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Rauza-e-Anwar Ki Siyanat | 1400 Saal Se Roza-e-Rasool ﷺ Ki Hifazat Ka Tareekhi Safar

بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ) जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है।" الحمدُ للهِ ربِّ العالمين، والصلاةُ والسلامُ على سيدِ المرسلين، خاتمِ النبيين، رحمةٍ للعالمين، سيدِنا ومولانا Muhammad ﷺ، وعلى آله الأطهار، وأصحابه الأخيار، ومن تبعهم بإحسانٍ إلى يوم الدين. तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं, जो सारे जहानों का पालनहार है। और दुरूद व सलाम हों तमाम रसूलों के सरदार, आख़िरी नबी, सारे जहानों के लिए रहमत, हमारे सरदार व मौला मुहम्मद ﷺ पर, और उनकी पाक आल (परिवार), उनके नेक सहाबा, और उन सब पर जो क़यामत तक नेक़ी के साथ उनकी पैरवी करते रहें।" ﴿وَرَفَعْنَا لَكَ ذِكْرَكَ﴾ और हमने आपके लिए आपके ज़िक्र को बुलंद कर दिया।" यह महज़ एक आयत नहीं, बल्कि तारीख़-ए-आलम का वह फ़ैसला है जिसकी तस्दीक़ हर गुज़रता लम्हा करता चला आ रहा है। सदियाँ गुज़र गईं, मगर यह वादा हर दौर में नई शान के साथ जल्वागर होता रहा। आज क़रीब पंद्रह सदियाँ गुज़र चुकी हैं। कितनी ही सल्तनतें बरपा हुईं, कितने तख़्त-ओ-ताज ज़वाल का शिकार हुए, कितने फ़ातिहीन-ए-आलम ख़ाक में मिल गए, कि...