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Din Dhal Chuka To Sab Shaam Ko Pahuche

दिन ढल चुका तो सब शाम को पहुँचे, सभी अपने अपने मक़ाम को पहुचे, वो लोग जो मुझे इस जां से अज़ीज़ थे, वक़्ते-आखिर वो भी नाम को पहुँचे। सफ़र करते हुए गिर-गिरकर यूँ, आख़िरश हम भी इन'आम को पहुँचे। मैंने उठाया ज़मीं से तिरे आँचल को यूँ, कि शर न कोई तिरे एहतराम को पहुँचे। जो पहुँचे थे सियाह-ओ-फ़ाम तक, वो भी सबके सब तमाम को पहुँचे। तारिक़ अज़ीम 'तनहा'