हम जिस दौर में ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं, उसमें किसी भी मौज़ू पर दिल-ओ-दिमाग़ का मुतअस्सिर हो जाना बेहद आसान हो गया है। सोशल मीडिया का असर इस क़दर शदीद है कि इंसान को ख़ुद एहसास भी नहीं होता कि उसके अफ़कार किस तरह बदल रहे हैं। मैं इस पोस्ट के ज़रिए अपने तमाम नौजवान दोस्तों से अर्ज़ करना चाहता हूँ कि सोशल मीडिया के निज़ाम (एल्गोरिदम) को समझिए। जब आपके दिल में किसी मसले के बारे में कोई ख़याल पैदा होता है, तो क्या होता है? जैसे ही कोई रील या वीडियो जो आपके उन्हीं अफ़कार से मुताबक़त रखती है, आपके सामने आती है, आप ठहर कर उसे देखते हैं। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम उसी लम्हे इस अम्र को पकड़ लेता है। इसके बाद मुसलसल उसी किस्म की वीडियोज़ और रील्स आपकी फ़ीड में आने लगती हैं। इन फ़ीड्स में हक़ीक़त और गुमराही का ऐसा इम्तिजाज होता है कि धीरे-धीरे आपके दिल-ओ-दिमाग़ पर उन्हीं अफ़कार का ग़लबा होने लगता है। आप और ज़्यादा वीडियोज़ देखते जाते हैं, और फिर एक वक़्त ऐसा आता है कि आपका ज़ेहन मुकम्मल तौर पर मुतअस्सिर (ब्रेनवॉश) हो चुका होता है और आपको इसका एहसास भी नहीं होता। इसका नतीजा यह हो सकता है कि आप इज़्तिर...
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