तारीख़-ए-आलम (World History) में कुछ मंज़र ऐसे होते हैं जो इंसानियत के ज़हन (Human Consciousness) पर हमेशा के लिये नक़्श हो जाते हैं। यह मंज़र किसी किताब, किसी तक़रीर या किसी बयान से ज़्यादा असर रखते हैं। एक तस्वीर, एक चीख़ या एक मासूम चेहरे का दर्द कभी-कभी पूरी दुनिया की सियासत को कटघरे में खड़ा कर देता है।
करीब पचास साल पहले जब वियतनाम में जंग-ए-अज़ीम (War) जारी थी, उस दौर में दुनिया आज की तरह डिजिटल इत्तिसाल (Digital Communication – इंटरनेट और मोबाइल) से जुड़ी हुई नहीं थी। खबरें हफ्तों और महीनों बाद अख़बारों और टीवी के ज़रिये दुनिया तक पहुंचती थीं। मगर उस जंग के दौरान एक ऐसा मंज़र सामने आया जिसने पूरी दुनिया के ज़मीर को हिला दिया।
अमरीकी फौज उस वक़्त वियतनाम पर नेपाम बम (Napalm Bomb – आग फैलाने वाला रासायनिक बम) गिरा रही थी। यह बम गिरने के बाद आग की ऐसी लपटें पैदा करता था जो खेतों, घरों, जानवरों और इंसानों को पल भर में राख कर देती थीं। उसी दौरान एक तस्वीर दुनिया के सामने आई जिसने जंग की हैवानियत को बेनक़ाब कर दिया।
एक नौ साल की बच्ची, जिसका जिस्म नेपाम की आग से झुलस चुका था, सड़क पर नंगे पांव दौड़ रही थी। उसके चेहरे पर दर्द और खौफ़ का ऐसा इज़हार था जिसे देखकर पूरी दुनिया सन्न रह गई। उस बच्ची का नाम फान थी किम फुक (Phan Thi Kim Phuc) था, मगर दुनिया ने उसे “नेपाम गर्ल” के नाम से जाना।
जब यह तस्वीर अख़बारों में छपी तो दुनिया भर में एहतिजाज (Protest) की लहर उठी। लोग सड़कों पर निकल आए, जुलूस निकले, और अमरीकी सियासत के खिलाफ़ आवाज़ें बुलंद होने लगीं। जंग उस वक़्त तुरंत नहीं रुकी। वह कई साल और जारी रही मगर उस तस्वीर ने एक अहम काम कर दिया था। उसने दुनिया को दिखा दिया कि जंग के नाम पर इंसानियत के साथ क्या हो रहा है।
कई दशकों बाद जब ग़ज़ा में जंग का सिलसिला शुरू हुआ, तो एक अमरीकी मुहक़्क़िक़ (Analyst) ने टीवी पर बैठकर कहा था कि अगर ग़ज़ा में मारे गए बच्चों की तस्वीरें दुनिया देखेगी, तो शायद दुनिया की सियासत मजबूर हो जाएगी कि वह इस जंग को रोके।
मगर हक़ीक़त कुछ और निकली। वक्त के साथ ग़ज़ा में इतने बच्चे मारे गए कि दुनिया के कई हिस्सों में यह जुमला सुनाई देने लगा कि यह इलाक़ा बच्चों का कब्रिस्तान बनता जा रहा है। ऐसे मासूम भी मारे गए जिनकी उम्र सिर्फ़ कुछ दिन या कुछ महीने थी। कई घर मलबे में तब्दील हो गए और पूरे-पूरे खानदान एक ही लम्हे में खत्म हो गए।
इस बार फर्क यह था कि दुनिया इस सब को महीनों बाद नहीं बल्कि लाइव डिजिटल फ़ीड (Live Digital Feed – मोबाइल और इंटरनेट प्रसारण) के ज़रिये देख रही थी। लोग अपने मोबाइल फोन पर इन मंज़रों को देखते रहे जले हुए घर, रोते हुए मां-बाप और मलबे के नीचे दबे हुए बच्चे।
यह वही दुनिया है जहाँ अगर किसी शहर में कोई बच्चा लापता हो जाए तो फौरन रेड अलर्ट जारी हो जाता है। हेलीकॉप्टर उड़ने लगते हैं, पुलिस और मीडिया पूरी ताक़त से तलाश में जुट जाते हैं। मगर इसी दुनिया में हजारों बच्चों की मौत को देखकर भी सियासत की रफ़्तार शायद ही बदली।
शायद इंसान वक़्त के साथ हर तरह के ज़ुल्म का आदी हो जाता है। मगर यह तसव्वुर भी कभी मुश्किल था कि हर घंटे एक बच्चा जंग की भेंट चढ़े और दुनिया का कारोबार वैसे ही चलता रहे।
अब हालात एक नए मोड़ पर खड़े दिखाई देते हैं। जब किसी नए इलाके में जंग का आग़ाज़ होता है और स्कूलों, घरों या अस्पतालों पर हमलों की खबरें आती हैं, तो दुनिया एक बार फिर उसी पुराने सवाल के सामने खड़ी हो जाती है क्या जंग के मैदान में मासूमियत की कोई क़ीमत नहीं बची?
कई साल पहले एक टीवी इंटरव्यू में एक शख़्स से पूछा गया था जो खुदकुश हमला (Suicide Bombing – आत्मघाती विस्फोट) करने जा रहा था। उससे सवाल किया गया कि अगर किसी इमारत में मासूम बच्चे मौजूद हों तो क्या उन्हें भी मरना चाहिए। उसने ठंडे लहजे में जवाब दिया—“आपको किसने कहा कि बच्चे मासूम होते हैं?”
आज जब दुनिया की सियासत और जंगों को देखा जाता है तो कभी-कभी यही सवाल ज़हन में उभरता है कि क्या इंसानियत का मयार (Standard of Humanity) वाक़ई बदल चुका है। फर्क शायद सिर्फ़ तरीक़े का रह गया है कोई शख़्स बम लेकर जाता है और कोई महज़ बयान देकर।
और यही वह लम्हा होता है जब इंसान को अपने ज़मीर से यह पूछना पड़ता है कि जंग की असली क़ीमत आखिर कौन चुका रहा है।
तारिक़ अज़ीम तनहा
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