आज के दौर-ए-सोशल मीडिया में एक अजीब सा रुझान पैदा हो गया है। बहुत से लोग तवील तहरीरें लिखते हैं, या कहीं से कोई लंबा मज़मून नक़ल करके पेश कर देते हैं, और फिर खुद को “सियासी एक्टिविस्ट”, “मुफक्किर”, “तजज़िया-निगार” या “इंटेलेक्चुअल” के लिबास में पेश करते हैं। आम क़ारी जब ऐसी तहरीर पढ़ता है तो अक्सर एक वहम का शिकार हो जाता है। उसे महसूस होता है कि मज़मून बहुत लंबा है, अल्फ़ाज़ में कुछ साक़िलपन है, दरमियान-दरमियान कुछ तारीखी हवाले और गैर-मुल्की नाम भी मौजूद हैं, लिहाज़ा ज़रूर इसमें कोई गहरी हक़ीक़त छुपी होगी।
लेकिन हक़ीक़त यह है कि तवील तहरीर का हक़ीक़त से कोई लाज़िमी ताल्लुक़ नहीं होता। कई मरतबा सबसे बड़े गुमान और ग़लतफ़हमियाँ उन्हीं तहरीरों के अंदर छुपी होती हैं जो ज़ाहिर में बहुत मुतास्सिर-कुन लगती हैं।
सोशल मीडिया दरअसल एक नफ़्सियाती मैदान भी है। जब कोई बात दो-चार जुमलों में कही जाती है तो क़ारी उसे जल्द समझ लेता है और उस पर सवाल भी उठा देता है। मगर जब वही बात दो-तीन हज़ार अल्फ़ाज़ में बयान कर दी जाए, उसमें कुछ फ़लसफ़ियाना इस्तिलाहात, तारीखी वाक़ियात और जज़्बाती तर्ज़-ए-बयान शामिल कर दिए जाएँ, तो क़ारी के ज़ेहन पर एक अजीब सा दबाव पैदा हो जाता है।
उसे यूँ महसूस होने लगता है कि शायद इल्म की किसी गहरी दुनिया का दरवाज़ा उसके सामने खुल रहा है, और अगर वह इस तहरीर पर शक करेगा तो शायद अपनी ही कम-इल्मी का इज़हार कर बैठेगा। यही वह लम्हा है जहाँ से फ़िक्र की आज़ादी कमज़ोर पड़ने लगती है।
दरअसल बहुत से लोग इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ हैं कि आज की डिजिटल दुनिया में तवज्जो हासिल करने का सबसे आसान तरीक़ा है, पूरे एतमाद के साथ बात करना और बहुत तवील लिखना। अगर तहरीर में अल्फ़ाज़ का शोर ज़्यादा हो, जुमले पेचीदा हों और बयान में जज़्बाती लहजा शामिल हो, तो अक्सर लोग उसे “इल्मी तजज़िया” समझ बैठते हैं। हालाँकि इल्म की असल पहचान यह नहीं होती। इल्म की पहचान वुज़ूह (स्पष्टता), दलील और दयानतदारी से होती है। तारीख़-ए-फ़िक्र में बहुत से ऐसे अज़ीम मुफक्किर गुज़रे हैं जिन्होंने अपने सबसे गहरे अफ़कार बहुत मुख़्तसर जुमलों में बयान किए। कभी-कभी एक सादा सा जुमला पूरी किताब से ज़्यादा वज़न रखता है। इसके बरअक्स बहुत सी ऐसी तहरीरें भी होती हैं जो सफ़्हों पर फैल जाती हैं, मगर उनके अंदर न तो कोई ठोस दलील होती है और न ही कोई रौशन फ़िक्र।
आज हर शख़्स के हाथ में सोशल मीडिया का मिम्बर मौजूद है। यह एक एतबार से अच्छी बात भी है, क्योंकि इससे इज़्हार-ए-ख़याल की आज़ादी बढ़ी है। मगर इसके साथ एक दूसरा पहलू भी सामने आया है, अब हर शख़्स अपने आप को माहिर और रहनुमा समझने लगा है।
बहुत से लोग सियासी मौज़ूआत पर लिखते हैं, मगर उनकी तहरीरों में न कोई मुस्तनद हवाला होता है, न कोई इल्मी तफ्तीश और न ही किसी मसले की गहरी समझ। वे अक्सर मुख़्तलिफ़ अख़बारों की सुर्ख़ियाँ, कुछ यूट्यूब वीडियोज़ और कुछ पुरानी रिवायतें जोड़कर एक तवील मज़मून तैयार कर देते हैं।
फिर उस मज़मून को इस अंदाज़ में पेश किया जाता है जैसे कोई बहुत बड़ा राज़ दुनिया के सामने लाया जा रहा हो।
और क़ारी, जो पहले ही किसी ख़ास नज़रिये से मुतास्सिर होता है, उसे पढ़कर बेइख़्तियार मुतमइन हो जाता है।
