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सोशल मीडिया का दौर और अदब की गिरती पहचान

दोस्तो - आप सब से एक दिल की बात कहने का मन है सो कर  रहा हूं । पिछले कुछ अरसे से महसूस कर रहा हूं के सोशल मीडिया अगर अदब और शायरी और संगीत के हक़ में ज़ियादा फायदेमंद साबित हुआ है तो उससे कहीं ज़ियादा नुक़सान दायक भी हुआ है । उन शायरों और सिंगर्स के लिए जो बहुत बेहतरीन शायर हैं, गायक है लेकिन उन्हें वो मक़ाम  वो प्लेटफॉर्म नहीं मिला जो मिलना चाहिए था । ये सब पहले भी होता आया होगा।  मगर आज कल बहुत ज़ियादा देखने को मिल रहा है । हैरानी इस बात की है अधिकतर नॉर्मल और  फूहड़ शायरों और कवियों ने मुशायरों पर कब्ज़ा किया हुआ है। नादान कन्वीनर भी इस बात के ज़िम्मेदार हैं जिन्हें शायरी की गहरी समझ नहीं बस किसी भी शायर की रील के व्यूअर्स देख कर उसको बेहतरीन शायर या कवि समझ लेते है । या किसी मारुफ़ शायर के कहने पर उस शायर,शायरात, कवि को लगातार मुशायरों में कलाम पेश करने का मौक़ा देते रहते हैं । ये उनके लिए तो बहुत अच्छी बात हो सकती है लेकिन इसका नुक़सान ये होता है के आम इंसान जो शायरी को पसंद तो करते है मगर बेहतरीन शायरी से जुदा और महदूद रह जाते हैं उनको लगता है वो जो शायरी मुशायरों...

फिल्मी गानों की तकती बहर पार्ट-1

फ़िल्मी गानों की तकती के कुछ उदाहरण ....           1222 1222 1222 1222                             ( hazaj musamman salim ) (१) -#बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है |       -#किसी पत्थर की मूरत से महोब्बत का इरादा है       -#भरी दुनियां में आके दिल को समझाने कहाँ जाएँ       -#चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों       *ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर , कि तुम नाराज न होना       -#कभी पलकों में आंसू हैं कभी लब पे शिकायत है |        -#  ख़ुदा भी आस्मां से जब ज़मीं पर देखता होगा        *ज़रा नज़रों से कह दो जी निशाना चूक न जाए |        *मुहब्बत ही न समझे वो जालिम प्यार क्या जाने |        *हजारों ख्वाहिशें इतनी कि हर ख्वाहि...