ज़िंदगी की तकमील, इश्क़ की तिश्नगी और वजूद के तज़ादात पर एक फ़िक्र-अंगेज़ ग़ज़ल
मेरी यह ग़ज़ल दरअसल किसी एक जज़्बे, एक तजुर्बे या एक ख़्वाहिश का बयान नहीं है। मैंने इसमें ज़िंदगी को उसकी मुकम्मल सूरत में देखने की कोशिश की है। अक्सर हम चीज़ों को उनके एक ही रुख़ से पहचानते हैं, रौशनी को रौशनी समझते हैं, दर्द को दर्द, इश्क़ को इश्क़ और तन्हाई को तन्हाई। लेकिन मेरे नज़दीक हक़ीक़त इससे कहीं ज़्यादा पेचीदा और दिलचस्प है। हर रौशनी के पीछे एक साया होता है, हर मुस्कुराहट के पीछे कोई ग़म, हर विसाल के पीछे कोई हिज्र, और हर मंज़िल के पीछे एक लंबा सफ़र। यही एहसास इस ग़ज़ल की बुनियाद बना।
मतले में मैंने हिज्र और उजाले को आमने-सामने रखा है। पहली नज़र में यह एक तज़ाद मालूम होता है, मगर ग़ौर कीजिए तो यही तज़ाद ज़िंदगी की अस्ल तकमील भी है। जुदाई की रात अगर बिल्कुल तारीक हो जाए तो इंसान उम्मीद खो बैठता है। इसलिए हिज्र को भी उजाले की ज़रूरत है। अश्क अगर आँख में क़ैद रह जाए तो उसका दर्द अधूरा रह जाता है, उसे दरिया बनकर बहना पड़ता है। इस तरह ग़ज़ल का पहला शेर ही पूरी ग़ज़ल की फ़िक्र का इशारा दे देता है हर चीज़ को अपनी तकमील के लिए किसी दूसरी चीज़ की ज़रूरत है।
ग़ज़ल में दिल और अक़्ल का मुक़ाबला भी सामने आता है। उर्दू शायरी की रिवायत में यह बहस सदियों पुरानी है, लेकिन मैंने उसे किसी फ़ैसले तक पहुँचाने की कोशिश नहीं की। दिल कहता है कि इश्क़ ही काफ़ी है, जबकि अक़्ल दुनिया की ज़रूरत याद दिलाती है। मेरे लिए दोनों आवाज़ें अहम हैं। इंसान न सिर्फ़ दिल है और न सिर्फ़ दिमाग़। वह इन दोनों के दरमियान चलने वाली एक मुसलसल कशमकश का नाम है।
इस ग़ज़ल में क़तरा और दरिया बार-बार एक अलामत की तरह सामने आते हैं। क़तरा फ़र्द है, दरिया कायनात। क़तरा ख़्वाहिश है, दरिया उसका इम्कान। मैंने यह कहने की कोशिश की है कि कोई भी वुसअत छोटी चीज़ों के बग़ैर मुकम्मल नहीं होती। दरिया लाख बड़ा हो, मगर आख़िर वह क़तरों का ही मजमूआ है। इसी तरह इंसानी समाज, इश्क़, तहज़ीब और रूहानी तजुर्बे भी छोटे-छोटे एहसासात और तजुर्बात से मिलकर बनते हैं।
ग़ज़ल के बीच में फ़क़्र, दरवेशी, मय-ए-बेख़ुदी और सुरूर का ज़िक्र आता है। यहाँ मेरा मक़सद सूफ़ियाना इस्तिआरों के ज़रिये एक ऐसी रूहानी कैफ़ियत को बयान करना था जिसमें आदमी अपने अहंकार से बाहर निकलकर किसी बड़ी हक़ीक़त का हिस्सा बन जाता है। मगर मैंने उस रूहानियत को भी एकतरफ़ा नहीं रहने दिया। दरवेश को सिर्फ़ फ़क़्र नहीं, सुरूर भी चाहिए। यानी रूहानी सफ़र में भी ज़िंदगी की गर्मी और कैफ़ियत ज़रूरी है।
मेरे नज़दीक ग़ज़ल का सबसे नाज़ुक मुक़ाम वह है जहाँ आशिक़ कहता है कि उसे सिर्फ़ विसाल की ख़्वाहिश नहीं, बल्कि हिज्र का कोई महकता हुआ ज़ख़्म भी चाहिए। यह शेर दरअसल दर्द की तअरीफ़ नहीं, बल्कि उसकी अहमियत का एहसास है। कुछ ज़ख़्म ऐसे होते हैं जो इंसान को तोड़ते नहीं, बल्कि उसे अपने बारे में ज़्यादा आगाह कर देते हैं। वे दर्द से ज़्यादा याद, तजुर्बा और पहचान बन जाते हैं।
