अमरीकी क़ुदरत-ए-सियासत: डोनाल्ड ट्रम्प, आलमी फ़ौजी अड्डे और जियोपॉलिटिक्स (Geopolitics) का ख़तरनाक खेल
दुनिया की तारीख़ में कई ऐसे मराहिल (Phases) आए हैं जब किसी अज़ीम ताक़त की क़ियादत एक ऐसे शख़्स के हाथ में चली गई जिसकी सियासी हिकमत-ए-अमली ने पूरी दुनिया को बेचैनी और तश्वीश में मुब्तला कर दिया। आज की आलमी सियासत में अगर किसी शख़्सियत को लेकर इस किस्म की बहस सबसे ज़्यादा मौजूद है तो वह डोनाल्ड ट्रम्प हैं। ट्रम्प की सियासी तर्ज़-ए-फ़िक्र (Political Thinking) और उनकी आलमी पॉलिसी को देखकर कई तजज़िया निगार यह सवाल उठाते नज़र आते हैं कि क्या अमरीका अपनी क़ुदरत (Power) को महज़ तहफ़्फ़ुज़ के लिये इस्तेमाल कर रहा है या फिर यह पूरी दुनिया पर मुआशियाती और सियासी ग़लबा कायम रखने की कोशिश है।
ट्रम्प की सियासत का एक अहम पहलू टैरिफ जंग (Tariff War – व्यापारिक शुल्क युद्ध) रहा है। उन्होंने यह तसव्वुर पेश किया कि दुनिया के कई मुल्क सदियों से अमरीका की मुआशियात से फ़ायदा उठा रहे हैं और अब वक़्त आ गया है कि अमरीका अपने तिजारती मफ़ादात को सख़्ती से दिफ़ा करे। मगर जब यह टैरिफ जंग चीन जैसे अज़ीम मुआशियाती ताक़त के साथ टकराई तो यह सिर्फ़ एक तिजारती मसला नहीं रहा बल्कि जियोपॉलिटिक्स (Geopolitics – आलमी सियासी ताक़तों का खेल) का हिस्सा बन गया।
दुनिया के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में अमरीका की मौजूदगी इस सियासी तसव्वुर को और ज़्यादा पेचीदा बना देती है। आज आलमी अंदाज़ों के मुताबिक़ अमरीका के तक़रीबन 750 से 900 फ़ौजी अड्डे दुनिया के मुख़्तलिफ़ मुल्कों में मौजूद हैं। इनमें जापान का ओकिनावा, जुनूबी कोरिया का कैंप हम्फ्रीज़ और जर्मनी का रामस्टीन एयर बेस जैसे बड़े अस्करी मराकिज़ शामिल हैं। यह अड्डे सिर्फ़ फौजी मौजूदगी का इज़हार नहीं बल्कि एक ऐसी जियोस्ट्रैटेजिक (Geostrategic – सामरिक वैश्विक रणनीति) हिकमत-ए-अमली का हिस्सा हैं जिससे अमरीका दुनिया के हर अहम इलाके में अपनी निगरानी और असर बनाए रख सके।
अमरीकी हुकूमत अक्सर यह दावा करती है कि इन अड्डों का मक़सद अपने क़ौमी तहफ़्फ़ुज़ (National Security) की हिफ़ाज़त, इत्तिहादी मुल्कों की मदद और जियोपॉलिटिकल तनाव के वक़्त फ़ौरन रद्दे-अमल (Rapid Response) देना है। मगर इसके नक़्क़ादीन का कहना है कि इतनी बड़ी फ़ौजी मौजूदगी दरअसल दुनिया के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में अमरीकी असर को कायम रखने की एक मुनज़्ज़म कोशिश है।
मुआशियात के मैदान में भी अमरीका की हिकमत-ए-अमली अक्सर बहस का मौज़ू बनती रही है। डॉलर (US Dollar) की आलमी अहमियत ने अमरीका को एक ऐसी क़ुव्वत दे दी है जिससे वह आलमी तिजारत के निज़ाम पर गहरा असर डाल सकता है। तेल, हथियार, तिब्बी अदवियात (Medicines) और क़ीमती मआदन (Precious Metals) की तिजारत में डॉलर का इस्तिमाल दरअसल एक ऐसा मुआशियाती निज़ाम पैदा करता है जिसमें अमरीका की करंसी ही आलमी मुआशियात का मरकज़ बनी रहती है।
फ़ौजी क़ुव्वत के मैदान में भी अमरीका की बर्तरी काफ़ी वाज़ेह है। अंदाज़ों के मुताबिक़ अमरीका के पास तक़रीबन 6000 न्यूक्लियर असलहा (Nuclear Weapons – परमाणु हथियार) मौजूद हैं। इसके अलावा सैटेलाइट निगरानी सिस्टम (Satellite Surveillance – अंतरिक्ष से निगरानी) के ज़रिये दुनिया के कई हिस्सों की हरकतों पर भी नज़र रखी जाती है ताकि किसी भी मुल्क की न्यूक्लियर सरगर्मियों को मॉनिटर किया जा सके।
इन तमाम पहलुओं को देखकर कई तजज़िया निगार यह सवाल उठाते हैं कि क्या दुनिया एक नई किस्म की ताक़त की सियासत की तरफ़ बढ़ रही है जहाँ फ़ौजी अड्डे, मुआशियाती दबाव और जियोपॉलिटिकल गठजोड़ मिलकर एक नया आलमी निज़ाम तश्कील दे रहे हैं। इस पूरी तस्वीर में ट्रम्प की सियासत ने बहस को और ज़्यादा तेज़ कर दिया है क्योंकि उनकी बयानबाज़ी और फैसलों ने कई दफ़ा दुनिया को नए तनाव की तरफ़ धकेला है।
तारीख़ हमें यह भी बताती है कि जब बड़ी ताक़तें अपनी क़ुव्वत को सिर्फ़ अपने मफ़ादात के लिये इस्तेमाल करती हैं तो आलमी निज़ाम में बेइतमादी (Distrust) पैदा हो जाती है। यही वजह है कि आज की दुनिया में जियोपॉलिटिक्स का खेल पहले से कहीं ज़्यादा पेचीदा हो चुका है।
आख़िरकार सवाल यही है कि क्या आने वाले दौर में ताक़त की यह सियासत दुनिया को एक नए तवाज़ुन (Balance of Power) की तरफ़ ले जाएगी या फिर यह मुकाबला एक ऐसे आलमी तनाव को जन्म देगा जिसका असर पूरी इंसानियत पर पड़ेगा। शायद आने वाला वक़्त ही इसका असल जवाब देगा।
तारिक़ अज़ीम तनहा
Comments
Post a Comment