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जंग की नई सूरत: लंबी जंग, सख़्त निज़ाम और बढ़ती आग का बयानिया

कुर्सी की पेटी बाँध लीजिए, क्योंकि जो मंजर अब उभर रहा है, वह किसी जल्द ख़त्म होने वाली जंग का नहीं, बल्कि एक तवील (Long) और पेचीदा मरहले (Phase) की इब्तिदा (Beginning) है। फ़िज़ा में जो तनाव है, वह ठहरने के बजाय हर गुज़रते लम्हे के साथ और शदीद होता जा रहा है, और हालात यह इशारा दे रहे हैं कि अब यह टकराव एक मुकम्मल जंग (Full-scale Conflict) की शक्ल इख़्तियार कर सकता है।

ईरान ने अपने अम्नी निज़ाम (Security Structure) के अहम चेहरों की हलाकत (Elimination) को तस्लीम (Accept) कर लिया है, और इसके साथ ही यह पैग़ाम भी दे दिया है कि जवाब ज़रूर आएगा—और वह पहले से कहीं ज़्यादा सख़्त और असरअंदाज़ होगा। मगर इस पूरे वाक़िये का असल पहलू यह है कि इन नुक़्सानात (Losses) के बावजूद ईरान की फौजी मशीनरी (Military Machine) में कोई इन्किसार (Collapse) नज़र नहीं आता। इसकी वजह साफ़ है यह निज़ाम अफ़राद (Individuals) पर नहीं, बल्कि एक मुकम्मल ढांचे (System) पर क़ायम है, जिसकी मिसाल Islamic Revolutionary Guard Corps जैसे इदारों से मिलती है, जहाँ हर ओहदे के लिए मुनासिब जानशीन (Successor) पहले से तय होता है।

यानी यहाँ एक शख्स की जगह दूसरा लेने में देर नहीं लगती, बल्कि हर नई मौत इस निज़ाम को और ज़्यादा सख़्त, और उसके इरादों को और ज़्यादा संगीन बना देती है। इंतिक़ाम (Revenge) की जो आग पहले सुलग रही थी, अब वह और भड़कने लगी है।

पिछले कुछ रोज़ में जो हमले देखे गए हैं, वे अब इत्तेफाक़ (Random) नहीं रहे, बल्कि एक मुक़र्रर पैटर्न (Defined Pattern) का हिस्सा बन चुके हैं। ड्रोन (Drones) और मिसाइलों की तादाद में मुसलसल (Continuous) इज़ाफ़ा हो रहा है, और जो इशारे मिल रहे हैं, वह यह बताते हैं कि आने वाले दिनों में यह शिद्दत (Intensity) और बढ़ सकती है। यह महज़ जवाबी कार्रवाई नहीं, बल्कि एक मुकम्मल हिकमत-ए-अमली (Strategic Doctrine) का हिस्सा बनती जा रही है।

दूसरी जानिब, इज़रायल और अमेरिका की कोशिश यह है कि ईरान की आला क़ियादत (Top Leadership) को निशाना बनाकर उसके फैसलों की रफ़्तार और असर को कमज़ोर किया जाए। मगर इसी के बरअक्स, ईरान भी अब इस कोशिश में होगा कि वह जवाब में सामने वाले के अहम चेहरों तक पहुंचे। फर्क सिर्फ़ इतना है कि इज़रायल जैसी रियासत (State) इस तरह की खबरों को ज़ाहिर (Public) होने से पहले ही रोक लेती है और उसकी यह ख़ामोशी अपने आप में एक मुकम्मल बयान होती है।

मशरिक़-ए-वुस्ता (Middle East) के कई मुक़ामात पर अमेरिका की फौजी सरगर्मियाँ (Military Activities) पहले ही महदूद (Limited) हो चुकी हैं। कुछ अड्डों (Bases) से अब भी ऑपरेशन जारी हैं, मगर वह भी अब ख़तरे से बाहर नहीं रहे। हालात इस तरफ़ इशारा कर रहे हैं कि यह ठिकाने भी आने वाले वक्त में सीधे निशाने पर आ सकते हैं।

इसी दरमियान, लेबनान (Lebanon) का मोर्चा भी गर्म हो चुका है। ज़मीनी दरअंदाज़ी (Ground Infiltration), कम्युनिकेशन (Communication Systems) को मुअत्तल (Disrupt) करने की कोशिशें, और मुख़्तलिफ़ दिशाओं से दबाव, यह सब इस बात की दलालत (Indication) करते हैं कि जंग अब एक ही मैदान तक महदूद नहीं रही, बल्कि कई सिम्तों (Directions) में फैल चुकी है।

यह पूरा मंजर अब एक ऐसे मरहले में दाख़िल हो चुका है जहाँ हर अगला दिन, पिछले से ज़्यादा संगीन साबित हो सकता है। यह अब कोई छोटी या मुक़्तसर झड़प (Short Conflict) नहीं रही बल्कि एक तवील जंग की सूरत लेती हुई दिखाई दे रही है, जिसमें सब्र, रणनीति और वक्त तीनों की कड़ी आज़माइश होने वाली है।

आख़िर में बस इतना समझ लीजिए यह आग अब बुझने के लिए नहीं, बल्कि फैलने के लिए भड़की है…
और इस बार कहानी वाक़ई लंबी चलने वाली है।

तारिक़ अज़ीम तनहा

Keywords:
Iran Israel war analysis
Middle East war escalation
Iran military system strategy
Drone missile warfare trend
Long war prediction Middle East
Geopolitical conflict analysis
US Israel Iran tension
Modern warfare escalation
Lebanon front conflict
Global security crisis

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