यही वह जगह है जहाँ “तस्दीक़-ए-ख़याल” का अमल शुरू होता है। इंसान अक्सर वही बातें क़ुबूल करता है जो उसके पहले से मौजूद ख़यालात से मेल खाती हों। अगर कोई तवील तहरीर उसके नज़रिये के मुताबिक़ लिखी गई हो, तो वह उसे बिना तफ्तीश के आगे फैलाने लगता है।
धीरे-धीरे वही तहरीर एक “मुसल्लमा हक़ीक़त” की शक्ल अख़्तियार कर लेती है। हालाँकि उसकी बुनियाद बहुत कमज़ोर होती है। दुनिया के हर समाज में यह मसअला मौजूद है। सोशल मीडिया ने इत्तिला (सूचना) के साथ-साथ इश्तिबाह (भ्रम) को भी तेज़ी से फैलाने का ज़रिया बना दिया है।
आज बहुत से लोग मक़बूलियत हासिल करने के लिए तवील तहरीरों का सहारा लेते हैं। उनमें अक्सर जज़्बात को भड़काने वाली ज़बान इस्तेमाल की जाती है। कहीं ख़ौफ़ पैदा किया जाता है, कहीं ग़ुस्सा, और कहीं किसी शख़्स या गिरोह को पूरी तरह मुजरिम बना दिया जाता है। क़ारी को लगता है कि वह कोई गहरा सियासी तजज़िया पढ़ रहा है, मगर असल में वह एक तरफ़ा दास्तान होती है। इसी लिए ज़रूरी है कि हम पढ़ते वक़्त कुछ बुनियादी सवाल अपने ज़ेहन में रखें।
क्या इस तहरीर में पेश किए गए वाक़ियात का कोई मुस्तनद ज़रिया मौजूद है?
क्या मुसन्निफ़ ने मुख़्तलिफ़ पहलुओं को बयान किया है या सिर्फ़ अपनी पसंद का रुख़ इख़्तियार किया है?
क्या जज़्बात ज़्यादा हैं और दलील कम?
क्या किसी पेचीदा मसले को बहुत सादा नतीजे में तब्दील कर दिया गया है?
अगर इन सवालों का जवाब मनफ़ी हो, तो फिर चाहे तहरीर कितनी ही तवील क्यों न हो, उसे हक़ीक़त का दर्जा देना दानिशमंदी नहीं।
इल्म की असल शान उसकी सादगी और दयानतदारी में होती है। एक सच्चा तजज़िया-निगार अक्सर यह एतराफ़ करता है कि दुनिया के बहुत से मसाइल पेचीदा हैं और उनके कई पहलू हो सकते हैं। वह क़ारी को सोचने की दावत देता है, न कि उसे किसी तयशुदा नतीजे तक मजबूर करता है।
इसके बरअक्स जो लोग सिर्फ़ तास्सुब या तब्लीग़ के लिए लिखते हैं, वे अक्सर पूरे यक़ीन के साथ आख़िरी फ़ैसला सुना देते हैं, जैसे सारी हक़ीक़त उन्हीं पर वाज़ेह हो। ऐसी तहरीरों को पढ़ते वक़्त होशमंद रहना ज़रूरी है। आज के दौर में इत्तिला की कसरत है, मगर फ़हम की किल्लत बढ़ती जा रही है। हर रोज़ सैंकड़ों पोस्ट, वीडियोज़ और मज़ामीन हमारे सामने आते हैं। मगर उनमें से बहुत कम वाक़ई तहक़ीक़ और सच्चाई पर मब्नी होते हैं।
इसलिए आज की सबसे बड़ी ज़रूरत “तन्क़ीदी फ़िक्र” है।
हर तहरीर को उसी तरह परखना चाहिए जैसे कोई साइंसदान किसी नज़रिये को परखता है, सवाल करके, दलील देखकर और मुख़्तलिफ़ ज़ावियों से समझकर। क्योंकि अल्फ़ाज़ की कसरत हक़ीक़त की दलील नहीं होती। कभी-कभी सबसे बड़ा झूठ भी बहुत ख़ूबसूरत जुमलों और तवील तहरीरों के पर्दे में छुपा होता है। और कभी-कभी सबसे बड़ी सच्चाई दो सादे जुमलों में सामने आ जाती है।
इसलिए अगली बार जब आप सोशल मीडिया पर कोई बहुत लंबा मज़मून देखें, तो सिर्फ़ उसकी तवीलियत से मुतास्सिर न हों। उसे पढ़िए, समझिए, सवाल कीजिए और फिर अपना फ़ैसला खुद कीजिए। क्योंकि जागरूक क़ारी ही एक सेहतमंद समाज की बुनियाद होते हैं। और हक़ीक़त की तलाश हमेशा अल्फ़ाज़ की तादाद से नहीं, बल्कि फ़िक्र की गहराई से होती है।
तारिक़ अज़ीम तनहा
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