QR Code – डिजिटल भुगतान माध्यम) जारी किया है ताकि ईरान की अवाम (Public) की मआशी (Economic) इआनत (Help) की जा सके? सबसे पहले ज़रूरी है कि इस तरह की खबरों को तस्दीक़ (Verification – पुष्टि) के तराज़ू (Scale) पर तौला जाए। किसी भी मुल्क का सफ़ारतख़ाना (Embassy) आम तौर पर सीधे अवाम से फंड (Funds) इकट्ठा करने के लिए खुले तौर पर क्यूआर कोड जारी नहीं करता खासकर ऐसे नाज़ुक दौर में। अगर ऐसा कोई क़दम उठाया जाता, तो वह बड़े पैमाने पर आधिकारिक एलान (Official Announcement) और भरोसेमंद ज़राए (Sources) के ज़रिये सामने आता। ईरान, जिसे Iran के नाम से जाना जाता है, कुदरती वसाइल (Natural Resources) से मालामाल है नफ़्त (Oil – तेल), गैस (Gas) और दूसरी दौलतें (Resources) उसकी मआशियात (Economy) की बुनियाद हैं। लेकिन जंग (War) और पाबंदियों (Sanctions) के दौर में, कोई भी मुल्क अस्थायी दबाव (Temporar...

सिनो हक़ीक़त बनाम हिंदुस्तानी तखय्युल: तामीर (Development) की दौड़ में हम कहाँ खड़े हैं?

चाइना हमसे कितना आगे है, 50 साल, सौ साल या 500 सौ साल? जो लोग टीवी को ज्ञान और खबरों का श्रोत मान लिए वे न सिर्फ अपना बल्कि अनजाने में इस देश और आने वाली पीढ़ी का भविष्य खराब कर रहे हैं। सच तो यह है कि हमारी सरकार कुछ कर ही नहीं रही है सिवाय टीवी शोज और प्रोपेगंडा के। इस टीवी शो और प्रोपेगंडा के सबसे बड़े ग्राहक अंधभक्त है, ऐसे अंधभक जो आज भी इस भ्रम में जी रहे हैं कि केवल टीवी पर बकलोली करने से, नारा गढ़ने, प्रोपेगंडा और नैरेटिव बनाने से देश आगे बढ़ सकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि आज के समय में वही देश आगे बढ़ रहा है, जो धर्म जाती और नफरत की राजनीति से बाहर निकल कर, अंधविश्वास और पाखंड से बाहर निकल कर विज्ञान, टेक्नोलॉजी, रिसोर्स डेवलपमेंट, स्किल्ड डेवलपमेंट, वर्कफोर्स और मजबूत शिक्षा व्यवस्था पर काम कर रहा है। चीन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज अगर आप बाजार में जाएं, किसी भी इलेक्ट्रॉनिक सामान चाहे वह मोबाइल हो, कंप्यूटर हो या उनके चिप हो, उसको देखें, तो उसमें ज्यादा से ज्यादा चीन के सामान मिलेंगे। चीन ने क्या कुछ नहीं किया है, इंसान की जरूरतों के लिए हर एक सामान का एडवांस लेवल पर रिसर्...

हक़ीक़त का इन्किशाफ़: क्या ईरान का न्यूक्लियर ख़तरा महज़ एक बहाना था?

दुनिया की सियासत में कभी-कभी एक बयान ऐसा आता है जो पूरे बयानिये (Narrative) को हिला देता है। हालिया दिनों में कुछ ऐसा ही मंजर तब देखने को मिला जब Tulsi Gabbard की गवाही ने वॉशिंगटन के गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया। यह महज़ एक इत्तिला (Information) नहीं थी, बल्कि उस तर्क की जड़ को छूती हुई बात थी, जिस पर पूरी जंग का जواز (Justification) खड़ा किया गया था। गवाही के मुताबिक़, 2025 में हुए हमलों के बाद ईरान ने अपने न्यूक्लियर एनरिचमेंट (Nuclear Enrichment – परमाणु संवर्धन) प्रोग्राम को दोबारा शुरू करने की कोई कोशिश नहीं की। यहाँ तक कहा गया कि “ऑपरेशन मिडनाइट हैमर” (Operation Midnight Hammer) के बाद यह प्रोग्राम इस कदर तबाह हो चुका था कि उसकी बहाली की कोई ठोस निशानी सामने नहीं आई। अब सवाल यह उठता है कि अगर ख़तरा मौजूद ही नहीं था, तो फिर उस ख़तरे के नाम पर जंग क्यों छेड़ी गई? Donald Trump और उनके इदारे (Administration) लगातार यह कहते रहे कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा (Nuclear Ambition) एक बड़ा ख़तरा है, और इसे रोकने के लिए फौजी कार्रवाई ज़रूरी थी। मगर जब इंटेलिजेंस (Intelligence – ...

