सौरभ द्विवेदी के आगे फैलने का नहीं;
यहां तक कि पुरुषोत्तम अग्रवाल को भी नहींः
कुछ लोग सवाल करने के बजाय भाषण देने लग जाते हैं, उससे आज बचना है. अधिकतम तीन वाक्यों में अपना सवाल करना है…
मॉडरेटर सौरभ द्विवेदी की इस स्पष्ट घोषणा के बावज़ूद प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल सवाल करने के नाम पर फैलने लग जाते हैं और तब द्विवेदी इस बात का ख़याल नहीं करते कि अग्रवाल उनके गुरु हैं जिन्हें वो इस बातचीत के दौरान मेरे उस्ताद- मेरे उस्ताद से लेकर उनके कॉलम मुखामुखम तक शामिल करते हुए “ज्ञान परिवेश” की निर्मिति करते हैं. द्विवेदी के पास ऐसे अनगिनत भभूत होते हैं और वो जानते हैं कि किस भभूत से कब, कैसे माहौल ऑब्लिक भौकाल बनाया जाता है. प्रोफेसर अग्रवाल जैसे ही फैलने की कोशिश करते हैं, द्विवेदी अपने इस उस्ताद और जेएनयू से अग्गा-पिच्छा संबंध किनारे रखकर एकदम पेशेवर अंदाज़ पर उतर आते हैं- प्रोफेसर, एक मिनट-एक मिनट..करने के साथ दो-तीन निर्गुणिया वाक्य के टुकड़े का इस्तेमाल करके साफ़ जतला देते हैं कि उस्ताद ! आज की इस महफ़िल में सिर्फ मैं फैल सकता हूं बल्कि हम कोई भी महफ़िल तब तक नहीं सजाते या उसका हिस्सा बनते हैं जहां मेरे ख़ुद के फैलने की गुंजाईश नहीं होती.
प्रो. अग्रवाल, सौरभ द्विवेदी के उस्ताद रहे हैं, जेएनयू में एमए, एम.फिल् के दिनों में न केवल पढ़ाया है बल्कि इनके शोध निर्देशक भी रहे हैं. आपको इस वाक्य का क्रम उल्टा लग रहा होगा. क़ायदे से होना ये चाहिए कि सौरभ द्विवेदी प्रोफेसर अग्रवाल के शिष्य रहे हैं…इसी क्रम में वाक्य आगे बढ़े..
मैंने क्रम इसलिए उलट दिया कि सौरभ द्विवेदी ने जब लल्लनटॉप के अपने शो( 2023) में इंटरव्यू के लिए न्यूजरूम में बुलाते हैं तो आते ही पैर छूकर अपने दर्शकों के आगे जाहिर कर देते हैं कि हम चाहे कितने भी ऊँचे आइवरी टावर पर चढ़ जाएं, गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वाह एवं”संस्कार” से अपने को अलग नहीं कर सकते. इधर प्रो. अग्रवाल, द्विवेदी की पीठ पर शाबाशी भरे अंदाज़ में यूं हाथ फेरते हैं जैसे हार की जीत( सुदर्शन) में बाबा भारती अपने घोड़े “सुल्तान” का खरहरा करते हुए फेरा करते. गर्व से भरे अग्रवाल आगे की बातचीत शुरु करते हैं और उनका मोस्ट सुयोग्य शिष्य लगभग 1 घंटे 40 मिनट की बातचीत में कई बार उन्हें एहसास कराने लग जाता है कि गुरुदेव ! आपको अंदाज़ा नहीं है कि आपसे द लल्लनटॉप पर आपसे बातचीत करके आप पर कितना बड़ा एहसान कर रहा हूं. आप होंगे जेएनयू के प्रोफेसर, यूपीएससी के बोर्ड मेंबर और दर्जनों किताब के लेखक सह प्रख्यात हिन्दी आलोचक लेकिन जो दौर बदला है, उसमें प्रासंगिक बने रहने का पैमाना बदला गया है. प्रो.अग्रवाल थोड़ा-थोड़ा इस बात को समझते हैं और तब गुरु-शिष्य के इस अटूट संबंध से अलग पेशेवर अंदाज़ में द्विवेदी के लिए न्यूजरूम में ऐसा माहौल बनाते हैं कि बाक़ी मीडियाकर्मी-दर्शक के भीतर कसक सी उठने लगे- क्या मेरे उस्ताद मेरे लिए कभी ऐसा करेंगे ?
