मेरी नज़र में हाल में हुई नास्तिक–आस्तिक बहस, जिसमें Javed Akhtar और एक मौलवी आमने–सामने थे, उसे “जीत–हार” की तरह देखना ही मूल समस्या है। असली प्रश्न यह है कि कौन-सी सोच इंसान को इंसान बनाती है और कौन-सी सोच उसे भीड़ में बदल देती है।
आज जिस आस्तिकता का सबसे ज़्यादा प्रचार है, वह ज़्यादातर religion-based आस्तिकता है—जो कठोर है, डर पर टिकी है और आदेश–पालन को ही धर्म मानती है। यही वह सोच है जिसने इतिहास में सबसे ज़्यादा हिंसा को जन्म दिया। धर्म के नाम पर क़त्लेआम, अलगाव और नफ़रत इसी मानसिकता की उपज हैं।
इसके ठीक उलट, spirituality (आध्यात्मिकता) प्रेम, दया और करुणा के माध्यम से ईश्वर तक पहुँचने की बात करती है। आध्यात्मिक दृष्टि कहती है कि ईश्वर बाहर नहीं, हर जीव के भीतर है। जब ईश्वर हर प्राणी में है, तो किसी को कष्ट देना, किसी की हत्या करना—ईश्वर से दूरी नहीं तो और क्या है?
यही कारण है कि दुनिया के सच्चे आध्यात्मिक संत हमेशा सत्ता और धर्मसत्ता की आँखों में खटकते रहे।
Kabir ने कहा—“कंकर-पाथर जोड़ि के मस्जिद लई बनाय”—तो पंडित भी नाराज़ हुए और मुल्ला भी।
Gautama Buddha ने कर्मकांड, यज्ञ और जाति को नकारा—तो ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने उन्हें वैदिक परंपरा से बाहर कर दिया।
Bulleh Shah को मस्जिदों से बाहर किया गया, क्योंकि वे कहते थे कि ईश्वर किताबों में नहीं, इंसान के भीतर है।
Rumi ने प्रेम को ईश्वर कहा—उनकी शिक्षाएँ आज भी धार्मिक कट्टरपंथियों को असहज करती हैं।
सबसे भयावह उदाहरण Mansur Al-Hallaj का है। उन्होंने “अनल-हक़” (मैं ही सत्य हूँ) कहा—अर्थात ईश्वर और इंसान के बीच कोई दीवार नहीं। यह बात धर्मसत्ता को ईशनिंदा लगी। परिणाम यह हुआ कि उन्हें सार्वजनिक रूप से यातनाएँ देकर सूली पर चढ़ा दिया गया। उनका अपराध यह नहीं था कि वे ईश्वर से दूर थे—अपराध यह था कि वे ईश्वर के बहुत क़रीब पहुँच चुके थे।
इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ प्रेम, दया और करुणा की बात करने वालों को religious institutions ने या तो परेशान किया, निर्वासित किया, या मौत के घाट उतार दिया। क्योंकि spirituality सवाल करना सिखाती है, जबकि religion सवालों से डरता है।
Spirituality चेतना को मुक्त करती है, religion उसे नियमों में कैद करता है।
आज भी हालात बदले नहीं हैं। जो लोग खुद को हिंदू या मुस्लिम कहकर “धार्मिक” होने का दावा करते हैं, लेकिन नफ़रत, हिंसा और श्रेष्ठता-बोध फैलाते हैं—वास्तव में वे ईश्वर से भी दूर हैं और इंसानियत से भी। क्योंकि ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता तलवार, नारे या भीड़ से नहीं, बल्कि विवेक और करुणा से होकर जाता है।
सबसे दुखद सच यह है कि इंसान अक्सर अपना दिमाग़ इस्तेमाल करना छोड़ देता है। जो कहा गया, जैसा कहा गया—उसे बिना तर्क किए मान लेता है। तर्क से डरना, सवालों से भागना और आदेशों को धर्म मान लेना—यही religion की पहचान बन चुकी है, जबकि spirituality प्रश्न करने और भीतर झाँकने की हिम्मत देती है।
इसीलिए साफ़ कहा जा सकता है—
religion लोगों को बाँटता है, spirituality लोगों को जोड़ती है।
और बड़े दुःख के साथ यह स्वीकार करना पड़ता है कि आज दुनिया में जितनी हत्याएँ, जितना रक्तपात और जितनी क्रूरता हो रही है, वह किसी विज्ञान, किसी दर्शन या किसी प्रेम-आंदोलन के नाम पर नहीं—बल्कि धर्म और religion के नाम पर हो रही है।
समस्या ईश्वर में नहीं है।
समस्या उस मानसिकता में है, जिसने ईश्वर को प्रेम से हटाकर सत्ता का औज़ार बना दिया।
तारिक़ अज़ीम 'तनहा '
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