दोस्तो - आप सब से एक दिल की बात कहने का मन है सो कर रहा हूं । पिछले कुछ अरसे से महसूस कर रहा हूं के सोशल मीडिया अगर अदब और शायरी और संगीत के हक़ में ज़ियादा फायदेमंद साबित हुआ है तो उससे कहीं ज़ियादा नुक़सान दायक भी हुआ है । उन शायरों और सिंगर्स के लिए जो बहुत बेहतरीन शायर हैं, गायक है लेकिन उन्हें वो मक़ाम वो प्लेटफॉर्म नहीं मिला जो मिलना चाहिए था । ये सब पहले भी होता आया होगा। मगर आज कल बहुत ज़ियादा देखने को मिल रहा है । हैरानी इस बात की है अधिकतर नॉर्मल और फूहड़ शायरों और कवियों ने मुशायरों पर कब्ज़ा किया हुआ है। नादान कन्वीनर भी इस बात के ज़िम्मेदार हैं जिन्हें शायरी की गहरी समझ नहीं बस किसी भी शायर की रील के व्यूअर्स देख कर उसको बेहतरीन शायर या कवि समझ लेते है । या किसी मारुफ़ शायर के कहने पर उस शायर,शायरात, कवि को लगातार मुशायरों में कलाम पेश करने का मौक़ा देते रहते हैं । ये उनके लिए तो बहुत अच्छी बात हो सकती है लेकिन इसका नुक़सान ये होता है के आम इंसान जो शायरी को पसंद तो करते है मगर बेहतरीन शायरी से जुदा और महदूद रह जाते हैं उनको लगता है वो जो शायरी मुशायरों के हवाले से सुन रहे हैं बस वही बेहतरीन शायर और शायरात की शायरी है बाक़ी तो सब हल्के फुल्के शायर ही होंगे । मैं किसी भी शायर से हसद की बात नहीं कर रहा। जब किसी की भी क़िस्मत जागती है तो मिट्टी भी सोना हो जाती है । मगर उन अच्छे शायरों की क़िस्मत पर दुख होता है जिसका कारण ज़ियादातर वो नासमझ कन्वीनर बनते हैं जो बिना सोचे समझे बस बार बार उन्हीं शायरों शायरात को बुलाते रहते हैं जिनका मुक़ाम इतना नहीं होता जितना उनको मान लिया जाता है बस वो ही गिनती के शायर, शायरात हर जगह नज़र आते रहते हैं।
मुझे दुख है के अंतरराष्ट्रीय स्तर की संस्थाएं ,तंज़ीम के फाउंडर्स और कन्वीनर ये सब कर रहे हैं। उन तक उन अच्छे शायरों की शायरी की खुशबू ही नहीं पहुंच रही उनकी इस पक्षपाती सोच को मेरा सलाम ।
मेरी दुआ है के जो भी अच्छे शायर, कवि, शायरात है उन्हें वो मक़ाम मिले जिसके वो हक़दार हैं और अदब में जो आजकल बेहद गिरावट आई है उसमें मुनासिब बदलाव हो ।
मेरा मक़्सद किसी भी शायर या शायरात को दुख पहुंचाना नहीं है । मैं अदब और अच्छे शायरों शायरात का बहुत एहतराम करता हूं मगर जो ख़ामियां मैंने महसूस की वो आप लोगों से सांझा करके अपने मन का बोझ हल्का कर लिया ।
अपने इन शेरों से अपनी बात को ख़त्म करता हूं ।
जिन्हें तमीज़ नहीं धूप ख़र्च करने की
सुना है जेब में वो आफ़ताब रखते हैं
....
"मुझको बहरा ही करके छोड़ेंगे
उफ़ ये ख़ामोश रहने वाले लोग"
।।।।
कॉपीड नवीन नीर
तारिक़ अज़ीम तनहा
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