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दुनिया जंग के मुहाने पर नहीं… बयानियों के जाल में क़ैद है

यह जो फिज़ा में एक बेचैनी सी तैर रही है, यह महज़ ख़बरों का शोर नहीं… बल्कि बयानियों की वो धुंध है, जिसमें हक़ीक़त की शक्ल धुंधली पड़ जाती है। कहा जा रहा है कि क्यूबा अंधेरों में डूब चुका है, अमेरिका ने उसकी सांसें रोक दी हैं, और रूस एक तेल से भरे जहाज़ के साथ मैदान में उतर आया है मानो बस एक चिंगारी बाकी है और दुनिया जंग-ए-अज़ीम की आग में झुलस जाएगी। मगर सवाल यह है कि क्या मंज़रनामा वाक़ई इतना सीधा और सादा है? क्यूबा की हालत बेशक नाज़ुक है। बरसों की पाबंदियां, कमज़ोर मआशियत और ईंधन की किल्लत ने वहां के निज़ाम-ए-ज़िंदगी को हिला कर रख दिया है। अस्पतालों की रौशनी मंद है, सड़कों पर सन्नाटा है, और अवाम एक गैर-यक़ीनी कल के साए में जी रही है। लेकिन यह तस्वीर एक-रुख़ी नहीं… यह मुकम्मल तबाही नहीं, बल्कि लंबे दबाव का नतीजा है, जिसे सनसनीख़ेज़ अल्फ़ाज़ में “अंधेरे में डूबा मुल्क” बना दिया गया है। फिर आता है रूसी जहाज़ का क़िस्सा, एक ऐसा बयानिया जिसे इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे अमेरिका के पास दो ही रास्ते बचे हों: या तो जहाज़ रोके और जंग मोल ले, या उसे जाने दे और अपनी साख गंवा दे। हालांकि हक़ीक़...

तवील तहरीरों का फ़रेब: सोशल मीडिया में सियासी एक्टिविज़्म या फ़िक्र की तिजारत?

आज के दौर-ए-सोशल मीडिया में एक अजीब सा रुझान पैदा हो गया है। बहुत से लोग तवील तहरीरें लिखते हैं, या कहीं से कोई लंबा मज़मून नक़ल करके पेश कर देते हैं, और फिर खुद को “सियासी एक्टिविस्ट”, “मुफक्किर”, “तजज़िया-निगार” या “इंटेलेक्चुअल” के लिबास में पेश करते हैं। आम क़ारी जब ऐसी तहरीर पढ़ता है तो अक्सर एक वहम का शिकार हो जाता है। उसे महसूस होता है कि मज़मून बहुत लंबा है, अल्फ़ाज़ में कुछ साक़िलपन है, दरमियान-दरमियान कुछ तारीखी हवाले और गैर-मुल्की नाम भी मौजूद हैं, लिहाज़ा ज़रूर इसमें कोई गहरी हक़ीक़त छुपी होगी। लेकिन हक़ीक़त यह है कि तवील तहरीर का हक़ीक़त से कोई लाज़िमी ताल्लुक़ नहीं होता। कई मरतबा सबसे बड़े गुमान और ग़लतफ़हमियाँ उन्हीं तहरीरों के अंदर छुपी होती हैं जो ज़ाहिर में बहुत मुतास्सिर-कुन लगती हैं। सोशल मीडिया दरअसल एक नफ़्सियाती मैदान भी है। जब कोई बात दो-चार जुमलों में कही जाती है तो क़ारी उसे जल्द समझ लेता है और उस पर सवाल भी उठा देता है। मगर जब वही बात दो-तीन हज़ार अल्फ़ाज़ में बयान कर दी जाए, उसमें कुछ फ़लसफ़ियाना इस्तिलाहात, तारीखी वाक़ियात और जज़्बाती तर्ज़-ए-बयान शामिल कर ...