ग़ज़ल का आख़िरी हिस्सा तन्हाई, इंतिज़ार और जुनूँ की दुनिया में दाख़िल होता है। यहाँ इश्क़ किसी मंज़िल पर ठहरने वाली चीज़ नहीं रह जाता, बल्कि एक मुसलसल हरकत बन जाता है। इश्क़ अगर ठहर जाए तो शायद इश्क़ नहीं रहता। उसे आगे बढ़ने के लिए जुनूँ भी चाहिए और तमाशा भी। यानी हैरत, तजस्सुस और तलाश की वह आग जो इंसान को लगातार सफ़र में रखती है।
आख़िरी शेर
1. "तन्हा नहीं ये इश्क़ फ़क़त नाम-ए-रौशनी,
इस शम्अ को धुएँ का लबादा भी चाहिए"
मेरे लिए पूरी ग़ज़ल का हासिल है। मैंने इस शेर में यह कहने की कोशिश की है कि हम अक्सर सिर्फ़ नतीजों से मोहब्बत करते हैं और उनकी क़ीमत को भूल जाते हैं। हमें रौशनी पसंद है, मगर धुएँ से शिकायत रहती है। हमें इश्क़ पसंद है, मगर दर्द नहीं। हमें कामयाबी चाहिए, मगर इम्तिहान नहीं। जबकि हक़ीक़त यह है कि शम्अ और धुआँ, इश्क़ और दर्द, ख़्वाब और ताबीर ये सब एक-दूसरे से जुदा नहीं किए जा सकते।
अगर इस ग़ज़ल का एक जुमले में ख़ुलासा करना हो तो मैं कहूँगा कि यह ग़ज़ल ज़िंदगी को उसके मुकम्मल तज़ादात के साथ क़ुबूल करने की दावत है। क्योंकि कभी-कभी रौशनी को समझने के लिए धुएँ को भी गले लगाना पड़ता है।
2. हिज्राँ की रात है तो उजाला भी चाहिए
आँखों को अश्क, अश्क को दरिया भी चाहिए
यह मतला पूरी ग़ज़ल की फ़िक्र का दरवाज़ा खोलता है। शायर यहाँ यह नहीं कहता कि हिज्र ख़त्म हो जाए, बल्कि यह कहता है कि हिज्र के अँधेरे में भी उम्मीद का कोई चराग़ मौजूद रहना चाहिए। इसी तरह अश्क महज़ एक आँसू नहीं, बल्कि एक ऐसा दर्द है जो अपने इज़हार और वुसअत का मुतालिबा करता है। "अश्क को दरिया चाहिए" कहना दरअसल दर्द की तकमील का इस्तिआरा है। छोटी कैफ़ियत अपने बड़े इज़हार की तलाश में है।
3. दिल ने कहा कि इश्क़ ही काफ़ी है राह में
अक़्ल-ए-फ़क़ीह बोली कि दुनिया भी चाहिए
यह शेर सदियों पुराने इश्क़ और अक़्ल के मुबाहिसे को एक नए अंदाज़ में पेश करता है। दिल इश्क़ को अंतिम सच्चाई मानता है, जबकि अक़्ल इंसानी ज़िम्मेदारियों और दुनियावी हक़ीक़तों की याद दिलाती है। ख़ूबसूरती यह है कि शायर किसी एक पक्ष को ग़ालिब नहीं करता। दोनों आवाज़ें अपने-अपने मक़ाम पर सही हैं। यही इंसानी वजूद की पेचीदगी है।
4. दिल को फ़क़त विसाल की ख़्वाहिश नहीं जनाब
हिज्राँ का कोई ज़ख़्म महकता भी चाहिए
यह शेर ग़ज़ल के सबसे नफ़ीस और गहरे अशआर में से एक है। आम तौर पर आशिक़ विसाल चाहता है और हिज्र से निजात चाहता है, लेकिन यहाँ आशिक़ हिज्र के ज़ख़्म की ख़ुश्बू भी चाहता है। इसका मतलब यह है कि दर्द को सिर्फ़ तकलीफ़ नहीं समझा गया, बल्कि उसे रूहानी और जज़्बाती परिपक्वता का ज़रिया माना गया है। कुछ ज़ख़्म ऐसे होते हैं जो भर जाने के बाद भी अपनी ख़ुश्बू छोड़ जाते हैं।
5. ख़ामोशियों की ख़ाक से उगते हैं कुछ गुलाब
कुछ बात को लबों का तक़ाज़ा भी चाहिए
यह शेर इंसानी तअल्लुक़ात की एक बड़ी सच्चाई बयान करता है। बहुत-सी बातें ख़ामोशी में जन्म लेती हैं, मगर हर एहसास को हमेशा ख़ामोश नहीं रखा जा सकता। कुछ जज़्बात ऐसे होते हैं जिन्हें अल्फ़ाज़ की ज़रूरत पड़ती है। "ख़ामोशियों की ख़ाक" और "गुलाब" का तअल्लुक़ इस शेर को बेहद ताज़ा और असरअंगेज़ बना देता है।