सियासत का खेल या इंसानियत का फ़रेब: जंग, नफ़ा और खामोश ज़मीर की दास्तान

अगर तुकबंदी में कहा जाए तो मंजर कुछ यूँ है चिराग़ नहीं, यहाँ सियासत का धुआँ है, हर फैसला इंसानियत नहीं, मुफ़ाद का कुआँ है। दुनिया की सियासत (Politics) में अक्सर एक ख़याल परोसा जाता है कि कुछ ममालिक (Countries) ऐसे हैं जो चाहें तो जंग रोक सकते हैं, बस इशारा करें और बारूद की बू ख़त्म हो जाए। मगर जब हक़ीक़त की ज़मीन पर कदम रखा जाता है, तो यह ख्वाब एक तिलिस्म (Illusion) से ज़्यादा कुछ नहीं लगता। यह कहना आसान है कि फलाँ मुल्क जंग रुकवा सकता है, मगर सवाल यह है कि क्या उसके पास वाक़ई वह इख़्तियार (Authority) है, या सिर्फ़ एक सियासी तसव्वुर (Perception) है जो लोगों के ज़हन में बिठा दिया गया है? जब एक मुल्क अपनी मआशियाती (Economic) ज़रूरतों में भी मुकम्मल ख़ुदमुख़्तारी (Autonomy) हासिल नहीं कर पाता, तो वह आलमी जंग के फैसलों पर किस हद तक असरअंदाज़ हो सकता है यह सवाल अपने आप में बहुत कुछ बयान कर देता है। असल में मसला ताक़त का कम और तरजीहात (Priorities) का ज़्यादा है। जब तक आग दूर जलती है, वह सिर्फ़ एक मंजर होती है लोग उसे देखते हैं, उस पर बहस करते हैं, और कभी-कभी तो उस पर जश्न भी मनाते हैं। मगर ज...

जंग की नई सूरत: लंबी जंग, सख़्त निज़ाम और बढ़ती आग का बयानिया

कुर्सी की पेटी बाँध लीजिए, क्योंकि जो मंजर अब उभर रहा है, वह किसी जल्द ख़त्म होने वाली जंग का नहीं, बल्कि एक तवील (Long) और पेचीदा मरहले (Phase) की इब्तिदा (Beginning) है। फ़िज़ा में जो तनाव है, वह ठहरने के बजाय हर गुज़रते लम्हे के साथ और शदीद होता जा रहा है, और हालात यह इशारा दे रहे हैं कि अब यह टकराव एक मुकम्मल जंग (Full-scale Conflict) की शक्ल इख़्तियार कर सकता है। ईरान ने अपने अम्नी निज़ाम (Security Structure) के अहम चेहरों की हलाकत (Elimination) को तस्लीम (Accept) कर लिया है, और इसके साथ ही यह पैग़ाम भी दे दिया है कि जवाब ज़रूर आएगा—और वह पहले से कहीं ज़्यादा सख़्त और असरअंदाज़ होगा। मगर इस पूरे वाक़िये का असल पहलू यह है कि इन नुक़्सानात (Losses) के बावजूद ईरान की फौजी मशीनरी (Military Machine) में कोई इन्किसार (Collapse) नज़र नहीं आता। इसकी वजह साफ़ है यह निज़ाम अफ़राद (Individuals) पर नहीं, बल्कि एक मुकम्मल ढांचे (System) पर क़ायम है, जिसकी मिसाल Islamic Revolutionary Guard Corps जैसे इदारों से मिलती है, जहाँ हर ओहदे के लिए मुनासिब जानशीन (Successor) पहले से तय होता है। यानी यहा...

हक़ीक़त बनाम हेडलाइन: क्या वाक़ई ईरान हिल गया या सिर्फ़ एक सियासी बयानिया?

