अगर तुकबंदी में कहा जाए तो मंजर कुछ यूँ है
चिराग़ नहीं, यहाँ सियासत का धुआँ है,
हर फैसला इंसानियत नहीं, मुफ़ाद का कुआँ है।
दुनिया की सियासत (Politics) में अक्सर एक ख़याल परोसा जाता है कि कुछ ममालिक (Countries) ऐसे हैं जो चाहें तो जंग रोक सकते हैं, बस इशारा करें और बारूद की बू ख़त्म हो जाए। मगर जब हक़ीक़त की ज़मीन पर कदम रखा जाता है, तो यह ख्वाब एक तिलिस्म (Illusion) से ज़्यादा कुछ नहीं लगता।
यह कहना आसान है कि फलाँ मुल्क जंग रुकवा सकता है, मगर सवाल यह है कि क्या उसके पास वाक़ई वह इख़्तियार (Authority) है, या सिर्फ़ एक सियासी तसव्वुर (Perception) है जो लोगों के ज़हन में बिठा दिया गया है? जब एक मुल्क अपनी मआशियाती (Economic) ज़रूरतों में भी मुकम्मल ख़ुदमुख़्तारी (Autonomy) हासिल नहीं कर पाता, तो वह आलमी जंग के फैसलों पर किस हद तक असरअंदाज़ हो सकता है यह सवाल अपने आप में बहुत कुछ बयान कर देता है।
असल में मसला ताक़त का कम और तरजीहात (Priorities) का ज़्यादा है। जब तक आग दूर जलती है, वह सिर्फ़ एक मंजर होती है लोग उसे देखते हैं, उस पर बहस करते हैं, और कभी-कभी तो उस पर जश्न भी मनाते हैं। मगर जैसे ही वही आग अपने दामन को छूने लगती है, तो बयानिया बदल जाता है। वही लोग जो कल तक जंग की हिमायत (Support) में थे, आज अमन (Peace) की बातें करने लगते हैं।
कल तक थी जो जंग तमाशा, आज वही आफ़त बन बैठी,
जब अपने दामन जले, तब सबको इंसानियत याद आई।
यह दोहरा मिज़ाज (Dual Nature) सिर्फ़ अवाम (Public) तक महदूद नहीं, बल्कि रियासतों की सियासत में भी साफ़ झलकता है। हर फैसला एक तराज़ू (Balance) में तोला जाता है एक पलड़े में इंसानियत, और दूसरे में मुफ़ाद (Interest)। और अक्सर भारी वही पलड़ा होता है जिसमें नफ़ा (Benefit) ज़्यादा हो।
तेल (Oil) और गैस (Gas) इस पूरी कहानी के असल किरदार हैं। जब तक इनकी रवानी (Flow) बरक़रार रहती है, तब तक जंग भी “क़ाबिले-बर्दाश्त” लगती है। मगर जैसे ही सप्लाई (Supply) में रुकावट आती है, कीमतें बढ़ती हैं, और असर रोज़मर्रा की ज़िंदगी तक पहुँचता है तब सियासत का लहजा (Tone) बदल जाता है।
जब तक था सस्ता, तब तक जश्न-ए-जंग था,
महंगा हुआ तो हर लफ़्ज़ में अमन का रंग था।
यह कहना कि कोई एक मुल्क आकर इस जंग को रोक देगा, एक सादा तसव्वुर है। हक़ीक़त यह है कि हर मुल्क अपनी पोज़िशन (Position) को देखकर चलता है, अपने रिश्तों (Relations), अपनी मआशियात (Economy) और अपने सियासी फायदे (Political Interests) को सामने रखकर फैसले करता है। यहाँ “स्टैंड” (Position) भी वही लिया जाता है जो मुफ़ाद के हिसाब से मुनासिब हो।
इसीलिए कभी-कभी एक अजीब तजाद (Contradiction) देखने को मिलता है जहाँ एक तरफ़ बयान इंसानियत के नाम पर दिए जाते हैं, और दूसरी तरफ़ अमल (Action) उसी इंसानियत के खिलाफ़ होता है। यही वजह है कि अवाम के अंदर बेचैनी पैदा होती है, और लोग सवाल करने लगते हैं कि क्या वाक़ई कोई उसूल (Principle) भी है, या सब कुछ सिर्फ़ सियासी खेल (Political Game) है।
आख़िर में बात वही आकर ठहरती है
दुनिया की सियासत में जंग और अमन, दोनों ही अक्सर उसूलों से नहीं, बल्कि ज़रूरतों से तय होते हैं।
यहाँ सच भी बिकता है, और ज़मीर भी खामोश है,
जंग कोई मसला नहीं… बस एक मुनाफ़े का कारोबार है।
तारिक़ अज़ीम तनहा
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