हम जिस दौर में ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं, उसमें किसी भी मौज़ू पर दिल-ओ-दिमाग़ का मुतअस्सिर हो जाना बेहद आसान हो गया है। सोशल मीडिया का असर इस क़दर शदीद है कि इंसान को ख़ुद एहसास भी नहीं होता कि उसके अफ़कार किस तरह बदल रहे हैं।
मैं इस पोस्ट के ज़रिए अपने तमाम नौजवान दोस्तों से अर्ज़ करना चाहता हूँ कि सोशल मीडिया के निज़ाम (एल्गोरिदम) को समझिए। जब आपके दिल में किसी मसले के बारे में कोई ख़याल पैदा होता है, तो क्या होता है? जैसे ही कोई रील या वीडियो जो आपके उन्हीं अफ़कार से मुताबक़त रखती है, आपके सामने आती है, आप ठहर कर उसे देखते हैं।
सोशल मीडिया का एल्गोरिदम उसी लम्हे इस अम्र को पकड़ लेता है। इसके बाद मुसलसल उसी किस्म की वीडियोज़ और रील्स आपकी फ़ीड में आने लगती हैं। इन फ़ीड्स में हक़ीक़त और गुमराही का ऐसा इम्तिजाज होता है कि धीरे-धीरे आपके दिल-ओ-दिमाग़ पर उन्हीं अफ़कार का ग़लबा होने लगता है।
आप और ज़्यादा वीडियोज़ देखते जाते हैं, और फिर एक वक़्त ऐसा आता है कि आपका ज़ेहन मुकम्मल तौर पर मुतअस्सिर (ब्रेनवॉश) हो चुका होता है और आपको इसका एहसास भी नहीं होता।
इसका नतीजा यह हो सकता है कि आप इज़्तिराब (डिप्रेशन) का शिकार हो जाएँ। आपके अंदर ऐसा ग़ज़ब और ग़ुस्सा पैदा हो जाए कि आप नफ़रत और तशद्दुद की तरफ़ माइल हो जाएँ। किसी शख़्स, किसी मज़हब, किसी क़ौम या किसी तबक़े के लिए आपके दिल में शदीद नफ़रत पैदा हो सकती है।
यहाँ तक कि आपकी ज़िंदगी से मोहब्बत कम हो जाए, या आप अपना मुल्क छोड़ कर किसी और जगह जाने का ख़याल करने लगें। यूँ आपकी एक अच्छी-भली ज़िंदगी तबाही की तरफ़ जा सकती है।
जब भी आपके दिल में ऐसी शदीद जज़्बात पैदा होने लगें, तो समझ जाइए कि सोशल मीडिया अपना काम कर रहा है। उसी वक़्त ऐसी फ़ीड्स से फ़ौरन दूरी इख़्तियार कीजिए। अपने दोस्तों और बुज़ुर्गों से बात कीजिए। उन तमाम लोगों और प्लेटफ़ॉर्म्स से अलग हो जाइए जो आपके दिल में ऐसी नफ़रत और तफ़रीक़ के बीज बो रहे हैं।
यक़ीन मानिए इन रास्तों का अंजाम अक्सर इंसानी तबाही ही होता है। नफ़रत कोई फ़ितरी जज़्बा नहीं है। इंसान चाह ले तो इससे दूरी इख़्तियार कर सकता है। उन तमाम पॉडकास्टर्स और इन्फ्लुएंसर्स से तुरंत दूरी बना लीजिए जो हर वक़्त किसी शख़्स, किसी तबक़े, किसी मज़हब या किसी क़ौम के ख़िलाफ़ ज़हर उगलते रहते हैं।
ऐसे लोगों के पास कोई असली इल्म नहीं होता। उन्होंने बस अपनी बात को एतमाद और लफ़्फ़ाज़ी के साथ पेश करना सीख लिया है, जिसमें हक़ीक़त और गुमराही का इम्तिजाज होता है।
हक़ीक़त यह है कि ये लोग इंसान कम और ऐसी जोंक ज़्यादा हैं जो दूसरों का ज़ेहनी सुकून और सेहत चूस कर जीते हैं।
इसलिए ऐ नौजवानो वक़्त रहते होशियार हो जाइए और अपने ज़ेहन व दिल की हिफ़ाज़त कीजिए।
तारिक़ अज़ीम तनहा
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