सुबह की पहली रोशनी के साथ जब आँख खुली तो फ़िज़ा में वही शोर गूंज रहा था—हमले, कमांडरों की मौत, और यह दावा कि ईरान की कमर टूट गई। एक लम्हे के लिए लगा कि जैसे पूरी कहानी यहीं खत्म हो गई हो, लेकिन जब ज़रा तअम्मुल (गौर) से देखा, तो एहसास हुआ कि यह हक़ीक़त से ज़्यादा एक बयानिया (narrative) है, जो हेडलाइनों की गर्मी में ढल रहा है। बेशक हमला हुआ, और ऐसा हुआ जो अपनी बारीकी (precision) और असरअंदाज़ी में कम नहीं था। बड़े ओहदेदार मारे गए, और किसी भी निज़ाम के लिए यह एक सदमा होता है कि उसके अहम चेहरे अचानक गायब हो जाएँ। लेकिन सवाल यह है कि क्या चेहरों के चले जाने से पूरा जिस्म भी गिर जाता है? क्या एक सर के कटने से बदन सांस लेना छोड़ देता है? हक़ीक़त यह है कि हर मजबूत निज़ाम अपने आपको सिर्फ अफ़राद (individuals) पर नहीं, बल्कि एक मुकम्मल ढांचे (structure) पर खड़ा करता है। इसी लिए Islamic Revolutionary Guard Corps जैसा इदारा अपनी तश्कील में इस कदर मुस्तहकम है कि अगर एक कड़ी टूटे, तो दूसरी फौरन उसकी जगह ले लेती है। यहाँ फैसले सिर्फ शख्सियतों से नहीं, बल्कि पहले से तयशुदा उसूलों, ज़ंजीर-ए-क...

समुंदरी जंग का नया उस्लूब: जब अज़ीम जंगी जहाज़ भी “फ़ासिला” इख़्तियार करें

मशरिक़-ए-वुस्ता (Middle East) की फ़िज़ा में इस वक़्त जो हलचल है, वह सिर्फ़ मिसाइलों और ड्रोन तक महदूद नहीं रही, बल्कि समुंदरी जंग (Naval Warfare) की पूरी ताबीर (Definition) को बदलती हुई नज़र आ रही है। हालिया दिनों में एक ऐसा मंजर सामने आया है जिसने दुनिया की सबसे ताक़तवर बहरी क़ुव्वत (Naval Power) को भी अपने क़दम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया। अमेरिका के दो अहम जंगी जहाज़ USS Abraham Lincoln (CVN-72) और USS Gerald R. Ford (CVN-78)—अब दुश्मन के तट के क़रीब रहने के बजाय गहरे समुंदर में “स्टैंड-ऑफ” पोज़िशन (Stand-off Zone – सुरक्षित दूरी) इख़्तियार कर चुके हैं। यह महज़ एक मामूली तैनाती का बदलाव नहीं, बल्कि एक गहरी सामरिक तब्दीली (Strategic Shift) की निशानी है। कुछ अरसा पहले तक यही जहाज़ दुश्मन के तट से महज़ कुछ सौ किलोमीटर की दूरी पर मौजूद थे। मगर अब यह फ़ासिला बढ़कर हज़ार किलोमीटर से भी ज़्यादा हो चुका है। सवाल यह है कि दुनिया की सबसे महंगी और ताक़तवर जंगी मशीनें अचानक दूरी क्यों बनाने लगीं? जवाब छुपा है जंग के बदलते मिज़ाज (Nature of Warfare) में। आज की जंग सिर्फ़ बड़े जहाज़ो...

हॉर्मुज़ का “फ़िल्टर”: 400 जहाज़, महदूद रास्ते और मआशियाती तूफ़ान की दस्तक

दुनिया की नज़रें इस वक़्त सिर्फ़ मिसाइलों और हमलों की सुर्ख़ियों पर टिकी हैं, मगर समंदर के सीने में एक और कहानी पल रही है ख़ामोश, मगर कहीं ज़्यादा ख़तरनाक। मामला शुरू होता है हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) से वो अहम गुज़रगाह (Sea Route) जिससे दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल और तिजारत (Trade) हासिल करता है। जब यह रास्ता महदूद (Restricted) हुआ, तो जहाज़ों की रफ़्तार थम गई। पहले कुछ, फिर दर्जनों, और अब सैकड़ों जहाज़ खाड़ी में ठहर गए। यह ठहराव सिर्फ़ माल का नहीं था यह इंसानी ज़िंदगियों का ठहराव भी बन गया। इन जहाज़ों के अंदर मौजूद क्रू (Crew – जहाज़ी अमला) अब राशन बाँटकर खा रहा है। पानी महदूद है, ईंधन (Fuel) कम होता जा रहा है, और 45 डिग्री की शदीद गर्मी में ये जहाज़ समंदर में जैसे कैद हो गए हैं। मगर असली ख़तरा यहीं खत्म नहीं होता। हालिया दिनों में कई जहाज़ों पर हमले हुए हैं। कहीं आग लगी, कहीं तेल का रिसाव (Oil Spill) हुआ, और कहीं जहाज़ सीधे निशाना बने। यह कोई स्थिर सूरत-ए-हाल (Stable Situation) नहीं—यह एक वक़्ती बम (Ticking Time Bomb) है जो किसी भी लम्हे फट सकता है। अब तस्वीर का ...

