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Showing posts with the label #MiddleEast

मशरिक़-ए-वुसता की सुलगती जंग: ताक़त, सियासत और इंसानियत का इम्तिहान

इज़राइल ने जंग में हुए नुक़सान की मीडिया कवरेज पर सख़्त पाबंदी आइद कर दी है। कहा जा रहा है कि तेल अवीव, यरूशलेम और पूरे इज़राइल में ईरानी मिसाइलों से होने वाली तबाही की वीडियोग्राफ़ी और तस्वीरें लेने पर सख़्त रोक लगा दी गई है। यहाँ तक कि इन वीडियोज़ और तस्वीरों को इज़राइल से बाहर भेजने पर भी सख़्त क़िस्म की मनाही कर दी गई है। हुकूमत का कहना है कि इससे मुल्क की सिक्योरिटी और फ़ौजी मुक़ामात से जुड़ी मालूमात दुश्मनों तक पहुँच सकती है, इसलिए ऐसी रिपोर्टिंग पर पाबंदी ज़रूरी समझी गई। दूसरी तरफ़ अमरीका और इज़राइल लगातार यह दावा कर रहे हैं कि उनके हमलों से ईरान को बहुत बड़ा नुक़सान पहुँचा है। मगर अगर वाक़ई ईरान इतनी बुरी तरह तबाह हो चुका है तो फिर वह हथियार क्यों नहीं डाल रहा? जो अमरीका जंग के आग़ाज़ में यह कह रहा था कि सिर्फ़ 48 घंटों में ईरान में हुकूमत तब्दील हो सकती है, अब उस जंग को बारह दिन से ज़्यादा गुज़र चुके हैं और हालात अब भी नाज़ुक बने हुए हैं। ईरानी क़ियादत किसी क़िस्म के मुआहिदे या समझौते के लिए तैयार नज़र नहीं आती। कई तजज़ियाकार यह सवाल भी उठा रहे हैं कि कहीं इज़राइल के साथ खड़...

अमेरिका युद्ध कैसे बेचता है? वियतनाम से इराक़ तक और ईरान में क्यों फँस सकता है

अमेरिका ने वियतनाम युद्ध, खाड़ी युद्ध और इराक़ युद्ध के दौरान अपनी जनता को युद्ध कैसे “बेचा”? इतिहास, मीडिया और ईरान संघर्ष का विश्लेषण। अमेरिका अपनी जनता को युद्ध कैसे बेचता है? आधुनिक राजनीति में युद्ध केवल रणभूमि में नहीं लड़ा जाता, बल्कि मीडिया, संस्कृति और जनमत के स्तर पर भी लड़ा जाता है। अमेरिका इसका शायद सबसे बड़ा उदाहरण है। अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही विश्व राजनीति में अपनी ताक़त स्थापित करनी शुरू कर दी थी। पर्ल हार्बर के अलावा अमेरिकी मुख्यभूमि को बहुत कम नुकसान हुआ, जबकि यूरोप पूरी तरह तबाह हो चुका था। इसी आर्थिक और सैन्य बढ़त के कारण अमेरिका जल्दी ही एक वैश्विक शक्ति बन गया। इसके बाद परमाणु हथियारों का निर्माण और सोवियत संघ के साथ कोल्ड वॉर शुरू हुआ। वियतनाम युद्ध और अमेरिकी समाज का विद्रोह सब कुछ तब बदल गया जब अमेरिका वियतनाम युद्ध में फँस गया। यह वह युद्ध था जिसमें: बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक मारे गए युद्ध लंबा और महँगा साबित हुआ अंततः अमेरिका को पीछे हटना पड़ा 1960 और 1970 के दशक में अमेरिका में एंटी-वॉर मूवमेंट तेज़ हो गया। संगीतकारों और कलाकारों ने भी...

क्या पश्चिमी एशिया में अमरीकी असर का दौर ख़त्म हो रहा है?

▪️इस्राइली सहाफ़ी अलोन मिज़राही ने अपने एक तजज़िये में लिखा है: “हम तारीख़ को अपनी आँखों के सामने वक़ूअ पज़ीर होते देख रहे हैं। तमाम तवक़्क़ोआत के बरअक्स, ईरान इस वक़्त अमरीकी फ़ौजी अड्डों को इस क़दर गहराई और इस क़दर फ़ैसला-कुन अंदाज़ में निशाना बना रहा है कि दुनिया अभी तक इस मंजर को समझने के लिए तैयार ही नहीं। सिर्फ़ चार रोज़ के अंदर ईरान ने पूरे इलाक़े में अपने फ़ौजी असर-ओ-रसूख़ का दायरा काफ़ी वसीअ कर लिया है। ईरान ने दुनिया के सबसे क़ीमती और महंगे फ़ौजी अड्डों, अस्लाहे और निज़ामात को अपना निशाना बनाया है। बहरीन, कुवैत, क़तर और सऊदी अरब में मौजूद अमरीकी अड्डे दुनिया के सबसे बड़े और अहम अस्करी ठिकानों में शुमार किए जाते हैं। इन्हें तामीर करने में कई दशकों की मेहनत और खरबों डॉलर की सरमायाकारी शामिल रही है। यूँ समझिए कि तीस बरस से ज़्यादा के अस्करी इख़राज़ात का बड़ा हिस्सा अब धुएँ में तब्दील होता नज़र आ रहा है। हम देख रहे हैं कि करोड़ों डॉलर क़ीमत के रडार चंद लम्हों में नेस्त-ओ-नाबूद हो रहे हैं। मुकम्मल फ़ौजी छावनियाँ ख़ाली कर दी गयी हैं, कुछ को आग के हवाले कर दिया गया है और ...

From Superpowers to Surrender: The Harsh Reality of Modern Warfare

पूर्व सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर 20 लाख बम गिराए, लेकिन जंग हार गया।  अमेरिका ने वियतनाम पर 75 लाख बम गिराए, पर हारकर भागना पड़ा।  फिर अमेरिका ने अफगानिस्तान पर 2 लाख बम गिराए, तब भी तालिबान डटा रहा।  सिर्फ़ बम गिराने से अगर जंग जीता गया होता तो आज ईरान समझौते की टेबल पर होता।  लेकिन, कल अमेरिका ने तकरीबन पूरे मिडिल ईस्ट से भागना ठीक समझा।  सारे दूतावास बंद। सैनिक होटलों में और अमेरिकी मदद बंद। यही ईरान का वॉर मॉडल है, जिसकी ताकत भारत में नहीं है।  भारत अब सुविधाभोगी है। वह उस 60–70 के दशक में नहीं लौटना चाहता, जब हमने लड़ाइयां जीती थी।  हमें खाने को चाइनीज चाहिए, पिज्जा चाहिए, पीने को कोक। शॉपिंग को आलीशान मॉल, चलने को चमचमाती सड़कें और दौड़ने को कार।  हमारी इकॉनमी बेबस है और इस विकास को कायम रखने की कोई भी कीमत चुकाकर हम कॉम्प्रोमाइज्ड होने के लिए तैयार हैं।  नतीज़ा–सामने एक सरेंडर का चेहरा है। एक भ्रष्ट, आतंकी सत्ता।  कानून–व्यवस्था को एक तरफ रख भी दें तो इस विकास की हम क्या कीमत चुका रहे हैं? अपनी आत्मनिर्भरता और सार्वभौमिकता को गि...