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सोशल मीडिया का फ़ित्ना और ज़ेहनी आज़ादी की हिफ़ाज़त

हम जिस दौर में ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं, उसमें किसी भी मौज़ू पर दिल-ओ-दिमाग़ का मुतअस्सिर हो जाना बेहद आसान हो गया है। सोशल मीडिया का असर इस क़दर शदीद है कि इंसान को ख़ुद एहसास भी नहीं होता कि उसके अफ़कार किस तरह बदल रहे हैं। मैं इस पोस्ट के ज़रिए अपने तमाम नौजवान दोस्तों से अर्ज़ करना चाहता हूँ कि सोशल मीडिया के निज़ाम (एल्गोरिदम) को समझिए। जब आपके दिल में किसी मसले के बारे में कोई ख़याल पैदा होता है, तो क्या होता है? जैसे ही कोई रील या वीडियो जो आपके उन्हीं अफ़कार से मुताबक़त रखती है, आपके सामने आती है, आप ठहर कर उसे देखते हैं। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम उसी लम्हे इस अम्र को पकड़ लेता है। इसके बाद मुसलसल उसी किस्म की वीडियोज़ और रील्स आपकी फ़ीड में आने लगती हैं। इन फ़ीड्स में हक़ीक़त और गुमराही का ऐसा इम्तिजाज होता है कि धीरे-धीरे आपके दिल-ओ-दिमाग़ पर उन्हीं अफ़कार का ग़लबा होने लगता है। आप और ज़्यादा वीडियोज़ देखते जाते हैं, और फिर एक वक़्त ऐसा आता है कि आपका ज़ेहन मुकम्मल तौर पर मुतअस्सिर (ब्रेनवॉश) हो चुका होता है और आपको इसका एहसास भी नहीं होता। इसका नतीजा यह हो सकता है कि आप इज़्तिर...

तवील तहरीरों का फ़रेब: सोशल मीडिया में सियासी एक्टिविज़्म या फ़िक्र की तिजारत?

आज के दौर-ए-सोशल मीडिया में एक अजीब सा रुझान पैदा हो गया है। बहुत से लोग तवील तहरीरें लिखते हैं, या कहीं से कोई लंबा मज़मून नक़ल करके पेश कर देते हैं, और फिर खुद को “सियासी एक्टिविस्ट”, “मुफक्किर”, “तजज़िया-निगार” या “इंटेलेक्चुअल” के लिबास में पेश करते हैं। आम क़ारी जब ऐसी तहरीर पढ़ता है तो अक्सर एक वहम का शिकार हो जाता है। उसे महसूस होता है कि मज़मून बहुत लंबा है, अल्फ़ाज़ में कुछ साक़िलपन है, दरमियान-दरमियान कुछ तारीखी हवाले और गैर-मुल्की नाम भी मौजूद हैं, लिहाज़ा ज़रूर इसमें कोई गहरी हक़ीक़त छुपी होगी। लेकिन हक़ीक़त यह है कि तवील तहरीर का हक़ीक़त से कोई लाज़िमी ताल्लुक़ नहीं होता। कई मरतबा सबसे बड़े गुमान और ग़लतफ़हमियाँ उन्हीं तहरीरों के अंदर छुपी होती हैं जो ज़ाहिर में बहुत मुतास्सिर-कुन लगती हैं। सोशल मीडिया दरअसल एक नफ़्सियाती मैदान भी है। जब कोई बात दो-चार जुमलों में कही जाती है तो क़ारी उसे जल्द समझ लेता है और उस पर सवाल भी उठा देता है। मगर जब वही बात दो-तीन हज़ार अल्फ़ाज़ में बयान कर दी जाए, उसमें कुछ फ़लसफ़ियाना इस्तिलाहात, तारीखी वाक़ियात और जज़्बाती तर्ज़-ए-बयान शामिल कर ...