प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल और सौरभ द्विवेदी में कई स्तर पर समानता है और संभवतः यही समानता एक-दूसरे को जोड़ती भी है और एक-दूसरे के प्रति सतर्क भी करती है-
दोनों बेहद महत्वाकांक्षी प्राणी हैं और अपनी महत्वकांक्षा से पवित्र जीवन में किसी और चीज़ को नहीं मानते. वो इसे खूब अच्छे से पालते-पोसते हैं और इसके लिए वो मानवीय संबंधों को इतने क़रीब ले जाकर महत्वाकांक्षा के साथ नत्थी करते हैं कि आप किसी फनकार की कला की तरह उन पर मोहित होकर कह उठे- वाह अग्रवालजी वाह ! वाह द्विवेदी वाह ! ये आसान हुनर नहीं है वैसे..
दूसरा कि दोनों कहीं भी हों, ख़ुद को केन्द्र में रखते हैं. केन्द्र से एक इंच इधर से इधर होने पर जैसे पहिए के ढेले होने पर गाड़ी की चाल बदल जाती है, वैसे ही दोनों की भाव-भंगिमा, चेहरे का रंग बदलने लग जाता है. दुनिया जहां की बात करते हुए दोनों जहाज के पंछी की तरह अपनी केन्द्रीयता की तरफ लौट आते हैं. आपकी-हमारी तरह नहीं कि बांस लादकर हीरामन हो जाएं.
तीसरा कि वो ऑव्जर्ब किए जाने की हद तक ख़ुद को केन्द्र में रखने और अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर करने में नहीं हिचकते जो कि साहस का काम है और चौथी बात ये कि
ये अपने चारों तरफ के लोगों को भूसे की गठरी मानकर चलते हैं लेकिन जैसे ही इनमें से कोई जतला दे कि भई हम अनाज से भरे गठ्ठर हैं तो एकदम से व्यावहारिक कुशलता पर लौट आते हैं.
दोनों के भीतर ये वो गुण हैं जो इन्हें एक मक़ाम तक ले जाती है और ज़माने के आगे बेहद सफल शख़्सियत के तौर पर पहचान दिलाती है. लेकिन दोनों एक बुलबुल तक की उपस्थिति से असुरक्षित महसूस करने लग सकते हैं जब उन्हें लगता है कि इसके होने से हमारा अपना राग मद्धिम पड़ सकता है. अब ऐसे में,
“Does God Exist” पर हो रही बातचीत के दौरान जब प्रो. अग्रवाल सवाल करने उठे तो दूसरे ही वाक्य में महफ़िल से ठीक-ठाक ताली बटोरकर ले गए. ताली ने उन पर इनो जैसा इन्सटेंट असर किया. अब वो सवाल के नाम पर फैलने लगे.
