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ईरान की हिकमत-ए-अमली: क़ीमत-ए-नफ़्त (Crude Oil Prices) $200 प्रति बैरल तक — जंग-ए-मुआशियाती (Economic Warfare) का असली मक़सद

मशरिक़-ए-औसत की सियासत और जंगों की तारीख़ बार-बार इस हक़ीक़त की तरफ़ इशारा करती रही है कि हर मुक़ाबला सिर्फ़ मैदान-ए-जंग में तय नहीं होता। कई बार असल फ़ैसला तोप, मिसाइल और जहाज़ों से नहीं बल्कि मुआशियात (Economy) के ज़रिये होता है। आज ईरान ने बिल्कुल वही रास्ता इख़्तियार किया है जो ज़ाहिर में कमज़ोर मालूम होता है मगर दरअस्ल एक गहरी हिकमत-ए-अमली पर मबनी है।

चंद रोज़ पहले तक अक्सर लोग ये समझ रहे थे कि इसराइल ने ईरान की दिफ़ा-ए-फ़िज़ा (Air Defense) का बड़ा हिस्सा तबाह कर दिया है और अब क़िस्सा ख़त्म हो चुका है। तजज़िया करने वाले अफ़राद और आम लोग दोनों इस गुमान में थे कि जंग का नतीजा लगभग वाज़ेह है। मगर यह तसव्वुर शायद जंग की असल फ़ितरत को समझने में एक बड़ी ग़लती थी।

ईरान का मक़सद इस मुक़ाबले को रिवायती मायनों में जीतना नहीं है। तेहरान की क़ियादत इस जंग को इतना महँगा बनाना चाहती है कि फ़तह (Victory) ख़ुद बे-मानी हो जाए। यह दो बिल्कुल मुख़्तलिफ़ खेल हैं और बहुत से लोग अब भी इस फ़र्क़ को समझ नहीं पा रहे।

ईरान अब सिर्फ़ अस्करी मुक़ाबला नहीं कर रहा। दरअस्ल यह जंग-ए-मुआशियाती (Economic Warfare) लड़ रहा है। इस जंग का असल निशाना न कोई फ़ौजी अड्डा है, न कोई जंगी जहाज़ और न ही सिर्फ़ इसराइल। ईरान की नज़र उस चीज़ पर है जो पूरी दुनिया की मुआशियात को हिला सकती है  क़ीमत-ए-नफ़्त (Oil Price)।

ईरान की पसदारान-ए-इंक़िलाब (IRGC – Islamic Revolutionary Guard Corps) ने अपनी हिकमत-ए-अमली लगभग साफ़ कर दी है। मक़सद एक ही है — क़ीमत-ए-नफ़्त को $200 प्रति बैरल तक पहुँचा देना। ईरान के लिये जीत का मतलब यह नहीं होगा कि किसी आधुनिक लड़ाकू जहाज़ को गिरा दिया गया। बल्कि जीत का मतलब होगा कि नफ़्त इतना महँगा हो जाए कि दुनिया की मुआशियात काँप उठे।

ज़रा तसव्वुर कीजिए कि अगर नफ़्त $200 प्रति बैरल तक पहुँच जाए तो क्या होगा। अरब ममालिक की इक़्तिसादियत (Economies) पर भारी दबाव पड़ेगा। यूरोप के रहनुमा वॉशिंगटन को फ़ोन करते नज़र आएँगे। अमेरिका के पेट्रोल पंप पर खड़े अफ़राद ग़ुस्से और बेचैनी का इज़हार करेंगे। यह वही लम्हा होगा जब सियासी फ़ैसले बिल्कुल नए दबाव के तहत लिये जाएँगे।

ईरान इस मक़सद को हासिल करने के लिये एक दिलचस्प और असरदार तरीक़ा इस्तेमाल कर रहा है। तक़रीबन 15,000 डॉलर के शाहिद (Shahed) ड्रोन के ज़रिये अरबों डॉलर के नफ़्ती ढाँचों पर हमले किये जा रहे हैं। यह अस्री जंग का नया मॉडल है जहाँ कम लागत के हथियार बहुत बड़े मुआशियाती नुक़सान पैदा कर सकते हैं।

इसके साथ साथ होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz – दुनिया का अहम नफ़्ती समंदरी रास्ता जहाँ से लगभग 20% आलमी तेल सप्लाई गुज़रती है) में समंदरी सुरंगें (Naval Mines) भी अहम किरदार अदा कर सकती हैं। अगर इस रास्ते में रुकावट पैदा हो जाए तो पूरी दुनिया की नफ़्त सप्लाई फ़ौरन मुतास्सिर हो सकती है।

नफ़्ती पाइपलाइन, स्टोरेज टैंक, लॉजिस्टिक हब और रिफ़ाइनरी पर होने वाले हमले भी इसी हिकमत-ए-अमली का हिस्सा नज़र आते हैं। यह सब कोई बे-तरतीब या घबराहट में उठाया गया क़दम नहीं है। बल्कि यह बरसों की तैयारी और मंसूबाबंदी का नतीजा है। ईरान इस तरह की जंग के लिये दशकों से तैयारी करता आया है।

हर हमला दरअस्ल एक ही मक़सद की तरफ़ इशारा करता है, सप्लाई को रोकना। और जब सप्लाई रुकती है तो क़ीमत बढ़ती है। जब क़ीमत बढ़ती है तो पूरी दुनिया परेशान हो जाती है। तेहरान की सोच बहुत सीधी है। जिस दिन नफ़्त $200 प्रति बैरल पहुँच जाएगा, उस दिन ईरान अपने आप को फ़ातेह समझेगा। इसलिए नहीं कि कोई जहाज़ गिराया गया। बल्कि इसलिए कि दुनिया की मुआशियात पर इतना दबाव आ चुका होगा कि आलमी रहनुमा जंग रोकने के लिये मजबूर हो जाएँगे।

आज की दुनिया में जंग सिर्फ़ फ़ौजी क़ुव्वत का इम्तिहान नहीं होती। कई बार असल हथियार मुआशियात होता है। ईरान इसी उसूल को इस्तेमाल कर रहा है। इसलिए अगर आप इस जंग की असल कहानी समझना चाहते हैं तो सिर्फ़ मिसाइलों की गिनती मत देखिए। असल कहानी कहीं और लिखी जा रही है।

असल हथियार क़ीमत-ए-नफ़्त है।
और इस जंग का असली नतीजा भी वहीं तय होगा।

तारिक़ अज़ीम तनहा

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