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सौरभ द्विवेदी और पुरुषोत्तम अग्रवाल Saurabh Dwivedi and Purshottam Aggarwal JNU Delhi

सौरभ द्विवेदी के आगे फैलने का नहीं; यहां तक कि पुरुषोत्तम अग्रवाल को भी नहींः कुछ लोग सवाल करने के बजाय भाषण देने लग जाते हैं, उससे आज बचना है. अधिकतम तीन वाक्यों में अपना सवाल करना है… मॉडरेटर सौरभ द्विवेदी की इस स्पष्ट घोषणा के बावज़ूद प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल सवाल करने के नाम पर फैलने लग जाते हैं और तब द्विवेदी इस बात का ख़याल नहीं करते कि अग्रवाल उनके गुरु हैं जिन्हें वो इस बातचीत के दौरान मेरे उस्ताद- मेरे उस्ताद से लेकर उनके कॉलम मुखामुखम तक शामिल करते हुए “ज्ञान परिवेश” की निर्मिति करते हैं. द्विवेदी के पास ऐसे अनगिनत भभूत होते हैं और वो जानते हैं कि किस भभूत से कब, कैसे माहौल ऑब्लिक भौकाल बनाया जाता है. प्रोफेसर अग्रवाल जैसे ही फैलने की कोशिश करते हैं, द्विवेदी अपने इस उस्ताद और जेएनयू से अग्गा-पिच्छा संबंध किनारे रखकर एकदम पेशेवर अंदाज़ पर उतर आते हैं- प्रोफेसर, एक मिनट-एक मिनट..करने के साथ दो-तीन निर्गुणिया वाक्य के टुकड़े का इस्तेमाल करके साफ़ जतला देते हैं कि उस्ताद ! आज की इस महफ़िल में सिर्फ मैं फैल सकता हूं बल्कि हम कोई भी महफ़िल तब तक नहीं सजाते या उसका हिस्सा बनते हैं ...