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ईरान: सिर्फ़ एक मुल्क नहीं, बल्कि ‘आज़्म-ओ-इरादा’ की दास्तान — पाबंदियों, जंग और सियासत के दरमियान एक क़ौम का सब्र

इज़राइल ने जंग में हुए नुक़सान की मीडिया कवरेज पर सख़्त पाबंदी आइद कर दी है। कहा जा रहा है कि तेल अवीव, यरूशलेम और पूरे इज़राइल में ईरानी मिसाइलों से होने वाली तबाही की वीडियोग्राफ़ी और तस्वीरें लेने पर सख़्त रोक लगा दी गई है। यहाँ तक कि इन वीडियोज़ और तस्वीरों को इज़राइल से बाहर भेजने पर भी सख़्त क़िस्म की मनाही कर दी गई है। हुकूमत का कहना है कि इससे मुल्क की सिक्योरिटी और फ़ौजी मुक़ामात से जुड़ी मालूमात दुश्मनों तक पहुँच सकती है, इसलिए ऐसी रिपोर्टिंग पर पाबंदी ज़रूरी समझी गई।

दूसरी तरफ़ अमरीका और इज़राइल लगातार यह दावा कर रहे हैं कि उनके हमलों से ईरान को बहुत बड़ा नुक़सान पहुँचा है। मगर अगर वाक़ई ईरान इतनी बुरी तरह तबाह हो चुका है तो फिर वह हथियार क्यों नहीं डाल रहा? जो अमरीका जंग के आग़ाज़ में यह कह रहा था कि सिर्फ़ 48 घंटों में ईरान में हुकूमत तब्दील हो सकती है, अब उस जंग को बारह दिन से ज़्यादा गुज़र चुके हैं और हालात अब भी नाज़ुक बने हुए हैं। ईरानी क़ियादत किसी क़िस्म के मुआहिदे या समझौते के लिए तैयार नज़र नहीं आती।


कई तजज़ियाकार यह सवाल भी उठा रहे हैं कि कहीं इज़राइल के साथ खड़े होने की वजह से अमरीका किसी ऐसे दलदल में तो नहीं उतर गया जिससे निकलना आसान नहीं होगा। दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने सीधे इज़राइल पर हमलों की तादाद कम रखी, मगर जिन अरब मुल्कों में अमरीका ने अपने फ़ौजी अड्डे क़ायम कर रखे हैं, उन अड्डों को पहले निशाना बनाया गया। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि इन हमलों से कई फ़ौजी ठिकानों को काफ़ी नुक़सान पहुँचा।

जंग के शुरुआती दिन ही यह खबर आई थी कि ईरान के कुछ अहम फ़ौजी ओहदेदार, जिनमें सुप्रीम कमांडर, वज़ीर-ए-दिफ़ा और कई सीनियर जनरल शामिल थे, मारे गए। इसके बावजूद ईरान ने पीछे हटने के बजाय मुकाबले का रास्ता अख़्तियार किया और वह तनहा कई ताक़तों के सामने डटा हुआ दिखाई दिया। इसी वजह से कुछ लोग यह मिसाल देने लगे हैं कि अगर जंग लंबी खिंचती है तो कहीं यह अमरीका के लिए दूसरा वियतनाम साबित न हो जाए।

जैसे-जैसे यह जंग तवील होती जाएगी, उसके आलमी असरात भी सामने आने लगेंगे। मशरिक़-ए-वुसता दुनिया के सबसे बड़े तेल पैदा करने वाले इलाक़ों में शुमार होता है। अगर जंग का दायरा और बढ़ा या तेल की सप्लाई और समुंद्री रास्तों पर असर पड़ा तो पूरी दुनिया में पेट्रोलियम पदार्थों की किल्लत पैदा हो सकती है। ऐसी सूरत में तेल की क़ीमतों में बेइंतिहा इज़ाफ़ा होना लगभग तय माना जा रहा है, जिसका असर आम आदमी से लेकर बड़ी इकॉनमी तक हर जगह दिखाई देगा।

कुछ रोज़ पहले अमरीका की तरफ़ से यह खबर फैलाई गई थी कि ईरान के परमाणु प्रोग्राम को हमलों के ज़रिये काफ़ी हद तक तबाह कर दिया गया है। मगर उसके बाद अचानक यह बयान सामने आया कि अगर हमला न किया जाता तो ईरान सिर्फ़ एक हफ़्ते के अंदर परमाणु बम बना सकता था। इन मुख़्तलिफ़ बयानों ने दुनिया भर में नई बहस को जन्म दे दिया है।

आज दुनिया में कई मुल्क ऐसे हैं जिनके पास परमाणु हथियार मौजूद हैं। अमरीका, रूस, चीन, फ़्रांस और ब्रिटेन के अलावा पाकिस्तान और इज़राइल को भी परमाणु ताक़तों में शुमार किया जाता है। अक्सर इन हथियारों को “दुनिया की हिफ़ाज़त” और “सिक्योरिटी” के नाम पर जायज़ ठहराया जाता है। मगर जब कोई दूसरा मुल्क ऐसी ही सलाहियत हासिल करने की कोशिश करता है तो उसे आलमी अम्न के लिए ख़तरा बताया जाने लगता है।

जंग के दौरान सबसे बड़ा सवाल हमेशा इंसानियत का होता है। किसी आज़ाद मुल्क पर अचानक रात के अंधेरे में हमला करना, उसकी क़ियादत को निशाना बनाना या रिहायशी इलाक़ों में मिसाइल गिरने से मासूम लोगों की जान जाना, ये सब ऐसे मसाइल हैं जिन पर दुनिया भर में बहस होती रही है। अगर किसी स्कूल पर हमला होता है और उसमें बड़ी तादाद में बच्चियाँ और आम लोग मारे जाते हैं तो यह सिर्फ़ जंगी वाक़िआ नहीं रह जाता बल्कि एक इंसानी सानिहा बन जाता है।

पूरी दुनिया इन वाक़ियात को देख रही है और समझने की कोशिश कर रही है कि ताक़त की सियासत आख़िर दुनिया को किस सिम्त ले जा रही है। तारीख़ गवाह है कि नफ़रत और इंतिक़ाम की फ़िक्र आख़िरकार सिर्फ़ इंसानी नुक़सान का सबब बनती है। आज अगर कोई क़ौम दूसरों को नुक़सान पहुँचाती है तो कल वही आग किसी और शक्ल में उसके दरवाज़े पर भी दस्तक दे सकती है। इसलिए असली रास्ता आख़िरकार अम्न, मुक़ालमा और इंसानी क़द्रों के एहतराम से ही निकलता है।

तारिक़ अज़ीम तनहा

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