प्रो. अग्रवाल के फैलने की दूसरी वजह ये भी रही कि बातचीत के मॉडरेटर और उनके शिष्य सौरभ द्विवेदी ने शुरुआत में ही कहा- हमारे उस्ताद ने हमें “ सहमति का साहस, असहमति का विवेक” सिखाया है. उस्ताद क्या, जो भी देश के किसी पत्र-पत्रिका की स्टॉल से गुज़रा हो तो मोटे-मोटे अक्षरों में, समयांतर पत्रिका के मुख्यपृष्ठ पर छपा ये वाक्य दिख जाएगा. 25 साल में कभी तो नज़र गयी ही होगी. इसके साथ कि एक बार वो मुखामुखम की चर्चा करते हैं. प्रो. अग्रवाल यहीं समझने में चूक जाते हैं कि
इस मंच पर सौरभ द्विवेदी अपना सुयोग्य शिष्य की हैसियत से अपनी बातचीत में मेरा जिक़्र नहीं कर रहा बल्कि अपने लिए माहौल सैट कर रहा है. वो बता रहा है कि इस ऐतिहासिक बातचीत के लिए अखिल भारतीय स्तर पर कैसे सबसे सुयोग्य व्यक्ति है ! किस लोकतांत्रिक और बराबरी के परिवेश में मेरी लिखाई-पढ़ाई हुई है कि परस्पर एक-दूसरे से घोर असहमति रखते हुए संवाद-बहस करती शख़्सियत के बीच मैं संतुलन बनाए रखने की क्षमता रखता हूं. प्रो. अग्रवाल इस बात पर भी ध्यान देने से चूक गए जब द्विवेदी मॉडरेटर की भूमिका में ख़ुद को पंच परमेश्वर बताते हैं.
सौरभ द्विवेदी को अपने चारों तरफ लोग देखकर, छुटपन से ही फैलने का शौक रहा है जबी वो मीडिया के पेशे में आकर भी पहले से मौज़ूद असंख्य औपचारिक नाम के संस्थानों के बीच दि लल्लनटॉप को चुनते हैं. उन्हें अपने आगे फैलनेवाले को संतुलित करना आता है जबी वो मौज़ूदा भारतीय मीडिया शो के सबसे चहेते इंटरव्यूकर्ता की सूची में शामिल हैं. उन्हें फैलनेवाले को साधना न आता तो अब तक निबटा दिए जाते. उन्हें ख़ुद फैलने की कला न आती तो चल ही न पाते. प्रो. अग्रवाल सालों की पहचान और आत्मीय संबंध के बीच, से बेसिक सी बात भूल जाते हैं. नतीजा !
नतीजा ये कि सौरभ द्विवेदी एकदम से उन्हें एहसास कराते हैं. संबोधन में सिर्फ प्रोफेसर इस्तेमाल करते हैं- नो सर, नो उस्ताद,नो प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल. उनके भाषा के भीतर से आत्मीयता का वो पुट एकदम से ग़ायब हो जाता है और वही अंदाज़ हो जाता है, जैसा बाक़ी लोगों के लिए आख़िर-आख़िर तक रहता है.
ईश्वर के अस्तित्व को लेकर जावेद अख्तर और मुफ्ती शमाइल नदवी के बीच हुई कल की बातचीत, मीडिया की दुनिया में बहुत जल्द ही प्रचलित होनेवाला एक फॉर्मेट होगा. सौरभ द्विवेदी को लोग इसके प्रवर्तक के तौर पर रेखांकित करेंगे. उन्हें इस बात की दाद देंगे कि दोनों वक्ता को बराबर से मौक़ा देते हुए पूरे माहौल को कैसे सहज बनाए रखा जा सकता है ! लेकिन
प्रोफेसर अग्रवाल के सिरे से देखें तो ?
तमाम ऐसे प्रोफेसर, मीडिया गुरुओं के लिए एक नसीहत कि अपने पढ़ाए सफल छात्रों को लेकर किसी भी तरह का दावा न करें. उनके सामने तो इस अंदाज़ में तो बिल्कुल भी नहीं कि मैंने तुम्हें पढ़ाया है तो मुझे ज़्यादा मौक़ा कैसे नहीं दोगे ? ऐसा करने पर आपके आहत होने की भरपूर संभावना है क्योंकि आपके शिष्य के भीतर आपके फैलने से चाह और पेशेवर दिखने की तड़प कई गुना ज़्यादा है. आप दावा करेंगे तो सार्वजनिक तौर पर कमजोर और हास्यास्पद तक नज़र आने लग जाएंगे. वो तब सीधे अपनी हैसियत पर आ जाएगा..जैसे कल..
तारिक़ अज़ीम तन्हा
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