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Showing posts from 2026

इस शम्अ को धुएँ का लबादा भी चाहिए | एक सूफ़ियाना और फ़लसफ़ियाना उर्दू ग़ज़ल | तारिक़ अज़ीम 'तनहा'

ज़िंदगी की तकमील, इश्क़ की तिश्नगी और वजूद के तज़ादात पर एक फ़िक्र-अंगेज़ ग़ज़ल मेरी यह ग़ज़ल दरअसल किसी एक जज़्बे, एक तजुर्बे या एक ख़्वाहिश का बयान नहीं है। मैंने इसमें ज़िंदगी को उसकी मुकम्मल सूरत में देखने की कोशिश की है। अक्सर हम चीज़ों को उनके एक ही रुख़ से पहचानते हैं, रौशनी को रौशनी समझते हैं, दर्द को दर्द, इश्क़ को इश्क़ और तन्हाई को तन्हाई। लेकिन मेरे नज़दीक हक़ीक़त इससे कहीं ज़्यादा पेचीदा और दिलचस्प है। हर रौशनी के पीछे एक साया होता है, हर मुस्कुराहट के पीछे कोई ग़म, हर विसाल के पीछे कोई हिज्र, और हर मंज़िल के पीछे एक लंबा सफ़र। यही एहसास इस ग़ज़ल की बुनियाद बना। मतले में मैंने हिज्र और उजाले को आमने-सामने रखा है। पहली नज़र में यह एक तज़ाद मालूम होता है, मगर ग़ौर कीजिए तो यही तज़ाद ज़िंदगी की अस्ल तकमील भी है। जुदाई की रात अगर बिल्कुल तारीक हो जाए तो इंसान उम्मीद खो बैठता है। इसलिए हिज्र को भी उजाले की ज़रूरत है। अश्क अगर आँख में क़ैद रह जाए तो उसका दर्द अधूरा रह जाता है, उसे दरिया बनकर बहना पड़ता है। इस तरह ग़ज़ल का पहला शेर ही पूरी ग़ज़ल की फ़िक्र का इशारा दे देता है हर...

लम्हा लम्हा तन्हाई I | Tariq Azeem Tanha Ghazal | Urdu Ghazal

  इश्क़ , तसव्वुफ़ और ख़ुद-शनासी की एक फ़िक्र-अफ़रोज़ ग़ज़ल उर्दू शायरी की अस्ल रूह महज़ जज़्बात के इज़हार तक महदूद नहीं , बल्कि इंसानी वजूद के बातिनी जहान , उसके तजुर्बात , उसकी तन्हाइयों और उसकी रूहानी जस्तजू की तर्जुमानी भी है। पेश-ए-नज़र ग़ज़ल इसी अदबी और फ़िक्री रिवायत की एक दिलकश मिसाल है , जिसमें इश्क़ की लताफ़त , हिज्र की कैफ़ियत , दर्द की दानाई , तन्हाई की चुभन और इश्क़-ए-हक़ीक़ी की रौशनी एक साथ जलवागर होती है। मेरी यह ग़ज़ल अपने मतले से ही क़ारी को एक ऐसे आलम में ले जाती है जहाँ आवाज़ें गूँज बनकर लौटती हैं , आरज़ुएँ ख़ाक में मिलकर नई शनासाई को जन्म देती हैं , और तन्हाई महज़ एक एहसास नहीं बल्कि इंसानी वजूद का एक गहरा तजुर्बा बन जाती है। ग़ज़ल का हर शेर अपने अंदर एक मुकम्मल जहान समेटे हुए है। कहीं दश्त-ए-बे-कसी की वीरानी है , कहीं कूचा-ए-मुहब्बत की तअज़ीम , कहीं हिज्र की लंबी रातों के बाद शकेबाई की सुबह , तो कहीं दर्द की आग से हासिल होने वाली वह दानाई है जो किसी किताब में नहीं मिलती। शायर इश्क़ को महज़ जज़्बाती तअल्लुक़ के तौर पर नहीं देखता , बल्कि उसे इंसान की बातिनी...

