मग़रिबी बंगाल में ईदुज़्ज़ुहा के मौक़े पर
एक ऐसा मंज़र सामने आया जिसने हिन्दुस्तानी मुआशरे, मज़हबी सियासत और इंसानी अख़लाक़ तीनों को एक साथ आईना दिखा
दिया। बताया गया कि कई मुसलमानों ने उन हिन्दू ताजिरों से गायें ख़रीदने से इनकार
कर दिया जो उन्हें ईद की क़ुर्बानी के लिए बाज़ार में लाए थे। पहली नज़र में यह मंज़र
कुछ लोगों को आपसी एहतराम और मज़हबी हम-आहंगी का नमूना मालूम हो सकता है, लेकिन अगर इस
वाक़िआ की तह में उतरकर देखा जाए तो यह महज़ एक मज़हबी-सियासी तदबीर से ज़्यादा कुछ
दिखाई नहीं देता।
असल सवाल यह है कि अगर गाय की जगह किसी
दूसरे जानवर की क़ुर्बानी दी जाएगी तो क्या इंसानी रहम, अख़लाक़ और ज़मीर का
मसला हल हो जाता है? अगर एक जान
बचाकर दूसरी जान ले ली जाए तो क्या उसे रहमत और परहेज़गारी कहा जाएगा? जान तो हर मख़लूक़ को
अज़ीज़ होती है। दर्द का एहसास सिर्फ़ इंसान तक महदूद नहीं। जिस तरह इंसान मौत से
डरता है, उसी तरह एक
बकरी, भेड़, भैंस या गाय भी
अपनी ज़िन्दगी से मोहब्बत करती है।
यही वजह है कि बहुत से अक़्लपरस्त और
रहम-दिली में यक़ीन रखने वाले लोग क़ुर्बानी की पूरी रवायत को ही नैतिक एतिबार से
सवालिया निगाह से देखते हैं। उनके नज़दीक किसी भी बेज़ुबान जानवर का ख़ून बहाना, चाहे उसे मज़हबी
रस्म का नाम दिया जाए या रिवायत का,
आख़िरकार एक हिंसक अमल ही है। अगर इंसानी तमद्दुन का मक़सद रहम, हमदर्दी और अद्ल को
फ़रोग़ देना है, तो फिर यह
बहस सिर्फ़ गाय तक महदूद क्यों रहे?
बंगाल के इस वाक़िआ में मुसलमानों की
तरफ़ से गायों का बायकॉट कुछ लोगों को बड़ा एख़लाक़ी क़दम लगा, लेकिन नाक़िदीन का
कहना है कि असली एख़लाक़ी बुलंदी तब होती जब हर तरह की जानवर-कुशी पर सवाल उठाया
जाता। अगर कोई मुआशरा यह कहे कि हम अपनी ख़ुशी, अपनी रस्म या अपनी मज़हबी तस्कीन के लिए किसी जानवर की जान
नहीं लेंगे तब उसे वाक़ई एक बुलंद इंसानी शऊर कहा जा सकता है।
क़ुर्बानी का असल मफ़हूम अगर ईसार, हमदर्दी और इंसानी
फ़लाह है, तो फिर यह
जज़्बा दौलत बाँटने, भूखों को
खाना खिलाने, ग़रीबों की
मदद करने और मुआशरा में इंसाफ़ क़ायम करने में भी ज़ाहिर हो सकता है। किसी बेज़ुबान की
गर्दन पर छुरी चलाना ही त्याग का वाहिद पैमाना क्यों माना जाए?
लेकिन इस बह्स का दूसरा पहलू हिन्दू
मुआशरे की तनाक़ुज़ात से भी जुड़ा हुआ है। गाय के नाम पर सियासी जज़्बात भड़काना, लेकिन दूसरे
जानवरों की हत्या पर ख़ामोश रहना यह सवाल मुद्दतों से उठता रहा है। अगर रहम-दिली
दरहक़ीक़त एक नैतिक उसूल है, तो उसका
दायरा सिर्फ़ गाय तक महदूद क्यों हो?
क्या बकरी, मुर्गी, भेड़ और मछली दर्द
महसूस नहीं करते?
हिन्दू मुआशरा के भीतर भी गाय को लेकर
जो रवैया नज़र आता है, वह अक्सर
अपने ही दावों से मुतज़ाद दिखाई देता है। बूढ़ी गायों को सड़कों पर छोड़ देना, दूध के तिजारती
इस्तेमाल के लिए बछड़ों को माँ से जुदा कर देना, आवारा हैवानात की बदहाली पर ख़ामोश रहना ये तमाम मंज़र हमारे
मुआशरती ज़मीर पर सवाल उठाते हैं। अगर गाय सचमुच ‘माता’ है, तो फिर उसकी
ज़िन्दगी का एहतराम सिर्फ़ नारे और नारों की सियासत तक क्यों महदूद रह जाता है?
यही तज़ाद हिन्दुस्तानी सियासत में भी
दिखाई देता है। एक तरफ़ चुनावी मंचों पर मज़हबी जज़्बात को भुनाया जाता है, दूसरी तरफ़ वही
निज़ाम मांस-व्यापार और निर्यात से फ़ायदा भी उठाता है। सियासत जब मज़हबी अलामात को
इस्तेमाल करती है, तो अक्सर
इंसानियत, अख़लाक़ और
तर्क तीनों पीछे छूट जाते हैं। बंगाल का हालिया वाक़िआ इसी बड़े तनाक़ुज़ की एक और
मिसाल बनकर सामने आया।
दरअस्ल, यह पूरा मुआमला सिर्फ़ हिन्दू और मुसलमान का नहीं है। यह उस
इंसानी फ़िक्र का मसला है जो अक्सर मज़हबी पहचान के आगे अख़लाक़ को छोटा कर देती है।
जब कोई मुआशरा अपने उसूलों को तर्क और इंसाफ़ की कसौटी पर कसने के बजाय सिर्फ़
विरासत, जज़्बात और
भीड़ की मनोवृत्ति के हवाले कर देता है,
तब पाखण्ड पैदा होता है।
इंसानी तारीख़ गवाह है कि मज़ाहिब ने
जहाँ कई लोगों को रूहानी तस्कीन,
तहज़ीबी शनाख़्त और मुआशरती ढाँचा दिया,
वहीं अनेक मौक़ों पर कट्टरता,
तफ़रक़ा और हिंसा को भी जन्म दिया। इसलिए किसी भी मज़हबी रवायत को आँख मूँदकर
स्वीकार करने के बजाय उसकी नैतिक बुनियाद पर सवाल उठाना एक सेहतमंद मुआशरे की
निशानी है।
तारिक़ अज़ीम तन्हा
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