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क्या पश्चिमी एशिया में अमरीकी असर का दौर ख़त्म हो रहा है?

▪️इस्राइली सहाफ़ी अलोन मिज़राही ने अपने एक तजज़िये में लिखा है:
“हम तारीख़ को अपनी आँखों के सामने वक़ूअ पज़ीर होते देख रहे हैं। तमाम तवक़्क़ोआत के बरअक्स, ईरान इस वक़्त अमरीकी फ़ौजी अड्डों को इस क़दर गहराई और इस क़दर फ़ैसला-कुन अंदाज़ में निशाना बना रहा है कि दुनिया अभी तक इस मंजर को समझने के लिए तैयार ही नहीं।
सिर्फ़ चार रोज़ के अंदर ईरान ने पूरे इलाक़े में अपने फ़ौजी असर-ओ-रसूख़ का दायरा काफ़ी वसीअ कर लिया है। ईरान ने दुनिया के सबसे क़ीमती और महंगे फ़ौजी अड्डों, अस्लाहे और निज़ामात को अपना निशाना बनाया है। बहरीन, कुवैत, क़तर और सऊदी अरब में मौजूद अमरीकी अड्डे दुनिया के सबसे बड़े और अहम अस्करी ठिकानों में शुमार किए जाते हैं। इन्हें तामीर करने में कई दशकों की मेहनत और खरबों डॉलर की सरमायाकारी शामिल रही है। यूँ समझिए कि तीस बरस से ज़्यादा के अस्करी इख़राज़ात का बड़ा हिस्सा अब धुएँ में तब्दील होता नज़र आ रहा है।

हम देख रहे हैं कि करोड़ों डॉलर क़ीमत के रडार चंद लम्हों में नेस्त-ओ-नाबूद हो रहे हैं। मुकम्मल फ़ौजी छावनियाँ ख़ाली कर दी गयी हैं, कुछ को आग के हवाले कर दिया गया है और कई मुकम्मल तौर पर तबाह हो चुकी हैं। मेरी मालूमात के मुताबिक़, अमरीका ने अपनी पूरी तारीख़ में शायद ही कभी ऐसी तबाही देखी हो, सिवाय पर्ल हार्बर के हमले के, मगर वह भी महज़ एक हमला था।

किसी मामूली जंग में किसी दुश्मन ने अमरीकी फ़ौज के साथ वह सुलूक नहीं किया जो इस वक़्त ईरान कर रहा है। यह मंजर यक़ीन से बाहर मालूम होता है। हालात इस क़दर संगीन हैं कि इस जंग से मुतअल्लिक़ ताज़ा मालूमात तकरीबन मुकम्मल सेंसरशिप के पर्दे में छुपा दी गयी हैं। आपने गौर किया होगा कि हर रोज़ हमें पहले के मुक़ाबले कहीं कम इत्तिला दिखाई जा रही है।

पैंतीस साल पहले, पहली ख़लीज जंग के दौरान, हमें मुसलसल वीडियो फुटेज दिखायी जाती थीं। उस वक़्त ‘स्मार्ट बम’ और कैमरों की टेक्नॉलॉजी नई चीज़ थी, फिर भी हर रात जंग के मंजरात टीवी पर नज़र आते थे। मगर आज की सूरत-ए-हाल यह है कि हमें तक़रीबन कोई वीडियो दिखाई ही नहीं देता।

ज़रा ग़ौर कीजिए। दुनिया की सबसे बड़ी अस्करी ताक़त जिसकी फ़िज़ाई क़ुव्वत भी दुनिया में सबसे बड़ी मानी जाती है चार दिनों से हमलों की ज़द में है। दावा किया जा रहा है कि वह ईरानी दिफ़ाई निज़ाम को तोड़ रही है, लेकिन हमें कहीं भी ईरान की फ़िज़ा पर अमरीकी बरतरी का कोई वाज़ेह सुबूत नज़र नहीं आता। तेहरान या ईरान के किसी भी शहर के ऊपर उड़ते अमरीकी जंगी तय्यारों की फुटेज कहाँ है?

अमरीकी फ़ौजी ईरान की सरज़मीन पर क़दम रखने का तसव्वुर भी नहीं कर सकते। इस जंग की बेबसी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि चौथे ही दिन ट्रम्प इंतिज़ामिया की तरफ़ से अजीब-ओ-ग़रीब मशवरे सामने आने लगे हैं। कहा जा रहा है कि फ़ारस की ख़लीज से गुज़रने वाले तेल के जहाज़ों को अस्करी तहफ़्फ़ुज़ फ़राहम किया जाए। ज़रा सोचिए क्या आप अमरीकी जहाज़ों को हज़ारों ईरानी मिसाइलों की ज़द में भेजना चाहते हैं? इस वक़्त कोई भी जहाज़ जलडमरूमध्य-ए-हॉर्मुज़ से महफ़ूज़ तौर पर नहीं गुज़र सकता।

ईरान ने दशकों तक इस मंज़र के लिए तैयारी की है। अब कुछ लोग यह राय दे रहे हैं कि कुर्द मिलिशिया को अस्लहा देकर ईरान के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जाए। यह कैसी बात है? क्या आपने ईरान का नक़्शा देखा है? मालूम होता है कि ट्रम्प इंतिज़ामिया ने कभी ईरान की वुसअत का सही अंदाज़ा ही नहीं लगाया। क्या दस हज़ार लड़ाके ईरान को मात दे सकते हैं? पचास हज़ार? या एक लाख? ईरान उन्हें ज़िन्दा निगल जाएगा।

अमरीका और इस्राइल यह जंग पहले ही हार चुके हैं। वे बम गिराकर शहरों को तबाह कर सकते हैं, इमारतों को मलबे में बदल सकते हैं, लेकिन इस जंग को जीतना उनके बस की बात नहीं। ईरान का अस्करी ढांचा और उसका अस्लहा पूरे मुल्क में ज़मीन की गहराइयों में महफ़ूज़ किया गया है। वहाँ तक पहुँचना अमरीकियों के लिए  और यक़ीनन इस्राइलियों के लिए तक़रीबन नामुमकिन है।

उन्होंने एक ऐसा सिलसिला शुरू कर दिया है जिसे ख़त्म करने की क़ुव्वत उनके पास नहीं। जब यह सब ख़त्म होगा, तो अमरीका फिर कभी मग़रिबी एशिया में उसी तरह वापस नहीं आ सकेगा। मशरिक़-ए-औसत में उसकी मौजूदगी का दौर ख़त्म हो जाएगा। मैं यह बात पूरे यक़ीन के साथ कह रहा हूँ।

तारिक़ अज़ीम तनहा

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