दिल को हर लम्हा जलाने की ज़रूरत क्या है

मोहब्बत जब अपने अस्ल मफ़हूम में दिल में उतर जाए तो बहुत-सी रस्में, बहुत-से तकल्लुफ़ और बहुत-सी शिकायतें अपनी अहमियत खो देती हैं। इंसान को एहसास होने लगता है कि जो चीज़ दिल में मौजूद है, उसे बार-बार साबित करने की ज़रूरत नहीं होती। यही एहसास इस ग़ज़ल की बुनियाद है। इस ग़ज़ल के अशआर में मोहब्बत, याद, तअल्लुक़, तग़ाफ़ुल और इंसानी रवैयों को सवालिया अंदाज़ में बयान किया गया है। ये सवाल किसी एक शख़्स से नहीं, बल्कि कभी महबूब से, कभी ख़ुद अपनी ज़ात से और कभी पूरे समाज से मुख़ातिब दिखाई देते हैं। हर शेर अपने अंदर एक फ़िक्र और एक पैग़ाम समेटे हुए है। दिल को हर लम्हा जलाने की ज़रूरत क्या है, फूल को आग लगाने की ज़रूरत क्या है। दिल में मौजूद हो जब नूर-ए-मोहब्बत का चराग़, घर में सौ दीप जलाने की ज़रूरत क्या है। हम ने माना कि तिरा हुस्न क़यामत है मगर, हर घड़ी नाज़ दिखाने की ज़रूरत क्या है। दिल में मौजूद अगर यार का काशाना रहे, फिर कहीं और ठिकाने की ज़रूरत क्या है। जिस को आना ही नहीं लौट के वापस इक दिन, उस को रिश्ते भी निभाने की ज़रूरत क्या है। अहल-ए-दिल ख़ुद ही समझ लेते हैं आँखों की ज़बाँ, उन को तफ़्सी...

तारिक़ अज़ीम तनहा : एक पुर-असरार मिज़ाज, फ़िक्र और रूहानियत का शायर

आज के दौर में, जब शायरी का एक बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया की त्वरित वाह-वाही, जज़्बाती नारों और सतही तास्सुरात का शिकार होता जा रहा है, वहाँ तारिक़ अज़ीम तनहा का कलाम एक अलग ही कैफ़ियत पैदा करता है। उनकी शायरी को पढ़ते हुए यूँ महसूस होता है जैसे शोर-ओ-गुल से भरी दुनिया में अचानक किसी पुरानी किताब का एक वर्क खुल जाए, जिसकी ख़ुशबू भी अनजानी हो और असर भी देर तक बाक़ी रहे। तनहा भाई उन नौजवान शायरों में से नहीं हैं जो महज़ इश्क़, जुदाई या तन्हाई को अपनी शायरी का मरकज़ बनाते हैं। उनके यहाँ इश्क़ है, मगर इश्क़ के पीछे मौजूद मआरिफ़त भी है; हिज्र है, मगर उसके पीछे की रूहानी कैफ़ियत भी; और ज़िंदगी है, मगर उसके साथ-साथ ज़िंदगी को समझने की बेचैनी भी। उनकी शायरी को पढ़ते हुए अक्सर यह एहसास होता है कि यह अशआर किसी ऐसे शख़्स के हैं जिसने किताबें सिर्फ़ पढ़ी नहीं, उनसे गुफ़्तगू भी की है; जिसने ज़िंदगी को सिर्फ़ जिया नहीं, उस पर ग़ौर भी किया है। उनके कलाम में फ़िक्र की वह तहदारी दिखाई देती है जो आज के दौर में कम ही नज़र आती है। उनकी की शायरी में उर्दू की नफ़ासत, फ़ारसी की लताफ़त और हिंदुस्तानी ...

दुख की तहों में उतरती एक रूहानी ग़ज़ल

कुछ अश्आर महज़ अल्फ़ाज़ नहीं होते, बल्कि रूह के उन मक़ामात की तर्जुमानी करते हैं जहाँ इंसान अपनी ही ज़ात से बेगाना होने लगता है। यह ग़ज़ल भी उसी कैफ़ियत की पैदाइश है एक ऐसी रात की, जहाँ तन्हाई सिर्फ़ कमरे में नहीं बल्कि नस-नस में उतर आई थी। इस ग़ज़ल का मर्कज़ी एहसास “दुख” है, मगर यह कोई सीधा-सादा ग़म नहीं; बल्कि इद्राक, हिज्र, ख़ामोशी, हैरानी और वक़्त की गर्द से बना हुआ वह रूहानी बोझ है जो इंसान उम्र भर अपने अंदर उठाए फिरता है। “सुब्ह-ए-फ़ुर्क़त” से “शब-ए-गेसू” तक, “दश्त-ए-इद्राक” से “कूचा-ए-अय्याम” तक, हर इस्तिआरा इस बात की गवाही देता है कि मैने दर्द को महज़ महसूस नहीं किया, बल्कि उसे जिया है। यह ग़ज़ल उस दिल की आवाज़ है जिसने दुनिया के सामने सुकूँ का चेहरा रखा, लेकिन अपनी आँखों में भरे हुए जाम का दुख किसी पर आश्कार न होने दिया। इसमें फ़ारसी तखय्युल, उर्दू की नर्मी और सूफ़ियाना इबहाम एक साथ दिखाई देते हैं। कई अश्आर ऐसे हैं जहाँ दर्द किसी महबूब की जुदाई से आगे बढ़कर वजूद की तन्हाई बन जाता है। “जाम”, “सहरा”, “बाम”, “ज़ुल्फ़”, “शबनम” और “वीराना” जैसी अलामतें सिर्फ़ हुस्न-ओ-इश्क़ की तर्जु...

