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चंद अश्आर

(1) मैदाने-हश्र को भूल गए हम मसरूफ होकर, इस जिंदगी को ऐसे मसरूफ़ होकर ना गुज़ारो! (2) अब अपने कदमो पे भी यकीन ना रहा मुझे, उतरा हूँ आज सीढ़ियों से तो दीवार का सहारा लेकर! (3) मिरी दास्ताने-म...