ईरान की हिकमत-ए-अमली: क़ीमत-ए-नफ़्त (Crude Oil Prices) $200 प्रति बैरल तक — जंग-ए-मुआशियाती (Economic Warfare) का असली मक़सद

मशरिक़-ए-औसत की सियासत और जंगों की तारीख़ बार-बार इस हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करती रही है कि हर मुक़ाबला सिर्फ़ मैदान-ए-जंग में तय नहीं होता। कई बार असल फ़ैसला तोप, मिसाइल और जहाज़ों से नहीं बल्कि मुआशियात (Economy) के ज़रिये होता है। आज ईरान ने बिल्कुल वही रास्ता इख़्तियार किया है जो ज़ाहिर में कमज़ोर मालूम होता है मगर दरअस्ल एक गहरी हिकमत-ए-अमली पर मबनी है। चंद रोज़ पहले तक अक्सर लोग ये समझ रहे थे कि इसराइल ने ईरान की दिफ़ा-ए-फ़िज़ा (Air Defense) का बड़ा हिस्सा तबाह कर दिया है और अब क़िस्सा ख़त्म हो चुका है। तजज़िया करने वाले अफ़राद और आम लोग दोनों इस गुमान में थे कि जंग का नतीजा लगभग वाज़ेह है। मगर यह तसव्वुर शायद जंग की असल फ़ितरत को समझने में एक बड़ी ग़लती थी। ईरान का मक़सद इस मुक़ाबले को रिवायती मायनों में जीतना नहीं है। तेहरान की क़ियादत इस जंग को इतना महँगा बनाना चाहती है कि फ़तह (Victory) ख़ुद बे-मानी हो जाए। यह दो बिल्कुल मुख़्तलिफ़ खेल हैं और बहुत से लोग अब भी इस फ़र्क़ को समझ नहीं पा रहे। ईरान अब सिर्फ़ अस्करी मुक़ाबला नहीं कर रहा। दरअस्ल यह जंग-ए-मुआशियाती (Economic Warfare) ...

मशरिक़-ए-वुसता की सुलगती जंग: ताक़त, सियासत और इंसानियत का इम्तिहान

इज़राइल ने जंग में हुए नुक़सान की मीडिया कवरेज पर सख़्त पाबंदी आइद कर दी है। कहा जा रहा है कि तेल अवीव, यरूशलेम और पूरे इज़राइल में ईरानी मिसाइलों से होने वाली तबाही की वीडियोग्राफ़ी और तस्वीरें लेने पर सख़्त रोक लगा दी गई है। यहाँ तक कि इन वीडियोज़ और तस्वीरों को इज़राइल से बाहर भेजने पर भी सख़्त क़िस्म की मनाही कर दी गई है। हुकूमत का कहना है कि इससे मुल्क की सिक्योरिटी और फ़ौजी मुक़ामात से जुड़ी मालूमात दुश्मनों तक पहुँच सकती है, इसलिए ऐसी रिपोर्टिंग पर पाबंदी ज़रूरी समझी गई। दूसरी तरफ़ अमरीका और इज़राइल लगातार यह दावा कर रहे हैं कि उनके हमलों से ईरान को बहुत बड़ा नुक़सान पहुँचा है। मगर अगर वाक़ई ईरान इतनी बुरी तरह तबाह हो चुका है तो फिर वह हथियार क्यों नहीं डाल रहा? जो अमरीका जंग के आग़ाज़ में यह कह रहा था कि सिर्फ़ 48 घंटों में ईरान में हुकूमत तब्दील हो सकती है, अब उस जंग को बारह दिन से ज़्यादा गुज़र चुके हैं और हालात अब भी नाज़ुक बने हुए हैं। ईरानी क़ियादत किसी क़िस्म के मुआहिदे या समझौते के लिए तैयार नज़र नहीं आती। कई तजज़ियाकार यह सवाल भी उठा रहे हैं कि कहीं इज़राइल के साथ खड़...