बंगाल में गायों का बायकॉट: मज़हबी रियाकारी, क़ुर्बानी और इंसानी अख़लाक़ पर एक तल्ख़ तज्ज़िया

  मग़रिबी बंगाल में ईदुज़्ज़ुहा के मौक़े पर एक ऐसा मंज़र सामने आया जिसने हिन्दुस्तानी मुआशरे , मज़हबी सियासत और इंसानी अख़लाक़ तीनों को एक साथ आईना दिखा दिया। बताया गया कि कई मुसलमानों ने उन हिन्दू ताजिरों से गायें ख़रीदने से इनकार कर दिया जो उन्हें ईद की क़ुर्बानी के लिए बाज़ार में लाए थे। पहली नज़र में यह मंज़र कुछ लोगों को आपसी एहतराम और मज़हबी हम-आहंगी का नमूना मालूम हो सकता है , लेकिन अगर इस वाक़िआ की तह में उतरकर देखा जाए तो यह महज़ एक मज़हबी-सियासी तदबीर से ज़्यादा कुछ दिखाई नहीं देता। असल सवाल यह है कि अगर गाय की जगह किसी दूसरे जानवर की क़ुर्बानी दी जाएगी तो क्या इंसानी रहम , अख़लाक़ और ज़मीर का मसला हल हो जाता है ? अगर एक जान बचाकर दूसरी जान ले ली जाए तो क्या उसे रहमत और परहेज़गारी कहा जाएगा ? जान तो हर मख़लूक़ को अज़ीज़ होती है। दर्द का एहसास सिर्फ़ इंसान तक महदूद नहीं। जिस तरह इंसान मौत से डरता है , उसी तरह एक बकरी , भेड़ , भैंस या गाय भी अपनी ज़िन्दगी से मोहब्बत करती है। यही वजह है कि बहुत से अक़्लपरस्त और रहम-दिली में यक़ीन रखने वाले लोग क़ुर्बानी की पूरी रवायत को ही नैतिक एतिबार से सवालि...

सियासी मंज़रनामा: मोदी का असर, राहुल की उम्मीदें और 2029 की सियासत

कल बहुत अर्से बाद ऐसा हुआ कि वज़ीर-ए-आज़म का ख़िताब था और उनके अपने सफ़्हे पर देखने वालों की तादाद अक्सर औक़ात लाख से भी नीचे रही। ट्विटर पर एक मरतबा ज़रूर तादाद 1.37 लाख के क़रीब पहुँची जब तक़रीर ख़त्म होने में १०–१२ मिनट बाक़ी थे। भाजपा के सफ़्हे पर तो ये तादाद ढाई हज़ार तक पहुँचना भी मुश्किल लग रही थी। मोदी एक कल्ट की शक्ल में उभरे, लेकिन २०१९ के बाद उस जादू में कमी आने लगी। मिडिल क्लास जो उनके साथ मुंसलिक था, उसी तबक़े को सबसे ज़्यादा तकलीफ़ हुई। राम मंदिर बनने के बाद जब हर तरफ़ ४०० का आंकड़ा बताया जा रहा था, मैंने अपने पंचायती चैनल पर शुब्हा ज़ाहिर किया था और पहले मरहले के इंतिख़ाबात के बाद मेरी हिसाब-किताब २४५ सीट के क़रीब की थी। (वीडियो वहीं मौजूद है।) उस वक़्त भी बहुत से हामी और मुख़ालिफ़ दोनों ही इस तादाद के ख़िलाफ़ थे। मोदी के परस्तार क्यों मुख़ालिफ़ थे, ये आप समझ सकते हैं, और राहुल गांधी के नए हामी वोटिंग पैटर्न और अवामी रवैये के मंतिक को उतना ही समझते हैं जितना तमिलनाडु के लोग हिंदी। बहरहाल, एक बात तय है कि मोदी अब अगले लोकसभा इंतिख़ाबात में कोई जादू पैदा नहीं कर सकते। उनकी...

