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जंग की नई सूरत: लंबी जंग, सख़्त निज़ाम और बढ़ती आग का बयानिया

कुर्सी की पेटी बाँध लीजिए, क्योंकि जो मंजर अब उभर रहा है, वह किसी जल्द ख़त्म होने वाली जंग का नहीं, बल्कि एक तवील (Long) और पेचीदा मरहले (Phase) की इब्तिदा (Beginning) है। फ़िज़ा में जो तनाव है, वह ठहरने के बजाय हर गुज़रते लम्हे के साथ और शदीद होता जा रहा है, और हालात यह इशारा दे रहे हैं कि अब यह टकराव एक मुकम्मल जंग (Full-scale Conflict) की शक्ल इख़्तियार कर सकता है। ईरान ने अपने अम्नी निज़ाम (Security Structure) के अहम चेहरों की हलाकत (Elimination) को तस्लीम (Accept) कर लिया है, और इसके साथ ही यह पैग़ाम भी दे दिया है कि जवाब ज़रूर आएगा—और वह पहले से कहीं ज़्यादा सख़्त और असरअंदाज़ होगा। मगर इस पूरे वाक़िये का असल पहलू यह है कि इन नुक़्सानात (Losses) के बावजूद ईरान की फौजी मशीनरी (Military Machine) में कोई इन्किसार (Collapse) नज़र नहीं आता। इसकी वजह साफ़ है यह निज़ाम अफ़राद (Individuals) पर नहीं, बल्कि एक मुकम्मल ढांचे (System) पर क़ायम है, जिसकी मिसाल Islamic Revolutionary Guard Corps जैसे इदारों से मिलती है, जहाँ हर ओहदे के लिए मुनासिब जानशीन (Successor) पहले से तय होता है। यानी यहा...

हक़ीक़त बनाम हेडलाइन: क्या वाक़ई ईरान हिल गया या सिर्फ़ एक सियासी बयानिया?

सुबह की पहली रोशनी के साथ जब आँख खुली तो फ़िज़ा में वही शोर गूंज रहा था—हमले, कमांडरों की मौत, और यह दावा कि ईरान की कमर टूट गई। एक लम्हे के लिए लगा कि जैसे पूरी कहानी यहीं खत्म हो गई हो, लेकिन जब ज़रा तअम्मुल (गौर) से देखा, तो एहसास हुआ कि यह हक़ीक़त से ज़्यादा एक बयानिया (narrative) है, जो हेडलाइनों की गर्मी में ढल रहा है। बेशक हमला हुआ, और ऐसा हुआ जो अपनी बारीकी (precision) और असरअंदाज़ी में कम नहीं था। बड़े ओहदेदार मारे गए, और किसी भी निज़ाम के लिए यह एक सदमा होता है कि उसके अहम चेहरे अचानक गायब हो जाएँ। लेकिन सवाल यह है कि क्या चेहरों के चले जाने से पूरा जिस्म भी गिर जाता है? क्या एक सर के कटने से बदन सांस लेना छोड़ देता है? हक़ीक़त यह है कि हर मजबूत निज़ाम अपने आपको सिर्फ अफ़राद (individuals) पर नहीं, बल्कि एक मुकम्मल ढांचे (structure) पर खड़ा करता है। इसी लिए Islamic Revolutionary Guard Corps जैसा इदारा अपनी तश्कील में इस कदर मुस्तहकम है कि अगर एक कड़ी टूटे, तो दूसरी फौरन उसकी जगह ले लेती है। यहाँ फैसले सिर्फ शख्सियतों से नहीं, बल्कि पहले से तयशुदा उसूलों, ज़ंजीर-ए-क...

ईरान की हिकमत-ए-अमली: क़ीमत-ए-नफ़्त (Crude Oil Prices) $200 प्रति बैरल तक — जंग-ए-मुआशियाती (Economic Warfare) का असली मक़सद

मशरिक़-ए-औसत की सियासत और जंगों की तारीख़ बार-बार इस हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करती रही है कि हर मुक़ाबला सिर्फ़ मैदान-ए-जंग में तय नहीं होता। कई बार असल फ़ैसला तोप, मिसाइल और जहाज़ों से नहीं बल्कि मुआशियात (Economy) के ज़रिये होता है। आज ईरान ने बिल्कुल वही रास्ता इख़्तियार किया है जो ज़ाहिर में कमज़ोर मालूम होता है मगर दरअस्ल एक गहरी हिकमत-ए-अमली पर मबनी है। चंद रोज़ पहले तक अक्सर लोग ये समझ रहे थे कि इसराइल ने ईरान की दिफ़ा-ए-फ़िज़ा (Air Defense) का बड़ा हिस्सा तबाह कर दिया है और अब क़िस्सा ख़त्म हो चुका है। तजज़िया करने वाले अफ़राद और आम लोग दोनों इस गुमान में थे कि जंग का नतीजा लगभग वाज़ेह है। मगर यह तसव्वुर शायद जंग की असल फ़ितरत को समझने में एक बड़ी ग़लती थी। ईरान का मक़सद इस मुक़ाबले को रिवायती मायनों में जीतना नहीं है। तेहरान की क़ियादत इस जंग को इतना महँगा बनाना चाहती है कि फ़तह (Victory) ख़ुद बे-मानी हो जाए। यह दो बिल्कुल मुख़्तलिफ़ खेल हैं और बहुत से लोग अब भी इस फ़र्क़ को समझ नहीं पा रहे। ईरान अब सिर्फ़ अस्करी मुक़ाबला नहीं कर रहा। दरअस्ल यह जंग-ए-मुआशियाती (Economic Warfare) ...

क्या पश्चिमी एशिया में अमरीकी असर का दौर ख़त्म हो रहा है?

▪️इस्राइली सहाफ़ी अलोन मिज़राही ने अपने एक तजज़िये में लिखा है: “हम तारीख़ को अपनी आँखों के सामने वक़ूअ पज़ीर होते देख रहे हैं। तमाम तवक़्क़ोआत के बरअक्स, ईरान इस वक़्त अमरीकी फ़ौजी अड्डों को इस क़दर गहराई और इस क़दर फ़ैसला-कुन अंदाज़ में निशाना बना रहा है कि दुनिया अभी तक इस मंजर को समझने के लिए तैयार ही नहीं। सिर्फ़ चार रोज़ के अंदर ईरान ने पूरे इलाक़े में अपने फ़ौजी असर-ओ-रसूख़ का दायरा काफ़ी वसीअ कर लिया है। ईरान ने दुनिया के सबसे क़ीमती और महंगे फ़ौजी अड्डों, अस्लाहे और निज़ामात को अपना निशाना बनाया है। बहरीन, कुवैत, क़तर और सऊदी अरब में मौजूद अमरीकी अड्डे दुनिया के सबसे बड़े और अहम अस्करी ठिकानों में शुमार किए जाते हैं। इन्हें तामीर करने में कई दशकों की मेहनत और खरबों डॉलर की सरमायाकारी शामिल रही है। यूँ समझिए कि तीस बरस से ज़्यादा के अस्करी इख़राज़ात का बड़ा हिस्सा अब धुएँ में तब्दील होता नज़र आ रहा है। हम देख रहे हैं कि करोड़ों डॉलर क़ीमत के रडार चंद लम्हों में नेस्त-ओ-नाबूद हो रहे हैं। मुकम्मल फ़ौजी छावनियाँ ख़ाली कर दी गयी हैं, कुछ को आग के हवाले कर दिया गया है और ...