6. जल्वा अगर अयाँ है तो फिर पर्दा किस लिये
पर्दा अगर है, हुस्न का जलवा भी चाहिए
यह शेर उर्दू-फ़ारसी शायरी के उस रिवायती तसव्वुर को नए अंदाज़ में पेश करता है जहाँ हुस्न और पर्दा एक साथ मौजूद रहते हैं। यहाँ शायर दरअसल ज़ाहिर और बातिन, तजल्ली और हिजाब, मआरिफ़त और रहस्य के रिश्ते पर बात कर रहा है। अगर हर चीज़ पूरी तरह ज़ाहिर हो जाए तो हैरत मर जाती है, और अगर हर चीज़ पूरी तरह पर्दे में रहे तो तलाश ख़त्म हो जाती है। ज़िंदगी इन दोनों के दरमियान की कैफ़ियत है।
नीचे यह ग़ज़ल उर्दू, देवनागरी और रोमन उर्दू तीनों लिपियों में पोस्ट की जा रही है ताकि दुनिया भर के क़ारिईन अपनी सहूलत और पसंद के अनुसार इसका मुतालआ कर सकें।
ہجراں کی رات ہے تو اُجالا بھی چاہیے
آنکھوں کو اشک، اشک کو دریا بھی چاہیے
دل نے کہا کہ عشق ہی کافی ہے راہ میں
عقلِ فقیہ بولی کہ دنیا بھی چاہیے
قطرہ اگر ہے شوق تو دریا کا رنگ لے
دریا کو اپنے درد کا قطرہ بھی چاہیے
صحرا میں رہگزر کا پتہ کیا ملے بھلا
پاؤں کو گردِ شوق کا دریا بھی چاہیے
ہم نے تو خود کو آگ میں رکھا ہے عمر بھر
اب روح کو کچھ آبِ مصفّا بھی چاہیے
وہ فقر کیا کہ جس میں نہ ہو کیفِ بے خودی
درویش کو سرور کا صدمہ بھی چاہیے
دل کو فقط وصال کی خواہش نہیں جناب
ہجراں کا کوئی زخم مہکتا بھی چاہیے
ساقی نے جب پلائی مئےِ بے خودی مجھے
ہوشِ خرد کو اور کشادہ بھی چاہیے
رسوائیوں کا تاج تو سر پر سجا لیا
اب اس کے ساتھ تھوڑا سا چرچا بھی چاہیے
خاموشیوں کی خاک سے اُگتے ہیں کچھ گلاب
کچھ بات کو لبوں کا تقاضا بھی چاہیے
جلوہ اگر عیاں ہے تو پھر پردہ کس لیے
پردہ اگر ہے، حسن کا جلوہ بھی چاہیے
تاریکیوں کا ذکر بہت کر چکے ہیں ہم
اب روشنی کا کوئی حوالہ بھی چاہیے
اہلِ وفا کو صرف جفائیں نہیں ملیں
اک لمحۂ کرم کا اشارہ بھی چاہیے
تنہا کھڑا ہوں دشت میں صدیوں سے منتظر
آواز کے لیے کوئی سایہ بھی چاہیے
تنہا کسی مقام پہ ٹھہرا نہیں ہے عشق
اس کو جنوں کے ساتھ تماشا بھی چاہیے
تنہا نہیں یہ عشق فقط نامِ روشنی
اس شمع کو دھوئیں کا لبادہ بھی چاہیے
— طارق عظیمؔ تنہا
हिज्राँ की रात है तो उजाला भी चाहिए
आँखों को अश्क, अश्क को दरिया भी चाहिए
दिल ने कहा कि इश्क़ ही काफ़ी है राह में
अक़्ल-ए-फ़क़ीह बोली कि दुनिया भी चाहिए
क़तरा अगर है शौक़ तो दरिया का रंग ले
दरिया को अपने दर्द का क़तरा भी चाहिए
सहरा में रहगुज़र का पता क्या मिले भला
पाँवों को गर्द-ए-शौक़ का दरिया भी चाहिए
हम ने तो ख़ुद को आग में रक्खा है उम्र भर
अब रूह को कुछ आब-ए-मुसफ़्फ़ा भी चाहिए
वो फ़क़्र क्या कि जिस में न हो कैफ़-ए-बेख़ुदी
दरवेश को सुरूर का सदमा भी चाहिए
दिल को फ़क़त विसाल की ख़्वाहिश नहीं जनाब
हिज्राँ का कोई ज़ख़्म महकता भी चाहिए
साक़ी ने जब पिलाई मय-ए-बे-ख़ुदी मुझे
होश-ए-ख़िरद को और कुशादा भी चाहिए
रुस्वाइयों का ताज तो सर पर सजा लिया
अब इस के साथ थोड़ा-सा चर्चा भी चाहिए
ख़ामोशियों की ख़ाक से उगते हैं कुछ गुलाब