अमेरिका युद्ध कैसे बेचता है? वियतनाम से इराक़ तक और ईरान में क्यों फँस सकता है

अमेरिका ने वियतनाम युद्ध, खाड़ी युद्ध और इराक़ युद्ध के दौरान अपनी जनता को युद्ध कैसे “बेचा”? इतिहास, मीडिया और ईरान संघर्ष का विश्लेषण। अमेरिका अपनी जनता को युद्ध कैसे बेचता है? आधुनिक राजनीति में युद्ध केवल रणभूमि में नहीं लड़ा जाता, बल्कि मीडिया, संस्कृति और जनमत के स्तर पर भी लड़ा जाता है। अमेरिका इसका शायद सबसे बड़ा उदाहरण है। अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही विश्व राजनीति में अपनी ताक़त स्थापित करनी शुरू कर दी थी। पर्ल हार्बर के अलावा अमेरिकी मुख्यभूमि को बहुत कम नुकसान हुआ, जबकि यूरोप पूरी तरह तबाह हो चुका था। इसी आर्थिक और सैन्य बढ़त के कारण अमेरिका जल्दी ही एक वैश्विक शक्ति बन गया। इसके बाद परमाणु हथियारों का निर्माण और सोवियत संघ के साथ कोल्ड वॉर शुरू हुआ। वियतनाम युद्ध और अमेरिकी समाज का विद्रोह सब कुछ तब बदल गया जब अमेरिका वियतनाम युद्ध में फँस गया। यह वह युद्ध था जिसमें: बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक मारे गए युद्ध लंबा और महँगा साबित हुआ अंततः अमेरिका को पीछे हटना पड़ा 1960 और 1970 के दशक में अमेरिका में एंटी-वॉर मूवमेंट तेज़ हो गया। संगीतकारों और कलाकारों ने भी...

सफ़ारतख़ाना-ए-अमरीका का मुहासिरा: इंक़िलाब-ए-ईरान, क़िस्सा-ए-रहनुमाई और ‘October Surprise’ का धुंधलका

ईरान जंग की सूरत-ए-हाल में है, तो तारीख़ की कई पुरानी दास्तानें फिर सतह पर उभरने लगी हैं। सोचा कि आज शाम मैं भी एक वाक़िआ बयान करूं। सन 1979 में ईरान में इंक़िलाब-ए-इस्लामी बरपा हुआ। Ayatollah Ruhollah Khomeini की क़ियादत में Mohammad Reza Pahlavi की हुकूमत का ख़ात्मा हुआ। शाह अपने अहल-ए-ख़ाना के साथ यह कहकर मुल्क छोड़ गए कि वह महज़ “तफ़रीह” पर जा रहे हैं। पहले Egypt, फिर Morocco, Bahamas और Mexico गए। बाद में मालूम हुआ कि उन्हें सरतान (कैंसर) है, और इलाज के लिए वह New York City पहुंच गए। यही बात ईरान में शदीद ग़ज़ब का सबब बनी। 4 नवंबर 1979 को U.S. Embassy Tehran पर हमला हो गया। ग़ुस्साए तलबा ने सफ़ारतख़ाने का मुहासिरा कर लिया और आखिरकार 66 अमरीकी अहलकारों को यरग़माल बना लिया (बाद में 14 रिहा हुए, मगर 52 अफ़राद 444 दिन तक कैद रहे)। दुनिया भर में ये वाक़िआ सुर्ख़ियों में रहा। उस वक़्त के अमरीकी सद्र Jimmy Carter के लिए ये सियासी आज़माइश बन गया। उन्होंने मुतअद्दिद कूटनीतिक कोशिशें कीं, इक़्तिसादी पाबंदियां लगाईं, मगर खुमैनी हुकूमत झुकने को तैयार न हुई। ईरान अमरीका को “शैतान-ए-अकबर” क़रार...

क्या पश्चिमी एशिया में अमरीकी असर का दौर ख़त्म हो रहा है?