दुनिया जंग के मुहाने पर नहीं… बयानियों के जाल में क़ैद है

यह जो फिज़ा में एक बेचैनी सी तैर रही है, यह महज़ ख़बरों का शोर नहीं… बल्कि बयानियों की वो धुंध है, जिसमें हक़ीक़त की शक्ल धुंधली पड़ जाती है। कहा जा रहा है कि क्यूबा अंधेरों में डूब चुका है, अमेरिका ने उसकी सांसें रोक दी हैं, और रूस एक तेल से भरे जहाज़ के साथ मैदान में उतर आया है मानो बस एक चिंगारी बाकी है और दुनिया जंग-ए-अज़ीम की आग में झुलस जाएगी। मगर सवाल यह है कि क्या मंज़रनामा वाक़ई इतना सीधा और सादा है? क्यूबा की हालत बेशक नाज़ुक है। बरसों की पाबंदियां, कमज़ोर मआशियत और ईंधन की किल्लत ने वहां के निज़ाम-ए-ज़िंदगी को हिला कर रख दिया है। अस्पतालों की रौशनी मंद है, सड़कों पर सन्नाटा है, और अवाम एक गैर-यक़ीनी कल के साए में जी रही है। लेकिन यह तस्वीर एक-रुख़ी नहीं… यह मुकम्मल तबाही नहीं, बल्कि लंबे दबाव का नतीजा है, जिसे सनसनीख़ेज़ अल्फ़ाज़ में “अंधेरे में डूबा मुल्क” बना दिया गया है। फिर आता है रूसी जहाज़ का क़िस्सा, एक ऐसा बयानिया जिसे इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे अमेरिका के पास दो ही रास्ते बचे हों: या तो जहाज़ रोके और जंग मोल ले, या उसे जाने दे और अपनी साख गंवा दे। हालांकि हक़ीक़...

सियासत का मज़ाक या हक़ीक़त? 2×2 का जवाब और हुकूमती बयानीया का फ़लसफ़ा

कभी-कभी एक मामूली सा मज़ाहिया वाक़िआ (Incident) इतनी गहरी हक़ीक़त को बेनक़ाब कर देता है कि बड़े-बड़े सियासी तजज़िये (Political Analyses) भी उसके सामने फीके पड़ जाते हैं। “2×2 का जवाब” वाला यह किस्सा भी महज़ एक लतीफ़ा (Joke) नहीं, बल्कि हमारे दौर की सियासी फ़िक्र (Political Thinking) और बयानीये (Narrative) का आइना है। जब एक बच्चा ये कहता है कि उसने “5” बताया और बाकी “11” तक पहुँच गए, तो ये सिर्फ़ जहालत (Ignorance) की निशानी नहीं, बल्कि एक ऐसे निज़ाम (System) की झलक है जहाँ सही जवाब की अहमियत कम और खुश करने की सियासत ज़्यादा अहम हो जाती है। यही वो नुक्ता (Point) है जहाँ मज़ाह, हक़ीक़त में तब्दील होता है। सियासत में अक्सर देखा गया है कि बयानीया (Narrative) हक़ीक़त (Reality) पर भारी पड़ जाता है। सही जवाब “4” होता है ये बात भी सभी जानते है, मगर अगर महफ़िल (Power Circle) में “5” या “11” पसंद किया जा रहा हो, तो लोग उसी को दोहराने लगते हैं। ये अमल सिर्फ़ फ़र्दी (Individual) नहीं, बल्कि इज्तिमाई (Collective) सूरत इख़्तियार कर लेता है। इस तरह की सियासी रवायत (Tradition) में असल मसला ये नहीं होता ...