कुछ बात को लबों का तक़ाज़ा भी चाहिए
जल्वा अगर अयाँ है तो फिर पर्दा किस लिये
पर्दा अगर है, हुस्न का जल्वा भी चाहिए
तारीकियों का ज़िक्र बहुत कर चुके हैं हम
अब रौशनी का कोई हवाला भी चाहिए
अहल-ए-वफ़ा को सिर्फ़ जफ़ाएँ नहीं मिलें
इक लम्हा-ए-करम का इशारा भी चाहिए
तन्हा खड़ा हूँ दश्त में सदियों से मुन्तज़िर
आवाज़ के लिए कोई साया भी चाहिए
तन्हा किसी मक़ाम पे ठहरा नहीं है इश्क़
इसको जुनूँ के साथ तमाशा भी चाहिए
तन्हा नहीं ये इश्क़ फ़क़त नाम-ए-रौशनी
इस शम्अ को धुएँ का लबादा भी चाहिए
— तारिक़ अज़ीम 'तनहा'
Hijraan ki raat hai to ujala bhi chahiye
Aankhon ko ashk, ashk ko dariya bhi chahiye
Dil ne kaha ke ishq hi kaafi hai raah mein
Aql-e-faqeeh boli ke duniya bhi chahiye
Qatra agar hai shauq to dariya ka rang le
Dariya ko apne dard ka qatra bhi chahiye
Sehra mein rahguzar ka pata kya mile bhala
Paanvon ko gard-e-shauq ka dariya bhi chahiye
Hum ne to khud ko aag mein rakkha hai umr bhar
Ab rooh ko kuch aab-e-musaffa bhi chahiye
Wo faqr kya ke jis mein na ho kaif-e-bekhudi
Darvesh ko suroor ka sadma bhi chahiye
Dil ko faqat visaal ki khwahish nahin janaab
Hijraan ka koi zakhm mehakta bhi chahiye
Saqi ne jab pilayi mai-e-bekhudi mujhe
Hosh-e-khirad ko aur kushada bhi chahiye
Ruswaiyon ka taaj to sar par saja liya
Ab is ke saath thoda sa charcha bhi chahiye
Khamoshiyon ki khaak se ugte hain kuch gulaab
Kuch baat ko labon ka taqaza bhi chahiye
Jalwa agar ayaan hai to phir parda kis liye
Parda agar hai, husn ka jalwa bhi chahiye
Tarikiyon ka zikr bahut kar chuke hain hum
Ab roshni ka koi hawala bhi chahiye
Ahl-e-wafa ko sirf jafayen nahin milen
Ik lamha-e-karam ka ishara bhi chahiye
Tanha khada hoon dasht mein sadiyon se muntazir
Aawaz ke liye koi saya bhi chahiye
Tanha kisi maqam pe thahra nahin hai ishq
Isko junoon ke saath tamasha bhi chahiye
Tanha nahin ye ishq faqat naam-e-roshni
Is sham'a ko dhuen ka libada bhi chahiye
— Tariq Azeem 'Tanha'
मेरे लिए यह ग़ज़ल महज़ इश्क़ की ग़ज़ल नहीं है। यह उस इंसानी तलाश का बयान है जो हर चीज़ की तकमील चाहती है। इसमें दर्द है मगर दर्द की शिकायत नहीं; इसमें हिज्र है मगर मायूसी नहीं; इसमें फ़क़्र है मगर ख़ुश्की नहीं; इसमें इश्क़ है मगर अक़्ल का इंकार नहीं।
ग़ज़ल का सबसे अहम पहलू यह है कि यह हमें ज़िंदगी को एकतरफ़ा न देखने की दावत देती है। हर उजाले के पीछे कोई साया है, हर ख़ुशी के पीछे कोई इम्तिहान, हर विसाल के पीछे कोई हिज्र और हर शम्अ के साथ कोई धुआँ। शायद इंसानी हिकमत का पहला सबक़ यही है कि हम चीज़ों को उनकी मुकम्मल सूरत में क़ुबूल करना सीखें।
यही वजह है कि यह ग़ज़ल इश्क़ की दास्तान होने के साथ-साथ ज़िंदगी के फ़लसफ़े का बयान भी बन जाती है।
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