▪️इस्राइली सहाफ़ी अलोन मिज़राही ने अपने एक तजज़िये में लिखा है: “हम तारीख़ को अपनी आँखों के सामने वक़ूअ पज़ीर होते देख रहे हैं। तमाम तवक़्क़ोआत के बरअक्स, ईरान इस वक़्त अमरीकी फ़ौजी अड्डों को इस क़दर गहराई और इस क़दर फ़ैसला-कुन अंदाज़ में निशाना बना रहा है कि दुनिया अभी तक इस मंजर को समझने के लिए तैयार ही नहीं। सिर्फ़ चार रोज़ के अंदर ईरान ने पूरे इलाक़े में अपने फ़ौजी असर-ओ-रसूख़ का दायरा काफ़ी वसीअ कर लिया है। ईरान ने दुनिया के सबसे क़ीमती और महंगे फ़ौजी अड्डों, अस्लाहे और निज़ामात को अपना निशाना बनाया है। बहरीन, कुवैत, क़तर और सऊदी अरब में मौजूद अमरीकी अड्डे दुनिया के सबसे बड़े और अहम अस्करी ठिकानों में शुमार किए जाते हैं। इन्हें तामीर करने में कई दशकों की मेहनत और खरबों डॉलर की सरमायाकारी शामिल रही है। यूँ समझिए कि तीस बरस से ज़्यादा के अस्करी इख़राज़ात का बड़ा हिस्सा अब धुएँ में तब्दील होता नज़र आ रहा है। हम देख रहे हैं कि करोड़ों डॉलर क़ीमत के रडार चंद लम्हों में नेस्त-ओ-नाबूद हो रहे हैं। मुकम्मल फ़ौजी छावनियाँ ख़ाली कर दी गयी हैं, कुछ को आग के हवाले कर दिया गया है और ...

आज की रात क्यों बताई जा रही है ‘कयामत की रात’?

अभी तक ईरान ने बहरीन,यूएई,जॉर्डन सहित तीन अमेरिकी बेस के वायुरक्षा प्रणाली अर्थात "Thad" उड़ा दिए जिसको स्थापित करने में 4 दशक व अरबों डॉलर लगे है। ईरान ने खाड़ी देशों में स्थित सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया है।ईरानी हमलों में इजरायल का तेल-अवीव शहर खंडहर में तब्दील हो चुका है। अब तक चले युद्ध मे अमेरिका व इजरायल को ईरान के मुकाबले भारी नुकसान हुआ है।अमेरिका व इजरायल ईरान में नागरिक ठिकानों पर नुकसान कर पा रहे है लेकिन ईरानी मिसाइल सिस्टम व ड्रोन स्टोरेज पर हमला नहीं कर पा रहे है। दरअसल ईरान को पता था कि अमेरिका-इजरायल हमला जरूर करेंगे इसलिए 3 दशक से उसी अनुरूप तैयारी कर रहा था।सारा मिसाइल सिस्टम अंडरग्राउंड, सारा ड्रोन सिस्टम अंडरग्राउंड बनाया हुआ है जिसकी जानकारी सिर्फ ईरान के सैन्य कमांडर्स को है। ईरान ने जमीन पर जगह-जगह 3D पेंटिंग द्वारा एयरक्राफ्ट स्टेशन, रनवे, युद्धक जहाज इस तरह बनाये है कि एकबारगी नजदीक से देखने पर वास्तविक लगते है।इस तरह की टैक्टिक सामने वाले का युद्धक साजो-सामान बर्बाद करने के लिए बनाए गए है। जगह-जगह बैलून टैंक, फाइटर जहाज, मिसाइल्स...

