بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से (शुरू करता हूँ) जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम करने वाला है।"
الحمدُ للهِ ربِّ العالمين، والصلاةُ والسلامُ على سيدِ المرسلين، خاتمِ النبيين، رحمةٍ للعالمين، سيدِنا ومولانا Muhammad ﷺ، وعلى آله الأطهار، وأصحابه الأخيار، ومن تبعهم بإحسانٍ إلى يوم الدين.
तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं, जो सारे जहानों का पालनहार है। और दुरूद व सलाम हों तमाम रसूलों के सरदार, आख़िरी नबी, सारे जहानों के लिए रहमत, हमारे सरदार व मौला मुहम्मद ﷺ पर, और उनकी पाक आल (परिवार), उनके नेक सहाबा, और उन सब पर जो क़यामत तक नेक़ी के साथ उनकी पैरवी करते रहें।"
﴿وَرَفَعْنَا لَكَ ذِكْرَكَ﴾
और हमने आपके लिए आपके ज़िक्र को बुलंद कर दिया।"
यह महज़ एक आयत नहीं, बल्कि तारीख़-ए-आलम का वह फ़ैसला है जिसकी तस्दीक़ हर गुज़रता लम्हा करता चला आ रहा है। सदियाँ गुज़र गईं, मगर यह वादा हर दौर में नई शान के साथ जल्वागर होता रहा।
आज क़रीब पंद्रह सदियाँ गुज़र चुकी हैं। कितनी ही सल्तनतें बरपा हुईं, कितने तख़्त-ओ-ताज ज़वाल का शिकार हुए, कितने फ़ातिहीन-ए-आलम ख़ाक में मिल गए, कितने ऐसे थे जिनके इशारे पर लाखों सिपहसालार तलवारें खींच लिया करते थे; मगर आज उनकी क़ब्रों का निशान भी अहल-ए-तारीख़ के सिवा किसी को मालूम नहीं। लेकिन एक ज़ात ऐसी है जिसके दर-ए-अक़्दस पर वक़्त भी अदब से गुज़रता है।
वह ज़ात, जिनके बारे में ख़ालिक़-ए-कायनात ने फ़रमाया:
﴿وَرَفَعْنَا لَكَ ذِكْرَكَ﴾
जिसका मतलब है कि; और हमने आपके लिए आपके ज़िक्र को बुलंद कर दिया
632 ईस्वी में जब सरकार-ए-दो आलम ﷺ का विसाल हुआ तो आपको उसी हुजरा-ए-मुबारका में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया जहाँ आपने अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी लम्हात गुज़ारे। यही मुक़ाम आज रौज़ा-ए-अनवर कहलाता है। बाद में अबु बक्र और उमर इब्न अल खत्ताब को भी उसी हुजरे में दफ़्न किया गया।
उस रोज़ से लेकर आज तक यह मुक़द्दस मक़ाम उम्मत की अकीदत, तअज़ीम और मोहब्बत का मरकज़ बना हुआ है।
हर दौर के मुसलमान हुक्मरानों ने इस मुक़द्दस मक़ाम की हुरमत और सियानत को अपनी ज़िम्मेदारी समझा। उमय्यद दौर में उमर इब्न अब्दुल अजीज़ ने मस्जिद-ए-नबवी की तौसीअ के दौरान हुजरा-ए-मुबारका के इर्द-गिर्द एक महफ़ूज़ दीवार तामीर करवाई ताकि किसी तरह की बेअदबी का इम्कान न रहे। बाद के अदवार में ममलूक सल्तनत और ख़िलाफ़त ए उस्मानिया ने भी इस मुक़द्दस मक़ाम की तामीर, तरमीम और निगहबानी में ग़ैर-मामूली एहतिमाम किया।
