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लम्हा लम्हा तन्हाई I | Tariq Azeem Tanha Ghazal | Urdu Ghazal

  इश्क़ , तसव्वुफ़ और ख़ुद-शनासी की एक फ़िक्र-अफ़रोज़ ग़ज़ल उर्दू शायरी की अस्ल रूह महज़ जज़्बात के इज़हार तक महदूद नहीं , बल्कि इंसानी वजूद के बातिनी जहान , उसके तजुर्बात , उसकी तन्हाइयों और उसकी रूहानी जस्तजू की तर्जुमानी भी है। पेश-ए-नज़र ग़ज़ल इसी अदबी और फ़िक्री रिवायत की एक दिलकश मिसाल है , जिसमें इश्क़ की लताफ़त , हिज्र की कैफ़ियत , दर्द की दानाई , तन्हाई की चुभन और इश्क़-ए-हक़ीक़ी की रौशनी एक साथ जलवागर होती है। मेरी यह ग़ज़ल अपने मतले से ही क़ारी को एक ऐसे आलम में ले जाती है जहाँ आवाज़ें गूँज बनकर लौटती हैं , आरज़ुएँ ख़ाक में मिलकर नई शनासाई को जन्म देती हैं , और तन्हाई महज़ एक एहसास नहीं बल्कि इंसानी वजूद का एक गहरा तजुर्बा बन जाती है। ग़ज़ल का हर शेर अपने अंदर एक मुकम्मल जहान समेटे हुए है। कहीं दश्त-ए-बे-कसी की वीरानी है , कहीं कूचा-ए-मुहब्बत की तअज़ीम , कहीं हिज्र की लंबी रातों के बाद शकेबाई की सुबह , तो कहीं दर्द की आग से हासिल होने वाली वह दानाई है जो किसी किताब में नहीं मिलती। शायर इश्क़ को महज़ जज़्बाती तअल्लुक़ के तौर पर नहीं देखता , बल्कि उसे इंसान की बातिनी...

ना देखूँगा किसी भी नज़र उस के बाद क्या

ना देखूँगा किसी भी नज़र उस के बाद क्या कर लूँगा उससे तंग गुज़र उस के बाद क्या। मैं उसकी उल्फ़तों में तो हो जाऊँगा फ़ना गरचे हुई न उसको ख़बर उसके बाद क्या मैं तो बना भी लूँगा इसी दिल को ताज पर, फिर भी न हो जो उसकी नज़र उस के बाद क्या मंज़िल उदासी है रहे-गिरया है रात भर और है बस अपना शेरो सफर उसके बाद क्या लौटा जो बाद मरने के तनहा' के गरचे वो बाद ए फ़ना ओ बाद ऐ गुज़र उस के बाद क्या जंग का ख़्याल ठीक है पर सोच तो ज़रा उजडेगा इसमें तेरा भी घर, उस के बाद क्या जो इंकिलाब के थे वो हामिल चले गये, धुँधला गयी है तंज़िमें शहर, उसके बाद क्या तारिक़ अज़ीम भूल चुके मैकदे की राह , उनकी नहीं है ख़ैर-ख़बर उसके बाद क्या, तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

उर्दू तुकांत शब्द भाग 1

  अक़्ल   = बुद्धि, तर्क, ज्ञान, मति, प्रज्ञा, मस्तिष्क, ज्ञान, अकबर  = सबसे महान, महानतम, महत्तम, अकसर  = अधिकतर, बहुत बार, बहुधा, विशेषकर, प्रायः, लगभग, सदा, सर्वदा, अख्ज़  = पकड़नेवाला, लेनेवाला, छीनने वाला, लोभी अख़बार  = समाचार, समाचारपत्र, वृत्तपत्र, वर्तमान पत्र, सामयिक पत्र, अगर  = यदि, तथापि, अग्यार  = अजनबी, प्रतिद्वन्दी (गै़र का बहुवचन) अगल़ात  = अशुद्धियां (गल़त का बहुवचन) अर्जमन्द  = महान अऱ्ज  = धरती, क्षेत्र, पृथ्वी अजनबी  = आगंतुक, विदेशी, परदेसी, अपरिचित, अज़ल  = अनन्तकाल, सनातनत्व, नित्यता अजब  = कौतुक, आश्चर्य, असाधारण, अजीब  = आश्चर्यजनक, अद्भुत, निराला अज़ाब  = पीड़ा, सन्ताप, दंड अज़ीज़  = प्रिय, माननीय, आदरणीय, गुणवान अज़ीम  = महान, विशाल, उच्च मर्यादा वाला अटक  =विघ्न, बाधा अत्त्फ़ाल  = बच्चे, संतति (तिफ़्ल का बहुवचन), संतान, पुत्र-पुत्रियाँ, अत्फ़  = दया, भेंट, प्रेम, कृपा अदा  = ऋण चुकाना, अदा  = मनोहरता, श्रृंगार, सुन्दरता, अभिनय, अदीब  = विद्...