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तारिक़ अज़ीम तनहा : एक पुर-असरार मिज़ाज, फ़िक्र और रूहानियत का शायर

आज के दौर में, जब शायरी का एक बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया की त्वरित वाह-वाही, जज़्बाती नारों और सतही तास्सुरात का शिकार होता जा रहा है, वहाँ तारिक़ अज़ीम तनहा का कलाम एक अलग ही कैफ़ियत पैदा करता है। उनकी शायरी को पढ़ते हुए यूँ महसूस होता है जैसे शोर-ओ-गुल से भरी दुनिया में अचानक किसी पुरानी किताब का एक वर्क खुल जाए, जिसकी ख़ुशबू भी अनजानी हो और असर भी देर तक बाक़ी रहे।


तनहा भाई उन नौजवान शायरों में से नहीं हैं जो महज़ इश्क़, जुदाई या तन्हाई को अपनी शायरी का मरकज़ बनाते हैं। उनके यहाँ इश्क़ है, मगर इश्क़ के पीछे मौजूद मआरिफ़त भी है; हिज्र है, मगर उसके पीछे की रूहानी कैफ़ियत भी; और ज़िंदगी है, मगर उसके साथ-साथ ज़िंदगी को समझने की बेचैनी भी।

उनकी शायरी को पढ़ते हुए अक्सर यह एहसास होता है कि यह अशआर किसी ऐसे शख़्स के हैं जिसने किताबें सिर्फ़ पढ़ी नहीं, उनसे गुफ़्तगू भी की है; जिसने ज़िंदगी को सिर्फ़ जिया नहीं, उस पर ग़ौर भी किया है। उनके कलाम में फ़िक्र की वह तहदारी दिखाई देती है जो आज के दौर में कम ही नज़र आती है।

उनकी की शायरी में उर्दू की नफ़ासत, फ़ारसी की लताफ़त और हिंदुस्तानी तहज़ीब की रूह एक साथ साँस लेती हुई महसूस होती है। "यूसुफ़", "ज़ुलैखा", "इश्क़-ए-हक़ीक़ी", "तजल्ली", "फ़ना", "बक़ा", "हिज्र", "विसाल", "रिंद", "साक़ी" और "तसव्वुफ़" जैसे अल्फ़ाज़ उनके यहाँ सजावटी इस्तिआरे नहीं, बल्कि एक मुकम्मल जहान-ए-मआनी के दरवाज़े हैं।

उनकी ग़ज़लों का सबसे बड़ा इम्तियाज़ यह है कि वे सस्ती शोहरत के लिए नहीं कही जातीं। उनमें बाज़ारी जज़्बात नहीं, बल्कि एहसास की गहराई, मुतालिए की रौशनी और रूह की बेचैनी नज़र आती है। कभी-कभी उनके अशआर पढ़ते हुए मीर की उदासी, ग़ालिब की फ़िक्र, इक़बाल की परवाज़ और फ़ारसी सूफ़िया की रूहानियत की हल्की झलक महसूस होती है। हालांकि तन्हा साहब का लहजा और उनकी पहचान मुकम्मल तौर पर उनकी अपनी है।

मैंने अपनी ज़िंदगी में बहुत-से शायर देखे हैं। कुछ अच्छे अशआर कहते हैं, कुछ अच्छा तरन्नुम रखते हैं, और कुछ महफ़िलों की रौनक़ बन जाते हैं। मगर तनहा के साथ जो चीज़ हमेशा हैरत में डालती है, वह उनकी फ़ितरी सलाहियत है।

कई बार ऐसा हुआ कि किसी मामूली-सी गुफ़्तगू में कोई मिसरा निकला, कोई बहर छिड़ी या कोई ख़याल सामने आया, और महज़ दस-पंद्रह मिनट के अंदर उन्होंने पूरी ग़ज़ल कह दी। वह भी ऐसी ग़ज़ल जिसमें बहर की पाबंदी हो, क़ाफ़िया और रदीफ़ अपनी जगह मौजूद हों, और अशआर में ऐसी रवानी हो कि सुनने वाला दाद दिए बग़ैर न रह सके।

मैं अक्सर सोचता था कि आख़िर यह नौजवान अपने अंदर कितनी दुनियाएँ आबाद किए बैठा है। यह कैसी फ़िक्र है जो हर वक़्त उसके साथ चलती है, और यह कैसा तख़य्युल है जो मामूली बातों को भी शेर में बदल देता है।

उनके कुछ अशआर ऐसे हैं जो पहली बार सुनकर ही ज़ेहन का हिस्सा बन जाते हैं—

"तन्हा' के दिल में अब भी धड़कती है इक ग़ज़ल,

उसको ज़रा-सा लहजा-ए-शीराज़-ओ-फ़ास दे"