हिंदुस्तानी सियासत में हलचल: मधु किश्वर के इत्तिहामात (Allegations) ने खड़ा किया बड़ा सवाल

हिंदुस्तानी सियासत (Politics) में अक्सर ऐसे लम्हात आते हैं जब कोई एक बयान पूरा मंजरनामा (Scenario) बदल देता है। हालिया दिनों में एक ऐसा ही बयान सामने आया है, जिसने न सिर्फ़ सियासी हलकों में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि अवाम (Public) के दरमियान भी गहरी बहस छेड़ दी है। मधु किश्वर, जो कभी हुकूमत के करीब मानी जाती थीं और एक खास सियासी तफक्कुर (Ideology) की हामी रही हैं, उनके ताज़ा इज़हारात (Statements) ने कई सवालात को जन्म दिया है। उन्होंने अपने बयान में कुछ संगीन इत्तिहामात (Serious Allegations) पेश किए हैं, जिनमें शख्सियाती और सियासी दोनों पहलुओं का ज़िक्र मिलता है। अहम बात ये है कि ये इत्तिहामात किसी अदालती फैसले या मुस्तनद (Verified) तहक़ीक़ (Investigation) से साबित नहीं हुए हैं, बल्कि एक शख्सी तजुर्बे और राय (Opinion) के तौर पर सामने आए हैं। लेकिन सियासत की दुनिया में अक्सर राय भी एक ताक़तवर अस्लाह (Weapon) बन जाती है, जो अवामी ज़ेहन (Public Mind) को मुतास्सिर करती है। ये मामला सिर्फ़ एक शख्स या एक बयान तक महदूद नहीं है, बल्कि ये उस बड़े मसले की तरफ इशारा करता है जहाँ सियासी शख्सियात (Po...

ज़बान, तहज़ीब और जुग़राफ़िया: अल्फ़ाज़ का सफ़र और इंसानी शऊर की हक़ीक़त

दुनिया की तारीख़ को अगर किसी एक आइने में देखा जाए तो वो ज़बान है वही ज़बान जो इंसान की तहज़ीब (Culture) की रूह है, वही ज़बान जो जुग़राफ़िया (Geography) की परछाईं है। इंसान जहाँ बसता है, वहीं उसके अल्फ़ाज़ जन्म लेते हैं; जहाँ दरिया बहते हैं, वहाँ लफ़्ज़ भी रवाँ होते हैं; जहाँ रेगिस्तान है, वहाँ ताबिश (Heat) के सैंकड़ों इज़हार मिलते हैं, और जहाँ बर्फ़ की दुनिया है, वहाँ सरदी के रंग बेशुमार होते हैं। तारीख़ गवाह है कि इंसान ने जब पहली मर्तबा अपनी ज़िंदगी को तशकील दी, तो दरिया-ए-दजला और फरात के किनारों पर दी। यही वो मक़ाम था जहाँ बशर (Human) ने ख़ाना-बदोशी (Nomadism) छोड़कर स्थायित्व (Settlement) अपनाया। इसी सरज़मीन ने तहज़ीब को जन्म दिया और ज़बान को शक्ल दी। यही वजह है कि दरियाओं के नाम, पहाड़ों के नाम, समंदरों के नाम हर एक में उस इलाक़े की पहचान, उसकी रूह और उसकी तारीख़ समाई होती है। अगर हम दुनिया के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों पर नज़र डालें, तो हर ज़बान अपने माहौल का अक्स (Reflection) नज़र आती है। अरब के सहरा (Desert) में गर्मी के लिए दर्जनों अल्फ़ाज़ मिलते हैं, लेकिन बर्फ़ के लिए बहुत कम; वहीं ...

“समुंद्री केबल्स का ख़तरा: क्या ईरान आलमी इंटरनेट निज़ाम (Global Internet System) को मुअत्तल (Disrupt) कर सकता है?”

आज की दुनिया में जंग (War) सिर्फ़ मिसाइल (Missiles) और टैंक (Tanks) तक महदूद नहीं रही, बल्कि यह एक ऐसे मुकाम (Stage) पर पहुँच चुकी है जहाँ असल जंग नजरों से ओझल (Invisible) ढांचों पर लड़ी जाती है। और उन्हीं में से एक है समुंदर के नीचे बिछा हुआ इंटरनेट का निज़ाम (Internet Infrastructure – डिजिटल ढांचा)। अक्सर लोग यह समझते हैं कि इंटरनेट सैटेलाइट (Satellite) के जरिए चलता है, लेकिन हक़ीक़त इससे बिल्कुल मुख्तलिफ़ (Different) है। दुनिया का तकरीबन 95% से ज़्यादा डेटाबैंकिंग ट्रांजैक्शन (Bank Transactions), क्लाउड सर्विस (Cloud Services), ईमेल (Email) सब कुछ समुंदर के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल्स (Fiber Optic Cables – इंटरनेट के तार) के जरिए गुजरता है। यही वह बुनियादी ढांचा (Backbone) है, जिस पर पूरी डिजिटल दुनिया खड़ी है। हालिया दावों में यह कहा जा रहा है कि Iran इन केबल्स को निशाना बना सकता है। लेकिन यहाँ सबसे अहम बात यह है अब तक ऐसी किसी सीधी, आधिकारिक धमकी या कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है। यह सच है कि पर्शियन गल्फ (Persian Gulf – खाड़ी इलाक़ा) एक बेहद अहम डेटा रूट (Data Route) है, जहाँ स...

