कभी-कभी किसी मुल्क की सियासी फ़ज़ा में ऐसी ख़ामोशी पैदा हो जाती है जो शोर से ज़्यादा असर रखती है। अवाम (Public) बोलना बंद कर देती है, मगर उसका तजज़िया, उसका एहसास और उसकी मायूसी समाज के हर कोने में महसूस की जा सकती है। आज हिंदुस्तान की सियासत में भी कुछ ऐसा ही मंज़र दिखाई देता है, जहाँ एक तरफ़ क़ुदरत-ए-सियासत (Political Power) अपनी पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है और दूसरी तरफ़ अवाम का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे अपने एहसासात को खामोशी में तब्दील करता जा रहा है।
इस मुल्क के करोड़ों अफ़राद में से एक साधारण शहरि (Citizen) की नज़र से अगर मौजूदा हालात को देखा जाए तो यह कहानी किसी एक दिन की नहीं बल्कि कई बरसों के तजुर्बात का नतीजा है। कभी उम्मीदें थीं, तवक़्क़ोआत थीं और एक नई सियासी क़ियादत से बहुत कुछ बदल जाने का तसव्वुर था। मगर वक़्त के साथ जब नोटबंदी, महामारी और मुआशियाती दबाव जैसे मराहिल (Phases) सामने आए तो अवाम ने अपनी आँखों के सामने बहुत कुछ टूटते हुए भी देखा
ख़ास तौर पर महामारी के दौर में जब कई घरों में दर्दनाक हालात पैदा हुए, तब सरकारी बयानात और ज़मीनी तजुर्बात के दरमियान पैदा हुआ फ़ासला कई लोगों के दिलों में एक गहरी कसक छोड़ गया। सियासत में बयान (Statement) और हक़ीक़त (Reality) का यह फ़र्क़ अक्सर बहस का मौज़ू बनता रहा है। जब हुकूमत (Government) यह कहे कि हालात क़ाबू में हैं और अवाम अपनी आँखों से कुछ और देखे, तो अवाम का एतिमाद (Trust) धीरे-धीरे मुतास्सिर होने लगता है।
मौजूदा दौर की एक और हक़ीक़त यह भी है कि दुनिया भर में मुआशियाती दबाव और रसद (Supply Chain – आपूर्ति प्रणाली) के मसाइल पैदा हो रहे हैं। ऊर्जा, गैस और तिजारत के आलमी इशकाल (Global Issues) कई मुल्कों को एक साथ प्रभावित कर रहे हैं। मगर अवाम के लिए यह समझना भी उतना ही ज़रूरी होता है कि उनके अपने मुल्क की हुकूमत इन हालात का सामना किस अंदाज़ में कर रही है। सियासी क़ियादत की असली क़ाबिलियत अक्सर उन्हीं लम्हों में परखी जाती है जब हालात आसान नहीं होते।
इस पूरी तस्वीर में एक और पहलू सियासी रवायत (Political Tradition) का भी है। हिंदुस्तान की जम्हूरियत (Democracy) हमेशा से बहस, इख़्तिलाफ़ और जवाबदेही पर क़ायम रही है। अवाम अपने रहनुमाओं से सिर्फ़ क़ुदरत (Power) नहीं बल्कि जवाबदेही (Accountability) भी चाहती है। यही वजह है कि जब कभी सियासी क़ियादत अवाम से दूर महसूस होने लगे, तो समाज में एक तरह की बेज़ारी और मायूसी भी जन्म लेने लगती है।
मगर हिंदुस्तान की सबसे बड़ी ताक़त उसकी तहज़ीब (Civilization) और इंसानियत (Humanity) रही है। यह वही सरज़मीन है जहाँ राम, कृष्ण, बुद्ध, गांधी और अब्दुल कलाम जैसी शख़्सियतों की विरासत मौजूद है। इन तमाम नामों की एक ही बुनियादी तालीम रही, इंसानियत और ज़िम्मेदारी। यही वजह है कि जब भी कोई बड़ा इम्तिहान आता है, तो अवाम अक्सर अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर एक साथ खड़ी हो जाती है।
तारीख़ हमें यह भी बताती है कि सियासी कुर्सियाँ हमेशा स्थायी नहीं होतीं। वक़्त के साथ कई हुकूमतें आती हैं, जाती हैं और नए दौर की शुरुआत होती है। मगर जो चीज़ सबसे ज़्यादा देर तक ज़िंदा रहती है वह है अवाम की याददाश्त और उसका फ़ैसला। इतिहास का अदालती निज़ाम (Judgment of History) अक्सर बहुत देर से आता है, मगर जब आता है तो वह सियासत की सबसे बड़ी तख़्तियों पर भी अपना असर छोड़ जाता है।
आज के हालात में शायद सबसे अहम चीज़ यही है कि सियासत अपने असल मक़सद को याद रखे, अवाम की खिदमत (Public Service)। क्योंकि आख़िरकार ताक़त का असल इम्तिहान वही होता है जहाँ वह इंसानियत, इंसाफ़ और जवाबदेही के साथ खड़ी हो। और शायद यही वह लम्हा होता है जब सियासत से ज़्यादा अहम एक चीज़ बन जाती है और वो है राजधर्म (Duty of Governance)
तारिक़ अज़ीम तनहा
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