"ज़बान इंसान की पहचान हो सकती है, मगर उसकी औक़ात का पैमाना हरगिज़ नहीं। असल पैमाना उसका इल्म, उसका किरदार और उसकी सोच होती है।" हमारे समाज में एक अजीब-सी रवायत ने जन्म ले लिया है। जैसे ही कोई शख़्स अंग्रेज़ी में बात करता है, या किसी दूसरी ज़बान का इस्तेमाल करता है, कुछ लोग फ़ौरन एतराज़ करने लगते हैं "अपनी ज़बान में बात करो", "इतनी अंग्रेज़ी क्यों बोलते हो?", "क्या अंग्रेज़ी बोलने से बड़े आदमी बन जाओगे?" ऐसे सवाल दरअसल ज़बान से नहीं, बल्कि तंग-नज़री से पैदा होते हैं। ज़बान कभी मसला नहीं होती। ज़बान तो इल्म तक पहुँचने का ज़रिया है। जिस तरह एक दरिया समंदर तक पहुँचने का रास्ता बनता है, उसी तरह हर ज़बान इंसान को एक नई दुनिया, नए ख़यालात और नए मौक़ों तक ले जाती है। जो लोग इसे समझते हैं, वही दुनिया में आगे बढ़ते हैं; और जो नहीं समझते, वे दूसरों की तरक़्क़ी पर तंज़ करते रह जाते हैं। अगर कोई नौजवान बेहतरीन अंग्रेज़ी जानता है, कदीम उर्दू में शायरी कर सकता है, हिन्दी में बेहतरीन तहरीर लिख सकता है या किसी और ज़बान में अपने इल्म का इज़हार करता है, तो यह उसका ...
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