ईरान के लिए आर्थिक इआनत की खबर: हक़, इंसाफ़ और आलमी यकजहती के नजरिये से एक गहरा तजज़िया।

आज के इस अशोबज़दा (Turbulent – अशांत) दौर में, जब आलमी सियासत (Global Politics) हर रोज़ एक नया मोड़ ले रही है, एक खबर ने कई ज़ेहनों (Minds) में हलचल पैदा कर दी क्या वाक़ई Embassy of Iran, New Delhi ने एक क्यूआर कोड (QR Code – डिजिटल भुगतान माध्यम) जारी किया है ताकि ईरान की अवाम (Public) की मआशी (Economic) इआनत (Help) की जा सके? सबसे पहले ज़रूरी है कि इस तरह की खबरों को तस्दीक़ (Verification – पुष्टि) के तराज़ू (Scale) पर तौला जाए। किसी भी मुल्क का सफ़ारतख़ाना (Embassy) आम तौर पर सीधे अवाम से फंड (Funds) इकट्ठा करने के लिए खुले तौर पर क्यूआर कोड जारी नहीं करता खासकर ऐसे नाज़ुक दौर में। अगर ऐसा कोई क़दम उठाया जाता, तो वह बड़े पैमाने पर आधिकारिक एलान (Official Announcement) और भरोसेमंद ज़राए (Sources) के ज़रिये सामने आता। ईरान, जिसे Iran के नाम से जाना जाता है, कुदरती वसाइल (Natural Resources) से मालामाल है नफ़्त (Oil – तेल), गैस (Gas) और दूसरी दौलतें (Resources) उसकी मआशियात (Economy) की बुनियाद हैं। लेकिन जंग (War) और पाबंदियों (Sanctions) के दौर में, कोई भी मुल्क अस्थायी दबाव (Temporar...

सिनो हक़ीक़त बनाम हिंदुस्तानी तखय्युल: तामीर (Development) की दौड़ में हम कहाँ खड़े हैं?

चाइना हमसे कितना आगे है, 50 साल, सौ साल या 500 सौ साल? जो लोग टीवी को ज्ञान और खबरों का श्रोत मान लिए वे न सिर्फ अपना बल्कि अनजाने में इस देश और आने वाली पीढ़ी का भविष्य खराब कर रहे हैं। सच तो यह है कि हमारी सरकार कुछ कर ही नहीं रही है सिवाय टीवी शोज और प्रोपेगंडा के। इस टीवी शो और प्रोपेगंडा के सबसे बड़े ग्राहक अंधभक्त है, ऐसे अंधभक जो आज भी इस भ्रम में जी रहे हैं कि केवल टीवी पर बकलोली करने से, नारा गढ़ने, प्रोपेगंडा और नैरेटिव बनाने से देश आगे बढ़ सकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि आज के समय में वही देश आगे बढ़ रहा है, जो धर्म जाती और नफरत की राजनीति से बाहर निकल कर, अंधविश्वास और पाखंड से बाहर निकल कर विज्ञान, टेक्नोलॉजी, रिसोर्स डेवलपमेंट, स्किल्ड डेवलपमेंट, वर्कफोर्स और मजबूत शिक्षा व्यवस्था पर काम कर रहा है। चीन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज अगर आप बाजार में जाएं, किसी भी इलेक्ट्रॉनिक सामान चाहे वह मोबाइल हो, कंप्यूटर हो या उनके चिप हो, उसको देखें, तो उसमें ज्यादा से ज्यादा चीन के सामान मिलेंगे। चीन ने क्या कुछ नहीं किया है, इंसान की जरूरतों के लिए हर एक सामान का एडवांस लेवल पर रिसर्...