क्या किसी सवाल का इमोशनल होना किसी सवाल के इररैशनल होने की दलील है??
किसी इंसान का किसी दूसरे इंसान को दुख मे देखकर दुखी होना इमोशन ही है जो इंसान मे ज़ाहिर होता है।
कयी दफ़ा किसी सवाल का जवाब इतना सिंपल और ब्रूटल होता है कि उससे बचने के लिये बड़ी बड़ी थ्योरीज़ बनायी जाती हैं और इन थ्योरीज़ मे शामिल भारी भारी अल्फ़ाज़ के जाले मे वह निहायत सिंपल सवाल किसी छोटे से कीड़े की तरह फंस कर दम तोड़ देता है। लेकिन दम तोड़ता है ख़त्म नही होता जैसे कोई भी जानदार मर जाने के बाद भी लाश की सूरत मे मौजूद रहता है।
दुनिया को एक बात समझनी होगी। जब तक कहीं कोई मज़लूम बेकसी से मरेगा, जब तक ऐसे क़हत पड़ेंगे जिनमे लोग लाशो को खाने पर मजबूर होते रहेंगे तब तक कुछ सवाल इमोशन्स से ही होगे क्योकि किसी को दुख मे देखकर दुखी होना इमोशन है ना कि फ़िज़िक्स।
इसी बात का दूसरा पहलू यह है कि जब तक इस दुनिया इंसान इतना मजबूर रहेगा कि उसके पास किसी ग़ैबी मदद की उमीद के सिवा कोई चारा नही होगा तब तक कोई कितना ही शोर मचाले इंसान का किसी अनदेखी ताकत मे यकीन ख़त्म नही होगा।
बाकी इस बहस से किसी को क्या हासिल हुआ सिवाय टी आर पी के खेल के । और पता नही ऐसी किसी भी बहस के लिये मीडिया को मुसलमान ही क्यो याद आते हैं।
राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के वक्त की लल्लन टाप की रिपोर्टिंग अभी लोगो को याद होगी। ज़रा उस वक्त इसी तरह की बहस लल्लन टाप राम पुनीयानी और किसी आचार्य के बीच कराते तो हम भी मान जाते।
बहरहाल इस बहस से सब को कुछ ना कुछ मिल गया। मुसलमानो को एक नया हीरो मिल गया। इस साल बिहार मे मजलिस के पांच उम्मीद वारो के जीतने के बाद यह 2025 की दूसरी बड़ी कामयाबी रही। उस वक्त मजलिस के कायद साहब को बुरा भला कहकर उम्मत के निशाने पर आ गये लोगो ने जावेद साहब का मज़ाक उड़ाकर डेमेज कंट्रोल करने की कोशिश की। अल्लाह करे वह कामयाब हो गये हों। जावेद साहब ने लिबरलस की अपनी टेरिटोरी को बरकरार रखते हुये "इससे अच्छा काम तो प्रधान मंत्री जी कर रहे हैं" कहकर अपना हल्का कुछ और बढा लिया।
नदवी साहब ने लाशो के सवाल को इमोशनल इशूज़ कहने के बाद पूरे इस्राइल को औक्यूपाइड पैलेस्टाइन कहकर ज़बरदस्त शाट लगाया।
कुल मिलाकर यह ऐसा मैच था जिसमे सब जीत गये। रील्स बनाने वालो को नया मैटेरियल मिल गया। जावेद साहब के कांपते हुये हाथ देखकर लोगो को बुल्डोज़र को देखकर कांपने का ग़म ग़लत हो गया।
मुझे लगान फ़िल्म याद आ गयी जिसमे मैच का मकसद एक के लिये डबल लगान लेना तो दूसरे के लिये लगान माफ़ी था। और इत्तेफाक से कैच के छक्का साबित हो जाने पर कचरा की खुशी कैसे भूली जा सकती है।
लेकिन एक बार एक ख़्याल मेरे दिल मे भी आया था जब मैने काबे की मस्जिद के इमाम को जुमे की नमाज के खुत्बे के बाद फ़िलिस्तीनियो को फ़ितना बताते हुये इस फ़ितने से मुसलमानो को दूर रहने की अपील करते हुये देखा था तो यह इमोशनल सवाल मेरे दिल मे भी आया था कि कम अज़ कम माइक ही ख़राब हो जाता..
मगर मुफ़्ती साहब की कंटिंजेंसी ने मुझे सुकून दे दिया।
कंटिंजेंसी ही था ना......
तारिक़ अज़ीम तनहा
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