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हिज्र, याद और टूटे आँगन की ग़ज़ल – एक दर्द-आलूद रूहानी सफ़र | तारिक़ अज़ीम ‘तनहा’ | Tariq Azeem Tanha

मेरी यह ग़ज़ल दरअसल किसी एक भाव या स्थिति की कथा नहीं, बल्कि एक पूरे भीतरी संसार का दस्तावेज़ है, जहाँ इश्क़ केवल मोहब्बत नहीं रहता, बल्कि एक दार्शनिक पीड़ा में बदल जाता है। मेरे नज़दीक यह ग़ज़ल उस इंसान की आवाज़ है जो बाहर की दुनिया में मौजूद होकर भी भीतर से लगातार विस्थापित होता रहता है। मैंने इस ग़ज़ल में हिज्र को केवल जुदाई नहीं माना, बल्कि उसे एक अस्तित्वगत स्थिति (existential state) की तरह देखा है, जहाँ इंसान अपने ही भीतर अजनबी हो जाता है।

इस ग़ज़ल का केंद्रीय ताना-बाना “तन्हाई”, “याद” और “टूटे हुए संबंधों” के बीच बुना गया है। हर शेर एक ऐसा दरवाज़ा है जो किसी न किसी बंद कमरे की तरफ खुलता है, जहाँ कभी बचपन है, कभी आँगन है, कभी गुलशन है, और कभी केवल राख।

यह ग़ज़ल रूमानी होते हुए भी महज़ रूमानी नहीं रहती, इसमें तसव्वुफ़ की एक हल्की सी परछाईं भी है, जहाँ प्रेम बाहरी नहीं, भीतरी यात्रा बन जाता है। हर “उसे कहना” दरअसल संवाद नहीं, बल्कि एक मौन प्रार्थना है, एक अनकही फ़रियाद है जो हवाओं में तैरती रहती है।

ग़ज़ल में प्रतीकों (अलामात) का बहुत सूक्ष्म प्रयोग किया हैआँगन, बचपन, गुलशन, सावन, बारिश और अश्क, ये सब केवल प्राकृतिक या भावनात्मक शब्द नहीं हैं, बल्कि स्मृति के विभिन्न स्तर हैं। हर प्रतीक अपने भीतर एक टूटी हुई दुनिया को समेटे हुए है।

लहजे की बात करूँ तो इसमें एक गहरी नर्मी है, लेकिन वह नर्मी भीतर से बेहद तीक्ष्ण है। यह वह दर्द है जो चीखता नहीं, बल्कि धीरे-धीरे आत्मा में रिसता है। यही इस ग़ज़ल की असली फ़िक्र है, मौन पीड़ा का सौंदर्य। ग़ज़ल पढ़िए -

रुस्वा न करे इश्क़ को दुश्मन, उसे कहना

रखना है मुहब्बत का भी दामन, उसे कहना


वीरान मिरे घर में है बचपन उसे कहना

लौटा दे अगर चाहे वो आँगन उसे कहना


महफ़िल में तिरी हो जो मिरा ज़िक्र-ए-सुख़न तो

रखता है मुझे ज़िंदा मिरा फ़न, उसे कहना


आँखों ने कई बार लिखे हिज्र के क़िस्से

पढ़ ले कभी अश्कों का ये दर्शन, उसे कहना


शब भर जो तड़पता है वो दीवाना-ए-दिल है

उलझा हुआ रहता है बहुत मन उसे कहना


पत्थर से भला दिल को बचाए भी तो कब तक

बरसाए कभी प्यार की चिलमन, उसे कहना


महफ़िल में बहुत लोग हैं बस उसके दिवाने

होता नहीं हर शख़्स मुहिब्बन, उसे कहना


महफ़िल में भी रहता है अकेला सा कोई शख़्स

टूटा है मेरे ख़्वाबों का गुलशन उसे कहना


दिल चाक है और चाक-गरेबाँ भी हूँ लेकिन

बाक़ी है अभी शौक़ का दामन, उसे कहना


हर सिम्त तिरी याद का फैला है गुलिस्ताँ

वीरान नहीं है मिरा गुलशन, उसे कहना


हर मोड़ पे तक़दीर ने तड़पाया है मुझको

आसान नहीं होता है जीवन, उसे कहना


आँखों में लिए फिरता हूँ बरसों से यूँ बारिश

बनता नहीं अश्कों से कभी बन, उसे कहना


वीरान मिरे दिल में कई ख़्वाब पड़े हैं

आ कर कभी कर जाए वो गुलशन, उसे कहना


हर ज़ख़्म ज़माने का हुनर बन के खुला है

दुश्वार नहीं दर्द का दर्पन, उसे कहना


दिन-रात तिरे हिज्र में जलता है मिरा दिल

मुमकिन हो तो लौटा दे वो सावन, उसे कहना


तन्हा की ग़ज़ल आज भी महकी है उसी से

ख़ुशबू है मिरी जान का बंधन, उसे कहना


जिस दिन से गया छोड़ के तन्हा को अकेला

वीरान पड़ा है मिरा आँगन, उसे कहना


तारिक़ अज़ीम तनहा


मेरे नज़दीक यह ग़ज़ल केवल शब्दों का संयोजन नहीं बल्कि एक टूटे हुए मन की आत्मकथा है। इसमें प्रेम भी है, विछोह भी है, स्मृति भी है और समय की क्रूर गति भी। हर शेर एक अलग दरवाज़ा खोलता है, लेकिन सभी दरवाज़े एक ही कमरे में पहुँचते हैं तन्हाई के कमरे में।

यह ग़ज़ल यह भी बताती है कि दर्द केवल विनाश नहीं करता, वह रचना भी करता है। हर ज़ख़्म यहाँ एक नए अर्थ का जन्म देता है। यही इस रचना की सबसे बड़ी फ़िक्र है, कि टूटना भी एक प्रकार की सृजन-प्रक्रिया है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि यह ग़ज़ल एक ऐसे दिल की आवाज़ है जो बिखरकर भी ख़ामोश नहीं होता, बल्कि हर टूटन में एक नया शेर पैदा करता है।

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