रहबर-ए-मोअज़्ज़म: हिम्मत, सियासत और वफ़ादारी की मिसाल

रहबर ए मोज़्ज़म,खामेनई साहब आपकी बहादुरों वाली ज़िंदगी को भी सलाम और आपकी फ़ख्र वाली शहादत को भी सलाम। हमें फ़ख्र है आप “Nation Of Father” से डरे नहीं,आप Nation Of Father के Father के आगे भी झुके नहीं, हमे फ़ख्र है आपने Nation Of Father के लिये लौंडा नाच नहीं किया,हमें फ़ख्र है आप एक ट्वीट तो छोड़िये बल्कि उसकी खुली धमकी और ऑफर पर भी “सरेंडर” नहीं किये ,हमें फ़ख्र है आपने किसी विष गुरु की तरह नाटक और ड्रामा नहीं किया,हमें फ़ख्र है आपने अपने मुल्क को Nation Of Father के Father के कदमों मे गिरवी नहीं रखा, हमें फ़ख्र है आपने हमारे गुरुर का सौदा नहीं किया,हमें फ़ख्र है आप बंकरों मे छुपे नहीं,हमें फ़ख्र है आप भागे नहीं, हमें आपकी ज़िंदगी पर फ़ख्र है हमें आपकी शहादत पर फ़ख्र है। बतौर हिंदुस्तानी हम हमेशा शुक्रगुज़ार रहेंगे आपके, कश्मीर जैसे मामले पर आपने संयुक्त राष्ट्र मे भारत का खुला समर्थन किया, अमेरिका के तमाम दबाव के बाद भी आपने एक नहीं बल्कि कई बार भारत को अपना समर्थन दिया।आपने पाकिस्तान के खिलाफ़ हमेशा हमारा साथ दिया,ऊर्जा के क्षेत्र में आपने भारत को सुरक्षा मुहैया करवाई,आपने भारत को सस्ता ...

क्या भारत को जंग में घसीटा जा रहा है? हिन्द महासागर की बड़ी घटना

सदियों में जो ना हुआ वो हो गया ,  कल अमेरिका ने ईरान के युद्धपोत IRIS DENA को श्रीलंका के पास   डुबो दिया , जिसमें 100-150 ईरान के सैनिक मारे गए ,  वहीं भारत में बहस छिड़ गई कि ये ईरान का युद्धपोत भारत द्वारा आयोजित इंटरनेशनल फ़्लीट रिव्यू और  MILAN -2026 के नौसैना अभ्यास के लिए आया था और विशाखापट्टनम से निकलने के बाद श्रीलंका के पास अमेरिका ने पनडुब्बी से उड़ा दिया जो कि भारत का मेहमान था , भारत की जिम्मेदारी बनती है ,  शायद ये बहस भारत की नैतिक जिम्मेदारी की हो रही है वहीं लोग कह रहे हैं भारत की जल सीमा 12 NM पर खत्म हो जाती है क्योंकि 12 NM से आगे अंतराष्ट्रीय जल सीमा चालू हो जाती है ,  अब मुद्दे पर आते हैं , क्या भारत की जल सीमा 12 नॉटिकल मील है ??  क्या भारत की जिम्मेदारी 12 नॉटिकल मील दूर खत्म हो जाती है ??  आपको जानकारी दुरुस्त करना चाहता हूँ किसी देश की जमीन से 12 समुद्री मील की दूरी तक उसका टेरिटोरियल क्षेत्र होता है जो कि सही है ,  अब बात जिम्मेदारी की आती है तो भारत हिन्द महासागर में 12 समुद्री मील तक सीमित नहीं है ,  भार...

From Superpowers to Surrender: The Harsh Reality of Modern Warfare

पूर्व सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर 20 लाख बम गिराए, लेकिन जंग हार गया।  अमेरिका ने वियतनाम पर 75 लाख बम गिराए, पर हारकर भागना पड़ा।  फिर अमेरिका ने अफगानिस्तान पर 2 लाख बम गिराए, तब भी तालिबान डटा रहा।  सिर्फ़ बम गिराने से अगर जंग जीता गया होता तो आज ईरान समझौते की टेबल पर होता।  लेकिन, कल अमेरिका ने तकरीबन पूरे मिडिल ईस्ट से भागना ठीक समझा।  सारे दूतावास बंद। सैनिक होटलों में और अमेरिकी मदद बंद। यही ईरान का वॉर मॉडल है, जिसकी ताकत भारत में नहीं है।  भारत अब सुविधाभोगी है। वह उस 60–70 के दशक में नहीं लौटना चाहता, जब हमने लड़ाइयां जीती थी।  हमें खाने को चाइनीज चाहिए, पिज्जा चाहिए, पीने को कोक। शॉपिंग को आलीशान मॉल, चलने को चमचमाती सड़कें और दौड़ने को कार।  हमारी इकॉनमी बेबस है और इस विकास को कायम रखने की कोई भी कीमत चुकाकर हम कॉम्प्रोमाइज्ड होने के लिए तैयार हैं।  नतीज़ा–सामने एक सरेंडर का चेहरा है। एक भ्रष्ट, आतंकी सत्ता।  कानून–व्यवस्था को एक तरफ रख भी दें तो इस विकास की हम क्या कीमत चुका रहे हैं? अपनी आत्मनिर्भरता और सार्वभौमिकता को गि...