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अक्स-ए-रुख़्सार तिरा आब-ए-रवाँ में उतरे,

अक्स-ए-रुख़्सार तिरा आब-ए-रवाँ में उतरे, चाँद पानी में नहाएगा तो छा जाएगा। दिल के वीरान शबिस्ताँ में तिरी याद का चाँद, रौशनी बन के जो आएगा तो छा जाएगा। दश्त-ए-इम्काँ में बहुत ख़ाक उड़ाई सब ने, इश्क़ जब ख़ेमे लगाएगा तो छा जाएगा। सिर्फ़ जीने से कहाँ होती है पहचान कोई, दर्द को फ़न में जो लाएगा तो छा जाएगा। ताज वालों को हमेशा यही धोका है कि बस, ख़ौफ़ से मुल्क चलाएगा तो छा जाएगा। जाम-ए-जम भी तिरी आँखों का मुक़ाबिल न हुआ, कोई साक़ी इन्हें पाएगा तो छा जाएगा। दश्त-ए-ग़ुर्बत में कोई नक़्श-ए-क़दम मिल जाए, कारवाँ राह पे आएगा तो छा जाएगा। नर्गिस-ए-शौक़ को दीदार की बारिश दे दे, फूल हर सिम्त खिलाएगा तो छा जाएगा। बज़्म-ए-अहबाब में तेरी ही सना होगी कभी, कोई तेरा ज़िक्र उठाएगा तो छा जाएगा। तेरी आँखों में जो देखेगा समन्दर का वक़ार, अपनी हस्ती को भुलाएगा तो छा जाएगा। बू-ए-गुल, रंग-ए-सहर, नूर-ए-कमर सब हैं मगर, तू निगाहों में समाएगा तो छा जाएगा। तेरे रुख़्सार की ताबिन्दगी ऐसी है कि माह, अपनी किरनों को झुकाएगा तो छा जाएगा। हुस्न जब पर्दा-ए-रंगीं से निकल कर शब में, जल्वा-ए-ख़ास दिखाएगा तो छा जाएगा। 'तन्ह...
  तो आप शाइरी सीखना चाहते हैं? अब ये कोई सिलेबस को पढ़ने की तरह सीधा सीधा काम होता तो हर साल शाइर झुँड में ग्रैजुएट होते। पर ऐसा भी नहीं कि ये इतना मुश्किल है। मुश्किल यहाँ शाइरी के नियम कतई नहीं हैं, बल्कि मुश्किलात नियम सीखने के बाद अपने अंदर शाइरी लाने की है। ज़्यादातर लोगों के अंदर शाइरी जाना ही नहीं चाहती। ऐसा इसलिए क्यूँकि वो अकेले नहीं जी सकते, वो अपने आप से बाहर दुनिया नहीं देख सकते, ज़्यादातर लोग बस लोग होते हैं, शाइर नहीं। हर आदमी जिसको ये लगता है कि उसके लिए सबसे ज़रूरी आदमी वो खु़द है, वो कभी शाइरी नहीं कर सकता। न ही वो कर सकता है जिसे आज तक मालूम ही नहीं चला कि उसे महसूस होता क्या है और क्या नहीं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने शाइरी के नियम तो जान लिए पर शाइरी की समझ कभी न पा सके। पर उन्होंने हार नहीं मानी, वो शेर कहते रहे। मुझे ऐसे लोग निहाँ फिज़ूल लगते हैं। अगर आपको पता चलता है कि आप कभी शाइर नहीं हो सकते तो क्यों मानव जाति का वक्त बर्बाद कर रहे हैं, हराम की ज़िन्दगी की तलब़ क्यों है आपको। जाइए कुछ और रोज़गार देखिए।  खैर जिन लोगों को ये जानना है कि शाइरी कब की जा...