तारीख़ गवाह है कि मस्जिद-ए-नबवी ने आग के हादसात भी देखे, तौसीअ भी देखी, तामीर-ए-नौ भी देखी; मगर हर बार अहल-ए-इस्लाम ने पहले से ज़्यादा अदब और एहतिराम के साथ इसकी ख़िदमत को अपना शरफ़ समझा।
आज भी रौज़ा-ए-अनवर की निगहबानी का बाक़ायदा निज़ाम मौजूद है। लेकिन एक मोमिन का ईमान महज़ ज़ाहिरी अस्बाब पर मौक़ूफ़ नहीं। उसका यक़ीन इससे कहीं बुलंद है। वह जानता है कि जिस हस्ती के ज़िक्र की बुलंदी की ज़िम्मेदारी ख़ुद रब्बुल-आलमीन ने ली हो, उसकी हिफ़ाज़त का अस्ल निगहबान भी वही है।
दुनिया की बड़ी से बड़ी सल्तनतें अपने सदूर, रियासतों के सरबराह, बादशाहों और वुज़रा-ए-आज़म की हिफ़ाज़त पर अरबों डॉलर ख़र्च करती हैं। बख़्तरबंद क़ाफ़िले, ख़ुसूसी सिक्योरिटी दस्ते, हवाई निगहबानी, ख़ुफ़िया इदारे और कई तहों पर मुश्तमिल हिफ़ाज़ती निज़ाम उनके लिए मुक़र्रर किए जाते हैं। मसलन, US के President की हिफ़ाज़त United States Secret Service करती है, जिसे दुनिया के सबसे पेशेवर हिफ़ाज़ती इदारों में शुमार किया जाता है। मगर यह तमाम इंतिज़ाम उस शख़्स की दुनियावी ज़िंदगी और उसके ओहदे तक महदूद होते हैं। इख़्तियार बदलता है, ज़िम्मेदारियाँ बदलती हैं और हिफ़ाज़ती निज़ाम भी अपने क़वानीन के मुताबिक़ बदल जाता है। फिर उसके बाद जब 04 साल बाद वह हट जाता है तो सिक्योरिटी भी हटा ली जाती है क्योंकि अब दूसरा प्रेसिडेंट होता है।
लेकिन जो चीज़ आज तक नहीं बदली है वो है रौज़ा-ए-अनवर की हुरमत का सिलसिला जो के सदियों से जारी है। कितने हज़ार हा सिपाही उनका ख़्याल करते है, हर दौर में उनकी निगहबानी की गई, हर दौर में उसकी तअज़ीम को बरक़रार रखा गया, और हर दौर में दुनिया के कोने-कोने से आने वाले आशिक़ान-ए-रसूल ﷺ ने अदब के साथ सलाम अर्ज़ किया।
मैं भी घूमता हूं, फिरता हूँ पढ़ता हूं मज़हबों के बारे में और कोशिश करता हूं कि और मज़हबों की ऐसी हस्ती का कोई सबूत मिले जिसे उन्होंने संजो कर रखा हो, तो नहीं मिलता तभी यह कहना बिल्कुल दुरुस्त है कि रौज़ा-ए-अनवर की तअज़ीम, उसकी मुसलसल सियानत, और उसके साथ उम्मत-ए-मुस्लिमा का जज़्बा-ए-मोहब्बत अपनी कैफ़ियत और वुसअत में बेहद नादिर और बे-मिसाल नज़र आता है।
कौन-सी सल्तनत है जो चौदह सदियाँ एक ही एहतराम के साथ बाक़ी रही?
कौन-सा तख़्त है जो इतनी मुद्दत तक अपनी शान पर क़ायम रहा?
मगर यह वह दर है जहाँ सदियाँ सर झुकाकर गुज़रती हैं।
यह वह चौखट है जहाँ बादशाह भी गदागरों की तरह हाज़िर होते हैं।
यह वह मुक़ाम है जहाँ सलाम पढ़ते हुए लब काँपते हैं, निगाहें झुक जाती हैं और दिल गवाही देता है कि यह महज़ एक मक़बरा नहीं, बल्कि महबूब-ए-किब्रिया ﷺ का रौज़ा-ए-अक़्दस है।
اللهم صل وسلم وبارك على سيدنا محمد وعلى آله وصحبه أجمعين
तारिक़ अज़ीम तनहा
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