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जंग, जमीर और विजयी भाव का वहम

क्या जंग सिर्फ मैदान मे दुश्मन को हराकर जीती जाती है..
अगर जंग जीतने का यही पैमाना है तो फिर इस दुनिया मे कमज़ोर को ज़िंदा रहने का कोई हक नहीं। मुझे याद है कि सिक्सथ की उर्दू की किताब मे एक सबक "अब्बू ख़ां की बकरी" के उन्वान से था जिसमे अब्बू ख़ां की तमाम बकरियां रेवड़ के उसूलों को फ़ालो करती थीं सिवाये चांदनी के, और कभी पहाड़ी के उस तरफ़ नहीं जाती थीं जिधर एक भेड़िया रहता था मगर चांदनी एक रात रेवड़ से अलग होकर पहाड़ी के उस तरफ़ गयी और सारी रात उस भेड़िये से लड़कर सुब्ह को हलाक हो गयी। भेड़िये के दांत और पंजे चांदनी से ज़्यादा मज़बूत थे तो आख़िर में चांदनी को मारा जाना था लेकिन क्या चांदनी सिर्फ यूंही मारी गयी कि उसके पास नुकीले दांत और पंजे ना होकर सिर्फ दो सींग थे। नहीं वह इसीलिए मारी गयी क्योकि बकरियो के उस रेवड़ मे उसके अलावा किसी मे भेड़िये से लड़ने का हौसला नहीं था।

इस कहानी को सुनिये और एक अपना साइक्लोजिकल टैस्ट कीजिये। अगर आप इस कहानी को पढते हुये भेड़िये के तरफदार हैं तो आप इतने बुज़दिल हैं कि हर हाल मे जीतने वाले की तरफ़ होकर एक जीती हुयी साइड मे होने का साइक्लोजिकल मज़ा लेना चाहते हैं। बिल्कुल उसी तरह जैसे पोर्न मे आप सिर्फ देख रहे होते है लेकिन आपकी कुंठाये आपके लिये वह ज़हनी लज़्ज़त लेकर आती हैं जिससे बज़ाहिर आपका कोई हिस्सा नहीं.. लेकिन आपकी सिचुऐशन समझ मे आती है। आप मे से ज़्यादातर सारा दिन इतना जलील होते हैं मसलन किसी काम को कराने मे चपरासी से लेकर अधिकारी तक की घुड़कियॉ सुनना, अव्वल तो बेरोज़गार होना और अगर कोई संविदा पे कुछ जुगाड़ से मिल भी गया तो वहां अपने अफ़सर की ग़ुलामी करना वग़ैरह वग़ैरह तो आप एक और हारती हुयी तरफ़ होने का जोखिम नहीं उठा हकते। आप समझ मे आते हैं। अब ज़रा बात दूसरे तब्के से.. सीरिया और वहां का तख्ता पलट और उस पर जश्न याद है? इज़राइल उस दिन हारने के नज़दीक आएगा जिस दिन जंग ज़मीन पर आयगी और ईराक मे प्रो ईरान मिलिशिया और फीलिंग्स और सीरिया मे बशर अल असद की हुकूमत होने से पहली बार ईरान से इज़रायल तक एक लैंड पैसेज बन गया था। हमास से सीज़फ़ायर इसी लिये हुआ था कि वहां रिजीम चेंज कराया जा सके। वह हुआ और आप फिलिस्तीन के मज़लूमो पर रोते रोते अचानक जश्न मनाने लगे और अब फिर अरब के शेख़ो पर रो रहे हैं। लेकिन क्यों.. आप एक ज़माना पहले इस नैरेटिव को मान चुके है कि इमाम हुसैन हक़ पर थे मगर हालात नासाज़ होने की वजह से कर्बला एक तदबीरी गलती थी और इमाम हुसैन कूफ़े के बहकावे मे आ गये। तो मुहम्मद बिन सलमान वह तदबीरी ग़लती करने को तय्यार नहीं । सिंपल। अभी मुहर्रम आने दीजिये और फिर इसी सोशल मीडिया पर रंग देखियेगा। काफ़ और क़ाफ़ को छोटा काफ़ और बड़ा काफ़ कहने वाले कुरान और हदीस के हवाले लिये खड़े होंगे। अभी तो मामला और है यूं खामोश हैं। तारीख़ बेरहम हद तक सफ़्फ़ाक होती है। ख़ैबर मे भी किसी ने नहीं कहा था कि आज अलम किसे मिलेगा इसका फ़ैसला उम्मा करेगी, तो मुहर्रम आयगा और जब जुलूस मे बम मारे जायेंगे तो आप उसी मकरूह ख़ामोशी की चादर के पीछे चले जायेंगे जिस मे लोग उस वक्त चले जाते हैं जब आपके घर पर बुलडोज़र पहुंचता है। मगर आपकी भी बात समझ मे आती है। एक ज़माने से आपको भी कोई ऐसी ख़बर नही मिली जो आपको "विजयी भाव" दे। तो आप कभी सीरिया मे तख़्ता पलट का जश्न मनाएंगे कभी अफ़ग़ानिस्तान मे तालिबान की वापसी का। वही तालिबान जो इस वक्त सब पे खामोश रहकर उस पाकिस्तान से लड़ रहा है जिसके बनने का हर्जाना आज तक हिंदुस्तानी मुसलमान भुगत रहा है।

अब बात खामनई के मसलक वालो की..
अभी मुहर्रम आएगा और आप सवा दो महीने कि नोहा कौन पढेगा कौन नहीं, कौन सी अंजुमन को कहां पढाया जायगा, ज़ुलजनाह की बाग कौन पकड़ेगा इस पर जूतम पैदार कर रहे होंगे।
यह इलाका थर्लड वर्लड कंट्रीज़ सिर्फ इकोनामिकल बैकवर्डनैस की वजह से नहीं कहलाता। इसलिये भी कहलाता है कि यहां हमाम मे सारे नंगे एक दूसरे को नंगा नंगा कहते रहते हैं।

तारिक़ अज़ीम तनहा

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