यह जो फिज़ा में एक बेचैनी सी तैर रही है, यह महज़ ख़बरों का शोर नहीं… बल्कि बयानियों की वो धुंध है, जिसमें हक़ीक़त की शक्ल धुंधली पड़ जाती है।
कहा जा रहा है कि क्यूबा अंधेरों में डूब चुका है, अमेरिका ने उसकी सांसें रोक दी हैं, और रूस एक तेल से भरे जहाज़ के साथ मैदान में उतर आया है मानो बस एक चिंगारी बाकी है और दुनिया जंग-ए-अज़ीम की आग में झुलस जाएगी।
मगर सवाल यह है कि क्या मंज़रनामा वाक़ई इतना सीधा और सादा है?
क्यूबा की हालत बेशक नाज़ुक है। बरसों की पाबंदियां, कमज़ोर मआशियत और ईंधन की किल्लत ने वहां के निज़ाम-ए-ज़िंदगी को हिला कर रख दिया है। अस्पतालों की रौशनी मंद है, सड़कों पर सन्नाटा है, और अवाम एक गैर-यक़ीनी कल के साए में जी रही है।
लेकिन यह तस्वीर एक-रुख़ी नहीं… यह मुकम्मल तबाही नहीं, बल्कि लंबे दबाव का नतीजा है, जिसे सनसनीख़ेज़ अल्फ़ाज़ में “अंधेरे में डूबा मुल्क” बना दिया गया है।
फिर आता है रूसी जहाज़ का क़िस्सा, एक ऐसा बयानिया जिसे इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे अमेरिका के पास दो ही रास्ते बचे हों: या तो जहाज़ रोके और जंग मोल ले, या उसे जाने दे और अपनी साख गंवा दे।
हालांकि हक़ीक़त यह है कि आलमी सियासत शतरंज की बिसात है, बच्चों का खेल नहीं। यहां फैसले जज़्बात से नहीं, बल्कि मफ़ादात और क़वानीन के पेचीदा जाल में लिए जाते हैं। हर रोका गया जहाज़ जंग नहीं बन जाता, और हर गुजरता हुआ जहाज़ शिकस्त की निशानी नहीं होता।
असल सच्चाई यह है कि दुनिया इस वक्त किसी एक धमाके के किनारे खड़ी नहीं… बल्कि कई छोटे-छोटे तनाव एक साथ घूम रहे हैं। मिडिल ईस्ट में कशमकश, यूक्रेन का मोर्चा, एशिया की ताक़तों का उभार ये सब अपनी-अपनी जगह मौजूद हैं, मगर इन सबको जोड़कर “विश्व युद्ध” का नक्शा खींच देना एक जज़्बाती मुबालग़ा है, हक़ीक़त नहीं।
यह दौर हथियारों से ज़्यादा बयानियों की जंग का है।
जहां एक खबर को इस तरह पेश किया जाता है कि वह ख़ौफ़ बन जाए, और एक वाक़िये को इस तरह बढ़ाया जाता है कि वह तक़दीर लगने लगे।
सच यह है कि दुनिया अब भी एक नाज़ुक संतुलन पर क़ायम है कमज़ोर ज़रूर है, मगर टूटी नहीं अब तक। और सबसे बड़ा ख़तरा शायद जंग नहीं… बल्कि वो कहानियां हैं जो हमें यह यक़ीन दिलाने लगती हैं कि जंग अब लाज़िमी है।
क्योंकि जब इंसान यह मान लेता है कि तबाही तय है… तो फिर वह खुद भी उसके रास्ते आसान करने लगता है।
तारिक़ अज़ीम तनहा
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