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सफ़ारतख़ाना-ए-अमरीका का मुहासिरा: इंक़िलाब-ए-ईरान, क़िस्सा-ए-रहनुमाई और ‘October Surprise’ का धुंधलका

ईरान जंग की सूरत-ए-हाल में है, तो तारीख़ की कई पुरानी दास्तानें फिर सतह पर उभरने लगी हैं। सोचा कि आज शाम मैं भी एक वाक़िआ बयान करूं। सन 1979 में ईरान में इंक़िलाब-ए-इस्लामी बरपा हुआ। Ayatollah Ruhollah Khomeini की क़ियादत में Mohammad Reza Pahlavi की हुकूमत का ख़ात्मा हुआ। शाह अपने अहल-ए-ख़ाना के साथ यह कहकर मुल्क छोड़ गए कि वह महज़ “तफ़रीह” पर जा रहे हैं। पहले Egypt, फिर Morocco, Bahamas और Mexico गए। बाद में मालूम हुआ कि उन्हें सरतान (कैंसर) है, और इलाज के लिए वह New York City पहुंच गए। यही बात ईरान में शदीद ग़ज़ब का सबब बनी। 4 नवंबर 1979 को U.S. Embassy Tehran पर हमला हो गया। ग़ुस्साए तलबा ने सफ़ारतख़ाने का मुहासिरा कर लिया और आखिरकार 66 अमरीकी अहलकारों को यरग़माल बना लिया (बाद में 14 रिहा हुए, मगर 52 अफ़राद 444 दिन तक कैद रहे)। दुनिया भर में ये वाक़िआ सुर्ख़ियों में रहा। उस वक़्त के अमरीकी सद्र Jimmy Carter के लिए ये सियासी आज़माइश बन गया। उन्होंने मुतअद्दिद कूटनीतिक कोशिशें कीं, इक़्तिसादी पाबंदियां लगाईं, मगर खुमैनी हुकूमत झुकने को तैयार न हुई। ईरान अमरीका को “शैतान-ए-अकबर” क़रार...