तो यह शेर सिर्फ़ फ़ारसी अदब के प्रति मोहब्बत का इज़हार नहीं, बल्कि उस क्लासिकी रवायत से अपनी रूहानी और फ़िक्री वाबस्तगी का ऐलान भी है जिसने सदियों तक इश्क़, हुस्न और मआरिफ़त को एक ही धागे में पिरोकर रखा।

और फिर—

किस क़दर ख़ौफ़ज़दा लोग हैं इस बस्ती में,

हर ज़ुबाँ छुप के सुनाती है सर-ए-शाम का दुख

मौजूदा समाज की ख़ामोशियों का ऐसा मर्सिया है जिसमें डर, बेबसी और सामूहिक तन्हाई एक साथ जमा हो जाते हैं। यह शेर अपने दौर की सामाजिक और नफ़्सियाती कैफ़ियत का आइना मालूम होता है।

या यह शेर—

"मैं जो ज़ाहिर में बहुत साहिब-ए-इद्राक़ हूँ अब,

मेरे अंदर कोई बच्चा है कोई देख न ले"

इंसानी शख़्सियत की दोहरी सतहों को बड़ी ख़ूबसूरती से बयान करता है। बाहर का दानिशमंद और अंदर का मासूम इंसान, यह तज़ाद ही शायद हर संवेदनशील शख़्स की असली कहानी है।

इसी तरह—

"हर सम्त क़त्ल-ए-ज़ौक़ का बाज़ार गर्म है,

ऐसे में अपने फ़न को छुपाना भी ठीक है"

सिर्फ़ एक शेर नहीं बल्कि अहल-ए-कलम और अहल-ए-फ़न की पूरी कैफ़ियत है। जब ज़माना फ़िक्र और ज़ौक़ की क़द्र करना छोड़ दे, तब कभी-कभी अपने फ़न की हिफ़ाज़त के लिए उसे पर्दे में रखना भी एक हिकमत बन जाता है।

और अशआर देखे कि - 

है मेरी ख़ाक पे वो हुक्मरान-सी हैबत,

मज़ार छूने की जुरअत नहीं करेगा कोई।

या फिर

इस फ़िक्र-ओ-ख़िरद की बस्ती में इक रिंद-ए-बला-कैफ़ी भी तो हो

जो बज़्म में आँखें खोल सके जब फ़िक्र पे ग़ाफ़िल आ जाए

यह भी अशआर

हर सिम्त बिक रही हो जहाँ रौशनी की लाश,

उस शहर-ए-बे-क़रार का काइल नहीं हूँ दोस्त

तन्हा” सुख़न वही है जो दिल में उतर सके,

लफ़्ज़ों के कारोबार का काइल नहीं हूँ दोस्त।

यह भी देखे -

मैं अपने ज़ख़्म गिनता हूँ तो ये एहसास होता है,

अभी इक और दुनिया है दिल-ए-बर्बाद से आगे।

न था मंसूब सिर्फ़ इक इश्क़ ही से ख़ाना-वीरानी,

कई सदमे मिले हमको तेरी औलाद से आगे।

और

मैंने माना कि मरासिम में ख़लिश थी कुछ-कुछ,

बात बिगड़ी तो बहुत दूर बढ़ा दी उसने।

यह भी

उसने बदल के रख दिए मेयार-ए-दोस्ती,

अब दुश्मनों से हाथ मिलाना भी ठीक है


गुज़र रहे हैं जो अहल-ए-जुनूँ सर-ए-आलम

उन्हीं को शहर का क़िब्ला बना दिया जाए


मर्द-ए-हुनर वो है जो ख़ुद को तराश डाले,

पत्थर भी उसके दम से हीरा बना हुआ हो

परवाज़ का हुनर है गिर कर सँभल भी जाना,

वो आसमाँ ही क्या जो क़दमों में आ गया हो


हुस्न जब नक़्श बदलता है तो ये होता है

दिल ही लुट जाता है इक लम्हा-ए-तैयारी पर


'तन्हा' अब रुख़ को बदल, रंग-ए-सुख़न और भी दे

लोग रुकते नहीं बस एक ही गुफ़्तारी पर

इन अशआर को पढ़कर महसूस होता है कि शायर सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं खेल रहा, बल्कि अपने दौर, अपने अंदर और अपने आसपास की दुनिया को समझने की कोशिश कर रहा है।

तनहा की शायरी से रिश्ता सिर्फ़ कहने तक महदूद नहीं। वह उरूज़, बहर, क़ाफ़िया और रदीफ़ जैसी फ़नी बारीकियों पर भी गहरी नज़र रखते हैं। यही वजह है कि उनके कलाम में फ़िक्र और फ़न का ऐसा इम्तिजाज दिखाई देता है जो कम ही शायरों के यहाँ नसीब होता है।

दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने एक ज़माने में यह "हिंदी उर्दू शायरी" के नाम से एक अदबी सफ़्हा शुरू किया था। मगर जल्द ही यह महसूस हुआ कि उनकी दिलचस्पी अपनी शायरी से ज़्यादा अच्छी शायरी की तशहीर में है। जब उनसे मुलाक़ात हुई तो उन्होंने बड़ी सादगी से कहा—

"अच्छे-अच्छे नफ़ीस अशआर इस सफ़्हे पर पोस्ट किया कीजिए। अदब की ख़िदमत, शायर की ख़िदमत से बड़ी चीज़ है।"

यह जुमला आज भी ज़ेहन में ताज़ा है। क्योंकि यह एक ऐसे इंसान की सोच का आईना है जो शोहरत से ज़्यादा अदब को अहमियत देता है।

हैरत की बात यह है कि जो शख़्स मुशायरों की दुनिया से इतना दूर दिखाई देता है, उसके कलाम की क़द्र हिंदुस्तान के अहल-ए-अदब करते रहे हैं। जनाब ज़रताज़ हाशमी, जनाब हसरत फ़ारूक़ी, जनाब फ़हमी बदायूँनी और दूसरे कई अहल-ए-सुख़न ने उनके कलाम की पुख़्तगी और नफ़ासत की तारीफ़ की है।

मरहूम जनाब अमजद इस्लाम अमजद और खलील मामून साहब ( साहित्य अकादमी पुरस्कार) जैसे बड़े पाये के शायरों ने इस सिलसिले में उनके बारे में बयान करते हुए दिखते है। अहल-ए-अदब की महफ़िलों में यह तास्सुर बयान किया जाता रहा कि कम उम्र में जिस तरह की दरवेशाना फ़िक्र, क्लासिकी शऊर और रूहानी लहजा तन्हा साहब के यहाँ दिखाई देता है, वह कम ही नौजवान शायरों को नसीब होता है।

मगर सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है।

आख़िर ऐसा शायर, जो चंद मिनटों में मुकम्मल ग़ज़ल कह सकता है...

जो क्लासिकी और जदीद अदब दोनों से वाक़िफ़ है...

जिसके पास अपना अलग लहजा है...

जिसके अशआर सुनकर बड़े-बड़े अहल-ए-सुख़न दाद देते हैं...

वह मुशायरों की पहली सफ़ में क्यों नहीं है?

शायद इसका जवाब उनकी ज़िंदगी में छुपा हुआ है।

रोज़गार की फ़िक्र, तालीम की मशक्कत, समाजी मसाइल, पेशेवर ज़िम्मेदारियाँ और ज़िंदगी की अनगिनत उलझनें—इन सब ने उनके वक़्त का बड़ा हिस्सा अपने नाम कर लिया। वह उन शायरों में से नहीं जो दुनिया से कटकर सिर्फ़ शायरी करें; बल्कि उन लोगों में से हैं जो दुनिया की धूल, थकान, संघर्ष और ज़िम्मेदारियों के दरमियान रहकर शेर कहते हैं।

शायद इसी लिए उनके यहाँ यह शेर पैदा होता है—

"रोटी की फ़िक्र खा गई ख़्वाबों की रौशनी,

बचपन भी ढल गया है यूँ ही रोज़गार कर।"

और शायद इसी लिए उनका दर्द बनावटी नहीं लगता।

आज की नस्ल जहाँ दो मिसरों में ताली और लाइक्स तलाश करती है, वहीं तारिक़ अज़ीम तनहा एक ऐसे शायर मालूम होते हैं जो एक शेर में सदियों की फ़िक्र समेटने की कोशिश करते हैं। उनके लिए शायरी महज़ फ़न नहीं, बल्कि ज़िंदगी को समझने का एक वसीला है।

उनकी शख़्सियत में एक अजीब-सी दरवेशी है। न शोहरत की बेचैनी, न तआरुफ़ का शोर, न मुशायरों की दौड़। जैसे वह अपने अशआर को दुनिया के हवाले करके ख़ुद एक तरफ़ हो जाते हों।

मगर अदब की दुनिया का तजुर्बा यह बताता है कि असल आवाज़ें कभी गुम नहीं होतीं। देर हो सकती है, मगर उन्हें पहचान मिलकर रहती है।

अगर तारिक़ अज़ीम तनहा की शायरी को एक जुमले में बयान करना हो तो शायद यूँ कहा जा सकता है—

"वह उन चंद नौजवान शायरों में से हैं जिनकी तलाश उन्हें ख़ुद नहीं, बल्कि अदब को है; एक ऐसा दरवेश-ए-सुख़न, जो शोहरत से दूर रहकर भी अपने अशआर में पूरी एक दुनिया आबाद किए हुए है।"

-Sahil Bhardwaj


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